सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर राहुल गांधी की टीम ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ़ एक याचिका दायर की है। इस याचिका में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, सौगत रॉय, अखिलेश यादव, तेजस्वी प्रसाद यादव सहित 11 लोगों को याचिकाकर्ता के तौर पर शामिल किया गया है।
एसआईआर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट तक मार्च
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत विपक्ष के 11 नेताओं ने SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के ख़िलाफ़ याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जा रहे हैं और SIR से जुड़े कुछ अहम फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी, मंज़ूरी या सहमति के बिना लिए। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड मँगाने, मतदाता सूची से हटाए गए नामों का स्वतंत्र ऑडिट कराने और सभी राज्यों में SIR की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने की माँग की है। इसके अलावा, नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 में किए गए बदलाव, ECINET और ERONET डेटाबेस के संचालन तथा EVM से जुड़ी प्रक्रियाओं की समीक्षा कराने की अपील भी की गई है।
याचिका में कुल 10 प्रमुख निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि जब तक मामला अदालत में लंबित है, तब तक SIR से जुड़े सभी निर्णय निर्धारित क़ानूनी प्रक्रिया के तहत लिए जाएँ और उनकी कार्यवाही का रिकॉर्ड रखा जाए। याचिका को वकील प्रसन्ना एस. के माध्यम से दायर किया गया है। याचिका में यह भी साफ़ किया गया है कि इसका मक़सद सुप्रीम कोर्ट के 27 मई के उस फ़ैसले को दोबारा खोलना नहीं है, जिसमें SIR को बरकरार रखा गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनकी चुनौती अलग और सीमित मुद्दों पर केंद्रित है- विशेष रूप से SIR से जुड़े फ़ैसलों की प्रक्रिया, फ़ॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची से नाम हटाने के तरीकों पर।
सुप्रीम कोर्ट से माँगे गए 10 प्रमुख निर्देश
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को कई निर्देश देने की अपील की गई है। इनमें चुनाव आयोग के रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से अदालत के सामने पेश करने से लेकर SIR रोकने तक की माँगें शामिल हैं।
एसआईआर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका के मुख्य प्वाइंट
एसआईआर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका के मुख्य प्वाइंट
एसआईआर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका के मुख्य प्वाइंट
1. चुनाव आयोग के सभी संबंधित रिकॉर्ड पेश किए जाएँ
याचिकाकर्ताओं ने SIR से जुड़े चुनाव आयोग के रिकॉर्ड अदालत में मँगाने की माँग की है। इनमें फ़ाइलें, बैठकों के मिनट्स, अधिकारियों की टिप्पणियाँ और चुनाव आयुक्तों की आपत्तियाँ शामिल हैं। इसके साथ ECINET और ERONET सिस्टम के एक्सेस लॉग भी पेश करने को कहा गया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि संबंधित फ़ैसले कैसे लिए गए और रिकॉर्ड तक किसकी पहुँच थी।
2. देशव्यापी SIR शुरू करने के फैसले की पूरी फ़ाइल दी जाए
याचिका में 24 जून 2025 को देशभर में SIR शुरू करने के फैसले से जुड़ी पूरी फ़ाइल माँगी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह जानना ज़रूरी है कि देशव्यापी पुनरीक्षण का निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया था। याचिका में एक RTI जवाब का भी हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक़, चुनाव आयोग के प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने कहा था कि 2025 में देशव्यापी SIR शुरू करने का कोई फ़ैसला नहीं लिया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आरटीआई का वह जवाब 24 जून 2025 के आयोग के आदेश के एक हिस्से से मेल नहीं खाता। इस अंतर को साफ़ करने के लिए उन्होंने संबंधित रिकॉर्ड की जाँच की माँग की है।
3. फैसले क़ानून के मुताबिक लिए गए या नहीं, जाँच हो
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 324, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के क़ानून की धारा 18 और टी.एन. शेषन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया की जाँच करने की माँग की है।उनका तर्क है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर अलग निर्णयकारी अधिकार प्राप्त नहीं हैं। याचिका में कहा गया है कि यदि कोई निर्णय कानूनी अधिकार के बिना या अनिवार्य प्रक्रिया का पालन किए बिना लिया गया हो तो उसे रद्द किया जाना चाहिए।
4. नियमों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो
याचिका में कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की गई है। इसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई का अनुरोध भी शामिल है।
5. मामले के निपटारे तक SIR के हर फैसले का रिकॉर्ड रखा जाए
याचिकाकर्ताओं ने अनुरोध किया है कि जब तक मामला अदालत में लंबित है, SIR से संबंधित हर निर्णय धारा 18 के अनुरूप लिया जाए और उसकी कार्यवाही का पूरा रिकॉर्ड तैयार किया जाए। उनका कहना है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी आवश्यक सदस्यों की भूमिका और दर्ज आपत्तियों का रिकॉर्ड होना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट रहे कि फैसला किस तरह लिया गया।6. ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 में बदलाव नियमों के मुताबिक हो
फ़ॉर्म-6 उन पात्र नागरिकों के लिए है, जो पहली बार मतदाता के रूप में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं। याचिका में जुलाई 2026 में ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 में किए गए बदलाव को चुनौती दी गई है। नए फ़ॉर्म में आवेदक से यह घोषणा माँगी गई कि क्या उसका अपना नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में शामिल था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना वैधानिक फ़ॉर्म में ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने माँग की है कि जब तक संबंधित नियमों में संशोधन नहीं होता, ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 को मौजूदा नियमों के अनुरूप रखा जाए।
7. स्वतंत्र समिति नाम हटाने, EVM प्रक्रिया की समीक्षा करे
