इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एन एस ए)को लेकर एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है। इस फ़ैसले से प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी अपराध करने से पहले गिफ्तारी से जुड़े कानूनों के दुरुपयोग पर नए सिरे से सवाल खड़ा कर दिया है। इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि कोर्ट ने क़ानून का दुरुपयोग करके एन एस ए लगाने के आरोप में ज़िलाधिकारी और पुलिस अधिकारियों के वेतन से पाँच लाख रुपये काट कर बिना कारण एन एस ए में गिरफ़्तार एक छात्रा को मुआवजा के रूप में देने का आदेश दिया है। पिछले हफ़्ते नोएडा की छात्रा आकृति चौधरी के मामले में ये फ़ैसला सुनाया गया। 
अदालत ने आकृति की एन एस ए में गिरफ्तारी को “मनगढ़ंत कहानी” पर आधारित बताया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर यह कठोर आदेश दिया। आकृति दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहास स्नातक छात्रा और सोशल एक्टिविस्ट हैं, जिन्हें अप्रैल 2026 के नोएडा श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। मई में उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए ) लगाया गया और वे करीब 5 महीने से जेल में थीं।

शासन/प्रशासन के झूठे आरोप

इस मामले में वकील और सामाजिक कार्यकर्ता कॉलिन गोन्साल्विस बताते हैं कि आकृति पर मुख्यतः तीन आरोप लगाए गए थे। सबसे पहला आरोप नोएडा में हिंसा फैलाने की साजिश करने का था। गोन्साल्विस ने अदालत को बताया कि नोएडा में मजदूरों के आंदोलन में हिसा की शुरुआत 13 अप्रैल को हुई जबकि आकृति को 12 अप्रैल को ही गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके पहले आकृति ने मजदूरों के बीच सिर्फ एक बार भाषण दिया था जिसमें आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखने की अपील की गयी थी। दूसरा आरोप व्हॉट्स एप ग्रुप बनाकर हिंसक विचारधारा फैलाने का था। गोन्साल्विस ने अदालत के समक्ष सबूत देकर बताया कि व्हाट्स एप के सारे ग्रुप जिनसे आकृति जुड़ी थी, शिक्षा और समाज सेवा से संबंधित थे। कोई नया ग्रुप नहीं बनाया गया था। 
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चौंकाने वाली बात ये है कि इस ग्रुप में नोएडा पुलिस के दो कर्मचारी पहचान छिपाकर शामिल हो गए थे। पुलिस कर्मचारी ही इन ग्रुपों में हिसा फैलाने वाले पोस्ट डाल रहे थे। उन्होंने प्रधान मंत्री के काफिले को रकने तक के लिए उकसाने की कोशिश की थी। ग्रुप में शामिल लोगों ने इस तरह के पोस्ट का तुरंत विरोध किया और उसे हटा भी दिया। एन एस ए क़ानून साफ़ तौर पर कहता है कि इसके तहत गिरफ्तारी देश की रक्षा, विदेशी शक्तियों के साथ संबंध या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में बाधा डालने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए किया जाएगा। कोर्ट ने पाया कि आकृति के मामले में राज्य सरकार की कहानी मनगढ़ंत थी, गिरफ्तारी और नोटिस (बीएनएसएस के तहत) प्रक्रिया में कई खामियां थीं, और हिंसा भड़काने का कोई ठोस सबूत (जैसे वीडियोग्राफी) पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने एनएसए डिटेंशन ऑर्डर रद्द करते हुए गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की डीएम और प्रक्रिया में शामिल अन्य अधिकारियों (एस एच ओ स्तर तक) के वेतन से पांच लाख रुपये वसूल कर आकृति को देने का आदेश दिया।

सरकार विरोध बनाम देश विरोध

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो एनसीआरबी के अनुसार दिसंबर 24 तक देश की जेलों में 3,048 डिटेन्यू थे। इनमें एनएसए के अलावा जम्मू कश्मीर में लागू निवारक कानून, पीएसए , गुंडा एक्ट, विदेशी मुद्रा और तस्करी कानून, कोफ़ेपोसा और नशीली दवा क़ानून, एनडीपीएस आदि अन्य निवारक कानूनों के तहत बंद लोग शामिल हैं।इनमें सबसे ज्यादा लगभग 1117 तमिलनाडु में, जम्मू-कश्मीर में लगभग 660 (ज्यादातर पीएसए) और महाराष्ट्र में लगभग 414 हैं। कॉकरोच जनता पार्टी ( सी जे पी ) आंदोलन से देश भर में चर्चित सोनम वांगचुक को भी लद्दाख आंदोलन के दौरान एन एस ए में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रिहा किया गया।

नोएडा में मज़दूर आंदोलन के दौरान पुलिस ने सारी हदें पार कर दी थीं। फाइल फोटो

असम के भूमि अधिकार और पर्यावरण कार्यकर्ता प्रणब डोले को काजीरंगा नेशनल पार्क के पास लग्जरी होटल परियोजना के विरोध के कारण जुलाई 2026 में एन एस ए में गिरफ्तार किया गया।पंजाब से सांसद अमृतपाल सिंह 2023 से एनएसए के तहत असम की डिब्रूगढ़ जेल में थे। अप्रैल 2026 में उनकी एनएसए हिरासत समाप्त हुई, लेकिन अजनाला पुलिस स्टेशन हिंसा मामले में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर पंजाब के आतंकवादी समूहों से संबंध रखने का आरोप है।

कानून के दुरुपयोग पर सजा

सरकारों पर इन कानूनों के दुरुपयोग का आरोप लंबे समय से लगता रहा है। लेकिन अधिकारियों के लिए इन कानूनों में गिरफ्तारी सबसे आसान है। इनमे ज्यादातर गिरफ्तारियां सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की होती है।इसका मुख्य कारण ये है कि इन मामलों में गिरफ्तार लोगों को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की जरूरत नहीं होती। इन कानूनों में एक साल तक किसी भी व्यक्ति को जेल में रखा जा सकता है। कानून के मुताबिक इन मामलों में गिरफ्तार लोगों को 15 दिनों के भीतर करण बताना जरूरी होता है। आरोपों की समीक्षा हाई कोर्ट के जजों की एक समिति को करनी होती है। लेकिन देखा ये गया है कि समीक्षा कई महीनों तक लटकी रहती है। जिसके चलते लोग लंबे समय तक जेलों में बंद रहते हैं। जो मामले हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं उनमे अपराध साबित नहीं होता और ज्यादातर लोग छूट जाते हैं। 
इस तरह के ज्यादातर मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप को भी सीमित कर दिया गया है। लेकिन अदालती प्रक्रिया शुरू भी हो जाय तब भी छह महीने तक ज्यादातर लोगों को जेलों में रहना पड़ता है। आकृति के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस क़ानून का दुरुपयोग करने के आरोप में एस एच ओ से लेकर जिलाधिकारी तक पर जुर्माना लगाया है। पुलिस और अधिकारियों के लिए ये एक सबक होगा। इसके पहले क़ानून के दुरुपयोग के मामले में शायद ही कभी किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गयी है। उम्मीद की जा सकती है कि इस फ़ैसले से अधिकारियों की मनमानी पर अंकुश लगेगा।