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बीजेपी चुस्त, कांग्रेस पस्त, ऐसे कैसे बचेगी पार्टी?

लोकसभा चुनाव में मिली क़रारी हार के बाद भी लगता है कि कांग्रेस चेतने को तैयार नहीं है। अक्टूबर-नवंबर में बेहद अहम तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। बीजेपी ने इसके लिए तैयारी भी शुरू कर दी है लेकिन कांग्रेस अभी तक उसका अध्यक्ष कौन होगा, यही तय नहीं कर पाई है। राहुल गाँधी जिद पर अड़े हैं कि वह पार्टी के अध्यक्ष पद पर नहीं रहेंगे, ऐसे में पार्टी ने थक-हारकर नए अध्यक्ष को चुनने का काम तेज़ कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक़, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पार्टी के नए अध्यक्ष हो सकते हैं। लेकिन इस सबके बीच क़रारी हार के बाद पस्त हो चुके कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए तो पार्टी नेतृत्व को पहल करनी ही चाहिए, वरना कैसे पार्टी प्रचंड जीत हासिल करने वाली बीजेपी का मुक़ाबला कर पाएगी।
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बीजेपी अध्यक्ष और देश के गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव के लिए तीनों राज्यों के वरिष्ठ पार्टी नेताओं के साथ राज्य विधानसभा चुनावों की तैयारियों पर विचार-विमर्श किया। इन तीनों ही राज्यों में लोकसभा चुनाव का परिणाम देखें तो कांग्रेस की हालत बेहद पतली है। इसके तुरंत बाद दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा के चुनाव होने हैं।

बीजेपी की सक्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह इन तीनों राज्यों की चुनावी तैयारियों में तो जुटी ही है, जुलाई में राज्यसभा की खाली सीटों के लिए होने वाले चुनाव और यूपी की दर्जन भर सीटों के उपचुनाव के लिए भी उसने कमर कसी हुई है।

महाराष्ट्र

उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र राजनीतिक दृष्टि से दूसरा बड़ा राज्य है और यहाँ 48 लोकसभा सीटें हैं। महाराष्ट्र में 2014 में कांग्रेस को सिर्फ़ 2 सीटों पर जीत मिली थी लेकिन इस बार उसे केवल एक ही सीट मिली है। पार्टी की ख़राब हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण भी चुनाव हार गए हैं। जब से अशोक चव्हाण को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, पार्टी नेताओं का एक वर्ग उनके ख़िलाफ़ है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता राधाकृष्णन विखे पाटिल बीजेपी में शामिल हो गए हैं। पूर्व मंत्री कृपाशंकर सिंह और मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरुपम के बीच रार जगजाहिर है। ऐसे हालात में कांग्रेस किस तरह विधानसभा चुनाव में बीजेपी से मुक़ाबला करेगी, इस पर उसे गंभीरता से सोचना चाहिए। जबकि बीजेपी अपनी सहयोगी शिवसेना के साथ एक बार फिर महाराष्ट्र जीतने के लिए तैयार दिख रही है।
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दिल्ली

आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर लंबे समय तक कशमकश में रही कांग्रेस इस लोकसभा चुनाव में सभी सातों सीटों पर हार गई, जबकि एक समय उसने 15 साल तक दिल्ली में अकेले सरकार चलाई है। दिल्ली में भी पार्टी के भीतर ज़बरदस्त गुटबाज़ी है। पिछले विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ़ होने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर भरोसा जताया और उन्हें पार्टी की बागडोर सौंप दी। इसका भी नतीजा सिफ़र रहा और पार्टी सभी सातों सीटों पर बड़े अंतर से चुनाव हार गई। ख़ुद शीला दीक्षित को भी क़रारी हार मिली है। पार्टी दिल्ली में शीला, माकन, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली और जय प्रकाश अग्रवाल के गुटों में बँटी हुई है। दूसरी ओर बीजेपी दिल्ली फतह करने की तैयारियों में जुट गई है।  