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाने की माँग की गई है। इस समिति को SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों का ऑडिट करने और चुनावी डेटाबेस तक पहुँच की व्यवस्था की समीक्षा करने का सुझाव दिया गया है।
इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने EVM से जुड़ी प्रक्रियाओं की भी समीक्षा कराने की अपील की है, ताकि उनकी तुलना दुनिया में अपनाई जाने वाली सर्वोत्तम प्रक्रियाओं से की जा सके। याचिका में EVM से जुड़ी किसी खास गड़बड़ी को अदालत द्वारा साबित किए जाने की बात नहीं है। यह इस प्रक्रिया की समीक्षा कराने की माँग है।
8. हटाए गए नामों की बूथवार सूची, हटाने के कारण बताए जाएँ
याचिकाकर्ताओं ने माँग की है कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों की सूची मतदान केंद्र यानी बूथ के हिसाब से प्रकाशित की जाए। इसमें नाम हटाने के कारण, संबंधित मतदाताओं का लिंग और उम्र के आधार पर विवरण भी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है।
इसके साथ उन मतदाताओं के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाने की माँग की गई है, जिनके नाम ग़लत तरीक़े से हट गए हों और जो उन्हें दोबारा जुड़वाना चाहते हों।
9. नोटिस और सुनवाई के बिना किसी का नाम न हटे
याचिका में कहा गया है कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे उचित नोटिस दिया जाए और अपना पक्ष रखने का अवसर मिले।
याचिकाकर्ताओं ने पंजाब समेत चुनाव वाले राज्यों में पात्र नागरिकों को नाम शामिल कराने के लिए निर्धारित अंतिम तारीख तक आवेदन करने का अवसर देने की भी माँग की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया गया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न हों।
10. सभी राज्यों में SIR पर अंतरिम रोक लगाई जाए
याचिका की एक प्रमुख माँग यह है कि अदालत मामले का अंतिम निर्णय आने तक सभी राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाए।याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब तक पुनरीक्षण की प्रक्रिया, नाम हटाने के आधार और चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके की जाँच नहीं हो जाती, तब तक इस प्रक्रिया को रोकना ज़रूरी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने लगभग 10 महीनों के दौरान करीब 14 मौकों पर ऐसे निर्णय लिए, जिन पर अन्य दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की थी। इस दावे के समर्थन में याचिका में द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की पड़ताल का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों ने कई निर्णयों पर आपत्तियाँ दर्ज की थीं।
याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग का पक्ष है कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, जबकि मीडिया रिपोर्टों में उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर असहमति की बात कही गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस सवाल का जवाब आयोग के मूल रिकॉर्ड की जाँच से ही मिल सकता है। इसीलिए उन्होंने बैठकों के मिनट्स, आपत्तियों, फ़ाइलों और निर्णयों से जुड़े दस्तावेज़ अदालत में पेश करने की माँग की है।याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के संबंधित क़ानून के साथ टी.एन. शेषन मामले के फैसले का हवाला देकर कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर एकतरफा अधिकार प्राप्त नहीं हैं।
नए फ़ॉर्म-6 का विवाद क्या है?
फ़ॉर्म-6 में बदलाव इस पूरे विवाद का एक अहम हिस्सा है। चुनाव आयोग ने SIR के दौरान ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़ी थी। इसके तहत नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने वाले आवेदक को यह बताना होता है कि क्या उसका या उसके परिवार के कुछ सदस्यों का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में था।
इस बदलाव की आलोचना करने वालों का कहना है कि इससे पहली बार वोटर बनने वाले ऐसे लोगों के लिए अतिरिक्त परेशानी पैदा हो सकती है, जिनके परिवार का नाम पुरानी मतदाता सूची में दर्ज नहीं था। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या संबंधित नियमों में संशोधन किए बिना वैधानिक फ़ॉर्म बदला जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने भी बदलावों पर आपत्तियाँ दर्ज की थीं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा था?
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी प्रेस नोट में कहा था कि SIR के दौरान फ़ॉर्म-6 के साथ जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने मंज़ूरी दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने नए फ़ॉर्म-6 को न मंज़ूरी दी थी और न ही ख़ारिज किया था, क्योंकि यह मुद्दा बिहार SIR के फैसले के समय अदालत के सामने आया ही नहीं था। इसलिए फ़ॉर्म-6 की वैधता का सवाल अभी न्यायिक विचार के लिए खुला है। मौजूदा याचिका में भी इसी बदलाव की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं।ECINET, ERONET डेटाबेस पर भी सवाल
याचिका में ECINET और ERONET जैसे चुनावी डेटाबेस के संचालन पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग के आईटी विभाग के पास इन प्रणालियों का केंद्रीकृत नियंत्रण होने से मतदाता पंजीकरण अधिकारियों की वैधानिक भूमिका प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने की व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर अधिकृत अधिकारियों की भूमिका अहम है। याचिका के मुताबिक़, यदि नियंत्रण अत्यधिक केंद्रीकृत हो जाता है तो इससे उस विकेंद्रीकृत व्यवस्था पर असर पड़ सकता है, जिसका उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। इस मुद्दे पर भी अदालत से संबंधित रिकॉर्ड मँगाने और डेटाबेस तक पहुँच की व्यवस्था की समीक्षा कराने का अनुरोध किया गया है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सवाल हैं?
इस याचिका के ज़रिये विपक्ष ने SIR, मतदाता सूची में नाम हटाने, फ़ॉर्म-6 में बदलाव और चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़े कई सवाल अदालत के सामने रखे हैं। अब प्रमुख सवाल हैं कि क्या SIR से जुड़े फैसले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए, क्या फ़ॉर्म-6 में बदलाव के लिए नियमों में संशोधन आवश्यक था, क्या मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर्याप्त रूप से पारदर्शी है और क्या चुनाव आयोग के निर्णयों में सामूहिक विचार-विमर्श की व्यवस्था का पालन हुआ।