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ग़रीबी, बेरोजगारी बीजेपी के लिए क्यों बन गई है बड़ा सिरदर्द?

अब आरएसएस ने बेरोजगारी, गरीबी, असमानता को सुर्खियों में ला दिया है। आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच के एक वेबिनार में संघ के दूसरे सबसे बड़े ताक़तवर अधिकारी आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने देश में ग़रीबी, बेरोजगारी, असमानता जैसी समस्याओं को स्वीकार किया। होसबले ने कहा, 'देश में गरीबी हमारे सामने दानव की तरह खड़ी है। यह महत्वपूर्ण है कि हम इस राक्षस का वध करें। 20 करोड़ लोग अभी भी गरीबी रेखा से नीचे हैं, यह एक ऐसा आंकड़ा है जो हमें बहुत दुखी करता है। 23 करोड़ लोगों की प्रतिदिन की आय 375 रुपये से कम है।'

उन्होंने कहा कि श्रम बल सर्वेक्षण कहता है कि हमारे पास 7.6% की बेरोजगारी दर है। उन्होंने आगे कहा, 'एक आँकड़ा कहता है कि भारत दुनिया की शीर्ष छह अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन क्या यह अच्छी स्थिति है? भारत की शीर्ष 1 प्रतिशत आबादी के पास देश की आय का पांचवाँ (20%) हिस्सा है। साथ ही देश की 50% आबादी के पास देश की आय का केवल 13% है।'

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यह उस संघ की टिप्पणी है जिससे बीजेपी अस्तित्व में आई है। यह उस संघ के नेता की खरी-खरी टिप्पणी है जिसे बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए कसरत करते देखा जाता है। तो क्या इसी आरएसएस के नेता की तरह बीजेपी के नेता, मंत्री या प्रधानमंत्री तक ग़रीबी, बेरोजगारी और असमानता के इन आँकड़ों को स्वीकारते हैं?

हाल के कुछ वर्षों में जो आँकड़े और रिपोर्टें आती रही हैं उसमें ग़रीबी, बेरोजगारी और असमानता पर स्थिति ख़राब होती हुई दिखती है, लेकिन सरकार ने उन रिपोर्टों को हर संभव खारिज करने की ही कोशिश की है। इस मामले में तो सरकार की सबसे बड़ी किरकिरी 2019 में हुई थी। 

बेरोजगारी

2019 का वह साल कोरोना के पहले का समय था। तब बेरोजगारी पर आँकड़ा आने वाला था, लेकिन इसमें देरी की गई। मीडिया में वह आँकड़ा लीक हो गया और कहा गया कि 2017-18 के लिए सरकार के अपने आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण ने पाया है कि बेरोजगारी 45 साल के उच्च स्तर 6.1% पर पहुंच गई है। 

लेकिन सरकार ने बेरोजगारी के उन आँकड़ों को तुरत खारिज कर दिया। हर स्तर पर इन आँकड़ों को खारिज करने का अभियान चला।

तत्कालीन वित्त मंत्री से लेकर नीति आयोग के सीईओ तक तर्क देते रहे कि भारत रोजगार पैदा किए बिना 7% से अधिक की दर से नहीं बढ़ सकता है। लेकिन आख़िर में क्या हुआ! 2019 के आम चुनावों के बाद सरकार ने उन्हीं आँकड़ों को स्वीकार किया।

कोरोना के काल से पहले ही देश की आर्थिक स्थिति ख़राब होने लगी थी। कोविड महामारी से ठीक पहले 2019-20 में भारत की जीडीपी में केवल 3.7% की वृद्धि हुई। कोरोना के बाद तो बेरोजगारी की स्थिति बेहद ख़राब हुई। 2021 में कोरोना की दूसरी लहर ख़त्म होने के बाद थोड़े हालात बेहतर तो हुए हैं, लेकिन रोजगार की स्थिति में ज्यादा सुधार होता नहीं दिख रहा है। तभी तो दत्तात्रेय होसबले ने श्रम बल सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा है कि हमारे यहाँ 7.6% की बेरोजगारी दर है।

