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क्या रघुराम राजन के सुझाव पर हुआ 'न्याय' का एलान?

क्या दुनिया भर के बड़े अर्थशास्त्री राहुल गाँधी की न्यूनतम आय योजना यानी 'न्याय' के पक्ष में हैं? यह सवाल इसलिए क्योंकि राहुल गाँधी ने कहा है कि उनकी पार्टी ने योजना को लेकर आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन सहित दुनिया के सभी बड़े अर्थशास्त्रियों से संपर्क साधा। यह सवाल इसलिए भी क्योंकि राजन ने भी अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी योजना की पैरवी की। एक इंटरव्यू में इस योजना को लेकर सवालों पर उन्होंने कहा कि सीधे लोगों को पैसा देना भी एक तरह से उन्हें सशक्त करना है और वे लोग इसको अपनी ज़रूरत के हिसाब से ख़र्च कर सकते हैं। तो सवाल यह है कि दूसरे विशेषज्ञ इसको किस रूप में देखते हैं?

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दो दिन पहले ही सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष ने चुनावी वादा किया कि कांग्रेस यदि सत्ता में आई तो देश के सबसे ग़रीब 20 फ़ीसदी परिवारों को हर साल 72 हज़ार रुपये दिए जाएँगे। यह रक़म न्यूनतम आय योजना के तहत दी जाएगी। सबसे बड़ी समस्या प्रस्तावित स्कीम पर ख़र्च होने वाली अनुमानित रक़म 3.60 लाख करोड़ रुपये को लेकर है। इसी बात पर विशेषज्ञ भी माथापच्ची कर रहे हैं और इसी को लेकर बीजेपी राहुल और कांग्रेस को घेर रही है। बीजेपी ने कांग्रेस की योजना को 'ब्लफ़' क़रार दिया और इसके कार्यान्वयन को लेकर सवाल उठाए।

बीजेपी के इन्हीं आरोपों का जवाब राहुल ने राजस्थान में चुनावी रैलियों में दिया और कहा कि हम इस योजना पर पिछले छह माह से काम कर रहे थे और हमने एक-एक कर दुनिया के सभी बड़े अर्थशास्त्रियों से संपर्क साधा।

राहुल गाँधी ने इसमें रघुराम राजन का भी नाम लिया। हालाँकि उन्होंने न तो दूसरे अर्थशास्त्रियों का नाम लिया जिनसे कांग्रेस ने संपर्क किया है और न ही यह बताया कि अर्थशास्त्रियों ने क्या सुझाव दिये। रघुराम राजन की ओर से इस पर प्रतिक्रिया आयी। ‘एनडीटीवी’ के साथ इंटरव्यू में आरबीआई के पूर्व गवर्नर ने कहा कि लंबे समय से हम देखते आ रहे हैं कि लोगों को सीधे पैसे देना भी उनको सशकत बनाने का एक तरीक़ा है। 

राजन ने क्या कहा?

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान 2013 में आरबीआई के गवर्नर नियुक्त किये गये राजन ने कहा, 'जो चीज मायने रखती है वह है डिटेल। क्या यह योजना एक ऐड-ऑन की तरह होगा या जो अभी मौजूदा चीजें हैं उसके विकल्प के तौर पर? हम इसे ग़रीबों तक कैसे लेकर जाएँगे? हमें यह समझने की ज़रूरत है कि ऐसी कौन-सी चीजें या योजनाएँ (सब्सिडी) हैं जिन्हें प्रतिस्थापित किया जाएगा।' 

बता दें कि राजन सितंबर 2016 में अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद अमेरिकी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वापस लौट गये हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल को बढ़ाने से मना कर दिया था। बीजेपी नेता राजन के कार्यकाल की काफ़ी आलोचना करते रहे हैं।

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विशेषज्ञों ने कहा, चुनौतीपूर्ण काम

इस बीच विशेषज्ञों ने कहा है कि यह योजना सामाजिक सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दिखाता है, लेकिन इसे लागू करना काफ़ी चुनौतीपूर्ण होगा। प्रस्तावित स्कीम पर क़रीब 3.60 लाख करोड़ रुपये का ख़र्च आएगा जो जीडीपी का क़रीब 1.7 प्रतिशत है। कांग्रेस अभी तक यह साफ़ नहीं कर पायी है कि इसे लागू करने के लिए पैसे कहाँ से आएँगे। 