झारखंड

लोकसभा चुनाव में झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से 12 सीटों पर बीजेपी और उसकी सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को राज्य में सिर्फ़ 1 ही सीट मिली थी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने भी हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था। इसके बाद चुनाव में हार की समीक्षा बैठक के दौरान भी ख़ासा हंगामा हुआ था। बैठक से पहले प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में कई कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था। चार महीने में ही पार्टी कैसे बीजेपी को चुनौती देने लायक बन पाएगी, इसका जवाब पार्टी को देना होगा। दूसरी ओर बीजेपी मुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। 

हरियाणा

लोकसभा चुनाव में हरियाणा में कांग्रेस 10 की 10 सीटें हार चुकी है। कई सीटों पर तो पार्टी की बेहद क़रारी हार हुई है लेकिन इसके बाद भी राज्य में पार्टी नेताओं में आपसी गुटबाज़ी थमने का नाम नहीं ले रही है। यहाँ कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा, विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर, मीडिया विभाग के राष्ट्रीय प्रभारी रणदीप सुरजेवाला, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा के ख़ेमों में बँटी हुई है। हुड्डा गुट अशोक तंवर को हटाने की माँग पर अड़ा हुआ है। इसी गुटबाज़ी के कारण पिछले साल हुए जींद उपचुनाव में रणदीप सुरजेवाला को हार का सामना करना पड़ा था। लोकसभा चुनाव में राज्य में बीजेपी को मिली जोरदार सफलता को देखा जाए तो पार्टी के लिए जीत हासिल करना बहुत मुश्किल नहीं लग रहा है।

जम्मू-कश्मीर

लोकसभा चुनाव में मोदी सुनामी का हिंदी भाषी प्रदेशों में तो ज़बरदस्त प्रभाव रहा ही, जम्मू-कश्मीर में भी बीजेपी को अच्छी सफलता मिली। बीजेपी यहाँ इस बार अपने दम पर विधानसभा का चुनाव लड़ने की तैयारी में है। बीजेपी को राज्य की 6 में से 3 सीटें मिली हैं और उसका वोट शेयर 2014 की अपेक्षा 12 फ़ीसदी बढ़ा है। कांग्रेस पाँच सीटों पर चुनाव लड़ी और पाँचों पर उसे हार मिली। हार के कारणों की समीक्षा के लिए राज्यसभा में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद के नेतृत्व में बुलाई गई बैठक में जब तीन कार्यवाहक अध्यक्ष बनाने की बात आई तो इसका राज्य भर में विरोध शुरू हो गया।
इसके अलावा मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, राजस्थान में भी पार्टी गुटबाज़ी से जूझ रही है और उसे इन राज्यों में बुरी तरह हार का मुँह देखना पड़ा है। दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने सरकार बनाई थी। लेकिन पार्टी इस बार राज्य की 29 में से 28 सीटों पर हार गई।
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच खींचतान आम है। शायद इसी कारण इसी कारण पार्टी को सत्ता में होने के बावजूद राज्य की सभी 25 सीटों पर हार मिली है। गहलोत अपने बेटे तक को चुनाव जिताने में असफल रहे।

इस्तीफ़े देने से खड़ी होगी पार्टी?

राहुल गाँधी के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चव्हाण, पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़, झारखंड कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार, असम कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा ने कांग्रेस अध्यक्ष को इस्तीफ़ा भेज दिया था। इससे पहले राज बब्बर और कमलनाथ ने भी इस्तीफ़ा देने की पेशकश की थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या धड़ाधड़ इस्तीफ़े देने से पार्टी खड़ी हो पाएगी।
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निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए देश की आज़ादी के बाद का यह सबसे ख़राब समय है जब वह कुछ ग़िने-चुने राज्यों में ही सत्ता में है और इनमें से भी कुछ जगहों पर वह भयंकर गुटबाज़ी से जूझ रही है। ऐसे में कांग्रेस को इस ख़राब हालत से उबारने के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को राज्यों में नेताओं की गुटबाज़ी पर लगाम लगानी होगी और इसके लिए कड़े से कड़े क़दम उठाने होंगे। वरना शायद उसके लिए फिर से खड़ा होना बेहद मुश्किल हो जाए।
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