देश में इस समय चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, IIT बॉम्बे के एक छात्र की आत्महत्या और UPI लेनदेन पर प्रस्तावित Merchant Discount Rate यानी MDR को लेकर बहस चल रही है। विपक्ष, नागरिक संगठन, छात्र समूह और सामाजिक कार्यकर्ता इन मुद्दों पर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर भी गंभीर राजनीतिक सवाल खड़े किए जा रहे हैं। मुंबई और दिल्ली में पिछले तीन दिनों में दो बड़े आंदोलन के तहत हज़ारों लोग सड़कों पर आये।
ऐसे समय में RSS से संबद्ध साप्ताहिक पत्रिका Organiser ने इन अलग-अलग विरोधों को लोकतांत्रिक असहमति के रूप में देखने के बजाय उन्हें एक कथित “Communist-Islamist cabal” (कम्युनिस्ट-इस्लामिस्ट साजिश) से जोड़ दिया है। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक ताज़ा संपादकीय में Organiser ने IIT बॉम्बे, चुनाव आयोग और UPI को लेकर चल रहे विवादों को एक ही राजनीतिक-वैचारिक अभियान का हिस्सा बताया।

  • यहां असली सवाल Organiser के आरोपों से भी बड़ा है-लक्या सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना अब राष्ट्र-विरोधी गतिविधि माना जाएगा?

लोकतंत्र में विरोध को साजिश बताने की राजनीति

Organiser के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने इन आंदोलनों को महज अलग-अलग नागरिक असंतोष नहीं माना। संपादकीय में आरोप लगाया गया कि इन मुद्दों को जाति, पहचान और राजनीतिक असंतोष से जोड़कर देश में एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर हो।
  • लेकिन इस तर्क में एक बुनियादी समस्या है।
यदि मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम हटता है और वह सवाल पूछता है, तो उसका जवाब यह होना चाहिए कि नाम क्यों हटाया गया। यदि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो आयोग को पारदर्शी तरीके से जवाब देना चाहिए। यदि किसी IIT छात्र की मौत के पीछे संस्थागत भेदभाव का आरोप लगता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। और यदि UPI पर शुल्क लगाने की योजना है तो उसके आर्थिक प्रभाव पर बहस होनी चाहिए।
  • इन सवालों का जवाब ‘कम्युनिस्ट’, ‘इस्लामिस्ट’ या ‘देशविरोधी’ कहकर देना लोकतांत्रिक बहस का विकल्प नहीं हो सकता।
ताज़ा ख़बरें
  • 2 अक्टूबर को दिल्ली और मुंबई में CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन भी हुए और दिल्ली में 500 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
  • यानी विरोध कोई काल्पनिक गतिविधि नहीं है। वह जमीन पर मौजूद राजनीतिक और नागरिक असंतोष है।

RSS के इतिहास का आईना दिखाना जरूरी क्यों?

Organiser आज विरोध प्रदर्शनों को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहा है। लेकिन RSS के इतिहास और भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति उसके शुरुआती रुख को भी इसी बहस में याद करना जरूरी है। यह कहना ऐतिहासिक रूप से अधिक सटीक होगा कि RSS ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन में केंद्रीय भूमिका नहीं निभाई। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख जनांदोलनों—असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन—का नेतृत्व कांग्रेस तथा अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने किया था।
RSS के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को लेकर संघ समर्थक और आलोचक लंबे समय से अलग-अलग दावे करते रहे हैं। इसलिए यह कहना कि “RSS का कोई भी व्यक्ति कभी स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल नहीं हुआ” ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक व्यापक दावा होगा। लेकिन यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि RSS एक संगठन के रूप में ब्रिटिश शासन के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले जनांदोलनों का प्रमुख हिस्सा नहीं बना। इस मुद्दे पर ऐतिहासिक विवाद दर्ज है।
आज वही संगठन जब हर जनआंदोलन को राष्ट्र-विरोधी साजिश की निगाह से देखने की कोशिश करता है, तो इतिहास के इस अध्याय पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सावरकर की दया-याचिकाएं और इतिहास की असहज स्मृति

RSS की वैचारिक परंपरा में विनायक दामोदर सावरकर का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सावरकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े थे और उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में दो आजीवन कारावास की सजा मिली थी। लेकिन उनके नाम से जुड़ी ब्रिटिश सरकार को भेजी गई दया-याचिकाएं आज भी इतिहास की बहस का हिस्सा हैं। एक याचिका में सावरकर ने स्वयं को “prodigal son” यानी भटका हुआ बेटा बताते हुए ब्रिटिश सरकार के प्रति समर्पण की भाषा इस्तेमाल की थी। इस दस्तावेज को लेकर इतिहासकारों और राजनीतिक धाराओं के बीच तीखा मतभेद रहा है।
सावरकर समर्थकों का तर्क है कि इन याचिकाओं को उनके व्यापक राजनीतिक और क्रांतिकारी संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। आलोचक इसे ब्रिटिश शासन से समझौते और माफी मांगने के प्रमाण के रूप में देखते हैं। इसलिए इतिहास को एकतरफा नारे में बदलने के बजाय सवाल यह है कि जिस राजनीति को अपने इतिहास की आलोचना स्वीकार नहीं, वह आज दूसरों की देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने की स्थिति में कैसे पहुंच गई?

