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विपक्ष पर आख़िर क्यों नरम दिख रहे हैं नरेंद्र मोदी?

विपक्ष के लिए ‘महामिलावटी गठबंधन’ और ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ जैसे नारों का इस्तेमाल करने वाले प्रधानमंत्री मोदी आज एकाएक सक्रिय विपक्ष की ज़रूरत क्यों बताने लगे? एक सामान्य बात यह है कि संसदीय परंपरा में ऐसी भाषा एक औपचारिकता भी होती है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के इस बयान के कई मायने हो सकते हैं। क्या संसद सत्र में सरकार को विपक्ष की ज़रूरत है इसलिए तो नरेंद्र मोदी के बयान में नरमी नहीं दिख रही है? क्या सरकार को तीन तलाक़ को अवैध ठहराने वाले विधेयक और ऐसे ही दूसरे विधेयकों पर विपक्ष का साथ चाहिए? ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि लोकसभा में भले ही बीजेपी के पास साफ़ बहुमत है, लेकिन राज्यसभा में वह उससे काफ़ी पीछे है। पूरे एनडीए सहयोगियों को जुटाकर भी उनके पास बहुमत नहीं है। विपक्ष ने बेरोज़गारी, किसानों की समस्या, सूखे और प्रेस की आज़ादी के मुद्दों को उठाने के संकेत दे दिए हैं। यानी दोनों सदनों में हंगामे के आसार हैं। कई विधेयकों को पास कराने के अलावा सरकार की मजबूरी यह भी है कि इस सत्र में बजट पेश करना है और ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ पर चर्चा भी करानी है। ऐसे में सरकार हंगामा तो नहीं ही चाहेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को संसद परिसर के बाहर पत्रकारों से लोकतंत्र में एक सक्रिय विपक्ष के महत्व पर ज़ोर दिया और कहा कि उन्हें अपनी संख्या के बारे में परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि उन्हें सदन की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए।

मोदी ने विपक्षी दलों से आग्रह किया कि वे सदन में राष्ट्र के बारे में सोचें और देश के बड़े हितों से संबंधित मुद्दों पर ध्यान दें। उन्होंने कहा, ‘जब हम संसद में आते हैं तो हमें पक्ष और विपक्ष को भूल जाना चाहिए। हमें निष्पक्ष भावना वाले मुद्दों के बारे में सोचना चाहिए और राष्ट्र के बड़े हित में काम करना चाहिए।' संसद सदस्यों के साथ प्रधानमंत्री ने पद की शपथ ली। सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के सदन के सदस्यों को शपथ दिलाने के साथ हुई। 544 सदस्यों के लिए शपथ, अध्यक्ष का चुनाव और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव कुछ दिनों तक चलने की संभावना है। लोकसभा का मानसून सत्र 26 जुलाई तक जारी रहेगा।

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका के लिए उम्मीदवार को लेकर अगले कुछ दिनों में अनौपचारिक चर्चा होने की संभावना है। बता दें कि पिछली लोकसभा की स्पीकर रहीं सुमित्रा महाजन ने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था।

तीन तलाक़ विधेयक सबसे बड़ा मुद्दा

तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी बनाने वाले विधेयक और ऐसे ही दूसरे विधेयक को पारित कराना भी बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा। बीजेपी का सहयोगी दल जदयू ही तीन तलाक़ विधेयक का विरोध करता रहा है। यानी इस विधेयक पर एनडीए के दल ही एकमत नहीं हैं। ऐसे में इस विधेयक का पास होना मुश्किल है। पहले भी कई बार विधेयक को लाया गया था लेकिन राज्यसभा में पास नहीं हो सका था। तब इस मामले में ऑर्डिनेंस लाया गया था। 

