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विवाद बढ़ने पर बैकफ़ुट पर आये रविशंकर प्रसाद, वापस लिया बयान

आर्थिक मंदी को फ़िल्मों की कमाई से जोड़ने को लेकर दिये गये बयान पर विवाद बढ़ने के बाद केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को बैकफ़ुट पर आना पड़ा है। कांग्रेस ने इसे लेकर जोरदार पलटवार किया था और कहा था कि केंद्रीय मंत्री का बयान बेहद ही असंवेदनशील है। 

क़ानून मंत्री ने प्रेस को जारी एक बयान में कहा कि मुंबई में दिये गये उनके 3 फ़िल्मों के 120 करोड़ रुपये कमाने वाला बयान पूरी तरह सही था और तर्क पर आधारित था। प्रसाद के मुताबिक़, उन्होंने मुंबई में कहा था कि, ‘हम अपनी फ़िल्म इंडस्ट्री पर गर्व करते हैं जो लाखों लोगों को रोज़गार देती है।’ क़ानून मंत्री ने कहा कि प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान उन्होंने अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों के बारे में बात की थी और कहा था कि मोदी सरकार आम आदमी की भावनाओं का हमेशा ख्याल रखती है। 

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प्रसाद ने कहा कि उनके बयान का पूरा वीडियो उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर मौजूद है। क़ानून मंत्री ने कहा, ‘मुझे इसके लिए अफ़सोस है कि मेरे बयान का एक हिस्सा उठा लिया गया और इसे संदर्भ से बाहर दिखाकर ग़लत तरीक़े से पेश किया गया। एक संवेदनशील इंसान होने के नाते, मैं अपना बयान वापस लेता हूँ।’ 

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद शनिवार को मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पत्रकारों से बात कर रहे थे। इस दौरान देश में आर्थिक मंदी को लेकर पूछे गये एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि 2 अक्टूबर को नेशनल हॉली डे वाले दिन तीन फ़िल्में रिलीज हुईं और एक दिन में इन तीन फ़िल्मों ने 120 करोड़ का कारोबार किया। प्रसाद ने इन फ़िल्मों के नाम वॉर, जोकर और सायरा बताये। इसके बाद वह ऐसे हंसे जैसे उन लोगों को मजाक उड़ा रहे हों जो लोग सरकार को बार-बार बता रहे हैं कि आर्थिक मोर्चे पर हालात ख़राब हैं और सरकार इस पर ध्यान दे। प्रसाद ने हंसते हुए कहा कि जब देश में इकॉनमी की हालत अच्छी है तभी तो एक दिन में 120 करोड़ रुपये का रिटर्न आता है।
कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने ट्वीट कर कहा था कि जब लोगों की नौकरियां जा रही हैं और फ़ैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, ऐसे समय में सरकार आर्थिक मंदी को ग़लत साबित करने के लिये फ़िल्मों की कमाई की बात कर रही है। सुप्रिया ने कहा था कि विकास दर लगातार गिर रही है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से पूछा था कि जब लोगों का भविष्य दांव पर हो तो क्या उन्हें फ़िल्म देखने चले जाना चाहिए। 
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