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ग़रीबी

2011 के बाद से गरीबी दर पर कोई अपडेट नहीं किया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत सरकार ने पिछले उपभोग व्यय सर्वे यानी सीईएस (2017-18 के लिए) के निष्कर्षों की अवहेलना की। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार सीईएस 2017-18 ने दिखाया था कि चार दशकों में पहली बार उपभोग व्यय में गिरावट आई है। ऐसे में यदि सीईएस 2017-18 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता, तो गरीबी का अनुमान तेजी से बढ़ता। अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में दो शिक्षाविदों, संतोष मेहरोत्रा ​​और जाजति परिदा ने देश में गरीबी के स्तर की स्थिति का अनुमान लगाने के लिए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण यानी पीएलएफ़एस के उपभोग व्यय डेटा का इस्तेमाल किया।

इसमें दिखता है कि भारत गरीबी में तेजी से कमी लाने में सक्षम रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति ठीक नहीं रही है।

1973 में गरीबी भारत की जनसंख्या की लगभग 55% से कम होकर 2011 में 21.9 फ़ीसदी रह गई। 2019 में यह 20% तक रह गयी। हालाँकि, 2011 और 2019 के बीच की अवधि में गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या में वृद्धि देखी गई।

केवल तेंदुलकर गरीबी रेखा का उपयोग करते हुए, 2004 और 2011 के बीच गरीब लोगों की कुल संख्या में 137.4 मिलियन की गिरावट आई और फिर 2011 और 2019 के बीच 76.5 मिलियन की वृद्धि हुई।

गरीबी रेखा का पिछला संशोधन प्रोफेसर सुरेश तेंदुलकर के नेतृत्व वाली समिति ने एक दशक से भी पहले किया था। तेंदुलकर गरीबी रेखा शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 29 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति 22 रुपये प्रति दिन का उपभोग व्यय था। तेंदुलकर के संशोधन से पहले भारत की गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 12 रुपये और शहरी क्षेत्रों के लिए 17 रुपये थी।

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जब ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने अक्टूबर 2021 में भारत को 116 देशों में से 101वें पर स्थान रखा तो महिला और बाल विकास मंत्रालय ने उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। इसने दावा किया कि इस्तेमाल की जाने वाली पद्धति अवैज्ञानिक थी। 

असमानता

भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक है। विश्व विषमता रिपोर्ट के अनुसार भारत की शीर्ष 10% आबादी की आय नीचे के 50% लोगों की आय का 22 गुना है। 12 लाख रुपये की वार्षिक आय वाले लोग देश के शीर्ष 10% लोगों में शामिल हैं। देश की औसत आय सिर्फ 2 लाख रुपये है। हालाँकि, शीर्ष 1% की औसत वार्षिक आय 44 लाख रुपये से अधिक है।

ख़ास ख़बरें

सरकार ने असमानता की इस रिपोर्ट पर भी सवाल उठाया था। पिछले साल दिसंबर में जारी विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 में पाया गया कि बढ़ती असमानताओं के मामले में भारत सबसे खराब स्थिति वाले देशों में से एक में है। हालाँकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रिपोर्ट को "त्रुटिपूर्ण" बताते हुए निष्कर्षों को खारिज कर दिया और कहा कि रिपोर्ट तैयार करने के लिए 'संदिग्ध पद्धति' का इस्तेमाल किया गया।

लेकिन सवाल है कि जब सरकार पहले ऐसी रिपोर्टों को संदिग्ध बताती रही है तो क्या अब वह उन रिपोर्टों को स्वीकार करेगी? यह सवाल ख़ासकर इसलिए कि इन्हीं मुद्दों पर आरएसएस अब सवाल खड़े कर रहा है।

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