ये विधेयक भी लाए जा सकते हैं

जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पास रहने वाले लोगों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले लोगों को भी आरक्षण का लाभ देने वाले जम्मू-कश्मीर आरक्षण विधेयक को भी पेश किया जाएगा। 200 प्वाइंट रोस्टर बहाल करने वाले केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान आरक्षण बिल को भी पेश किया जा सकता है। नागरिकता से जुड़ा संशोधन विधेयक भी पेश किया जा सकता है। संसद में क़रीब 22 साल से महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फ़ीसदी आरक्षण देने वाला विधेयक भी लाया जा सकता है।

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आर्थिक मोर्चे पर सरकार के लिए मुश्किलें

5 जुलाई को सुबह 11 बजे केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय बजट पेश करेंगी। इससे एक दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। आर्थिक मोर्चे पर सरकार की हालत ठीक नहीं है और विपक्ष इस पर सरकार को घेर सकता है। बेरोज़गारी 45 साल में सबसे ज़्यादा है। जीडीपी विकास दर मार्च में 5.8 फ़ीसदी पर आ गई और औद्योगिक उत्पादन दर बेतहाशा गिरी है। कृषि की हालत तो खस्ता है ही।

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ 

19 जून को, पीएम मोदी ने सभी दलों के अध्यक्षों को आमंत्रित किया है जिनके दोनों सदनों में प्रतिनिधि हैं। अन्य बातों के अलावा, बैठक ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ मुद्दे पर चर्चा करने के लिए है। 20 जून को दोनों सदनों के सांसदों को डिनर मीटिंग की उम्मीद है, जिसके दौरान वे सरकार के साथ विचारों का आदान-प्रदान करेंगे। बता दें कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के मुद्दे पर विपक्षी दल एकमत नहीं हैं। अधिकतर विपक्षी पार्टियाँ सरकार की मंशा पर सवाल उठाती रही हैं और लोकतंत्र के लिए लोकसभा और राज्यों की विधानसभा के चुनावों को अलग-अलग ही कराने पर ज़ोर देती रही हैं।

लोकसभा में बीजेपी की राह आसान

विपक्ष को सत्तारूढ़ बीजेपी के हाथों क़रारी हार का सामना करना पड़ा, जिसने हाल के चुनावों में 300 से अधिक सीटों पर कब्ज़ा जमाया। लोकसभा में बीजेपी के पास प्रचंड बहुमत है। पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 303 सीटें जीतीं। यह संख्या पिछले लोकसभा चुनाव में 282 के आँकड़े से कहीं ज़्यादा है और इससे बीजेपी के लिए निचले सदन में किसी भी विधेयक को पास कराना और आसान हो गया है।

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राज्यसभा में बीजेपी की परीक्षा

लेकिन राज्यसभा में बीजेपी अभी भी संख्या में काफ़ी पीछे है। 245 सीट वाले ऊपरी सदन में एनडीए के 102 सदस्य हैं। यह बहुमत से काफ़ी कम है। इससे बीजेपी के लिए इस सदन में किसी भी विधेयक को पास कराना मुश्किल होगा। ऐसी संभावना है कि बीजेपी 2020-21 तक राज्यसभा में बहुमत पा सकती है। तब तक तो कम से कम किसी विधेयक को पास कराने के लिए बीजेपी को विपक्ष पर भी निर्भर रहना पड़ेगा।

विपक्ष के नेता के लिए संख्या ज़रूरी नहीं?

विपक्ष के नेता के पद के लिए कांग्रेस की संख्या अभी भी कम है। कांग्रेस अभी भी राहुल गाँधी के पार्टी प्रमुख के रूप में पद छोड़ने के फ़ैसले के साथ संघर्ष कर रही है और इसे अभी लोकसभा और राज्यसभा के लिए अपने नेताओं का चयन करना है। हालाँकि, एक दिन पहले मोदी की सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव शीघ्र कराने की माँग करते हुए बेरोज़गारी, किसानों की समस्या, सूखे और प्रेस की आज़ादी के मुद्दों को उठाया।

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