सामाजिक सुरक्षा तो ठीक, पैसा कहाँ से आएगा: ज्यां द्रेज 

अंग्रेज़ी दैनिक अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का बयान छापा है जिसमें उन्होंने कहा है, 'न्यूनतम आय गारंटी योजना का सामाजिक सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता के ल़िहाज से स्वागत किया जाना चाहिए। हालाँकि इस योजना की मज़बूती इस बात पर निर्भर करेगी कि इसके लिए पैसा कहाँ से आएगा और 20% ग़रीबों की पहचान कैसे की जाएगी। उम्मीद है कि इस प्रस्ताव में वक़्त के साथ और सुधार होगा।'

‘तसवीर बदलेगी, पर ख़ज़ाने पर बोझ बढ़ेगा’

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, योजना आयोग की पूर्व सदस्य सैयदा हमीद ने इस योजना को अच्छा बताया है। उन्होंने कहा कि यह भारत की तसवीर बदल सकती है, लेकिन इससे सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा,

देश में अमीरों के पास ग़लत तरीक़े से कमाया हुआ बहुत सारा पैसा है। एक ऐसा नेता जो ईमानदार हो और लोगों की परवाह करता हो, वह इसका इस्तेमाल योजना में कर सकता है।


सैयदा हमीद, योजना आयोग की पूर्व सदस्य

लागू करने में काफ़ी दिक्कतें आएँगी: अभिजीत सेन

जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर और कभी योजना आयोग के सदस्य रहे अभिजीत सेन ने कहा कि इसके लिए काफ़ी ज़्यादा धन की ज़रूरत होगी और इसको लागू करने में काफ़ी दिक्कतें आने वाली हैं। 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने सुझाव दिया कि योजना को लागू करने में मनरेगा जैसी योजनाओं को कांग्रेस स्वभाविक तौर पर जोड़ सकती है। उन्होंने कहा, 'जो काम करने की स्थिति में हैं उनके लिए काम के दिन बढ़ा दीजिए, इससे लोगों की आय बढ़ाने का मकसद पूरा हो जाएगा। बुजुर्ग और काम करने में अक्षम लोगों को सीधे पैसे ट्रांस्फ़र करें। काम करने वाली उम्र के लोगों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है। उनकी आय को पता करना ज़रूरी है, लेकिन यह काम बहुत मुश्किल होगा।'

योजना ने असमानता को पहचाना: हर्ष मंदर 

'भोजन का अधिकार' से जुड़े कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने कहा कि उन्होंने इस योजना का इसलिए स्वागत किया क्योंकि इसने ग़रीबों के वास्तविक मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया और देश में भयंकर रूप से फैली असमानता को पहचाना है। 

उन्होंने कहा, 'भारत दुनिया के उन देशों में है जहाँ कर और जीडीपी का अनुपात सबसे कम है। हम सबसे धनवान लोगों पर टैक्स नहीं लगा रहे हैं। अमीरों और मध्यम वर्ग को दी जाने वाली सब्सिडी ग़रीबों से तीन गुना ज़्यादा है। इसलिए हमें इसमें ग़रीबों को शामिल करने के लिए इसे फिर से व्यवस्थित करना होगा।'

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धमाका है यह, बम फटेगा: राहुल 

बीजेपी के सवालों का जवाब राहुल ने मंगलवार को राजस्थान में चुनावी रैलियों में दिया और कहा कि दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों से संपर्क किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह योजना ग़रीबों को 'गिफ़्ट' नहीं, बल्कि 'न्याय' है। 

राहुल ने कहा, 'धमाका है यह, बम फटेगा। यह कांग्रेस का ग़रीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक है। उन्होंने (बीजेपी) ग़रीबों को हटाने का काम किया हम ग़रीबी हटाएँगे।'

इससे पहले प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री सबसे अमीर लोगों को पैसा दे सकते हैं तो कांग्रेस सबसे ग़रीब लोगों को पैसा दे सकती है। इसके बाद बीजेपी ने एनडीए सरकार के मंत्रियों ने कांग्रेस की योजना को 'ब्लफ़' क़रार दिया और इसके कार्यान्वयन को लेकर सवाल उठाए।

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