संविधान पर Organiser का पुराना संपादकीयः इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज खुद Organiser के पुराने पन्नों में मिलता है। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान को अपनाए जाने के कुछ दिन बाद, 30 नवंबर 1949 को Organiser ने भारतीय संविधान की आलोचना की थी। उस संपादकीय में कहा गया था कि नए संविधान में “कुछ भी भारतीय” नहीं है और प्राचीन भारतीय संवैधानिक परंपराओं का पर्याप्त प्रतिबिंब नहीं है। उसी संदर्भ में मनुस्मृति को भारतीय संवैधानिक परंपरा के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

  • यानी आज जिस संविधान की शपथ लेकर सरकारें चलती हैं, जिस संविधान के तहत चुनाव आयोग काम करता है और जिसके अनुच्छेद नागरिकों को अभिव्यक्ति और विरोध का अधिकार देते हैं, उसके शुरुआती आलोचकों में Organiser भी शामिल था।
  • इसीलिए आज जब Organiser लोकतांत्रिक विरोध को “साजिश” बताता है तो यह सवाल पूछना जरूरी है:
  • क्या संविधान के तहत मिलने वाले विरोध के अधिकार को स्वीकार करने की यह यात्रा वास्तव में वैचारिक परिवर्तन है या सिर्फ राजनीतिक परिस्थितियों के मुताबिक भाषा का बदलाव?

मनुस्मृति बनाम संविधान: असली वैचारिक टकराव

यहां बहस सिर्फ एक पुराने संपादकीय की नहीं है। भारतीय संविधान ने नागरिकता को धर्म, जाति और जन्म की सामाजिक श्रेणियों से ऊपर रखकर समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार बनाया। दूसरी ओर मनुस्मृति को लेकर आधुनिक भारत में सबसे बड़ा विवाद उसके वर्ण और सामाजिक पदानुक्रम संबंधी प्रावधानों को लेकर रहा है।
डॉ. बीआर आंबेडकर ने जाति व्यवस्था की कठोर आलोचना की थी और संविधान के माध्यम से समान नागरिकता की व्यवस्था बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई। इसलिए गांधी और आंबेडकर को मार्क्स और माओ से बचाने का दावा करने से पहले यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि गांधी और आंबेडकर के भारत का मूल आधार क्या था- संवैधानिक लोकतंत्र या सामाजिक पदानुक्रम की पुरानी व्यवस्था?

आरक्षण पर भी रहा है विवाद

आरक्षण के सवाल पर RSS का रुख समय के साथ बदला और उसमें अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग स्वर सुनाई दिए हैं। RSS प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण पर बहस की बात कही है। बाद में RSS ने यह स्पष्ट किया कि वह SC, ST, OBC और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के आरक्षण का समर्थन करता है। लेकिन इतिहास यह भी दिखाता है कि RSS और उससे जुड़े संगठनों के भीतर आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था और उसके विस्तार को लेकर लगातार बहस रही है। Organiser ने विभिन्न मौकों पर आरक्षण और विशेष रूप से धार्मिक आधार पर आरक्षण के प्रस्तावों का विरोध किया है। इसलिए आज जब जाति और सामाजिक न्याय के सवालों पर होने वाले आंदोलनों को “राजनीतिक साजिश” कह दिया जाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सामाजिक असमानता पर सवाल उठाना भी अब राष्ट्र-विरोध माना जाएगा?

किसान आंदोलन भी ‘राजनीतिक साजिश’ थाः यह पहली बार नहीं है जब Organiser ने किसी बड़े जनआंदोलन को राजनीतिक साजिश के चश्मे से देखा हो। 2024 के किसान आंदोलन के दौरान भी Organiser ने किसानों के MSP कानून की मांग को “unreasonable” बताते हुए आंदोलन को “politically motivated” कहा था और इसे लोकतंत्र को बाधित करने वाली व्यापक रणनीति से जोड़ने की कोशिश की थी। यहां एक पैटर्न दिखाई देता है। जब नागरिक सड़क पर आते हैं तो सवाल आंदोलन के मुद्दे से हटकर आंदोलन की वैचारिक पहचान पर चला जाता है।

  • किसान हों तो “राजनीतिक”,
  • छात्र हों तो “वामपंथी”,
  • चुनाव पर सवाल उठाने वाले हों तो “कम्युनिस्ट-इस्लामिस्ट”,
  • और संस्थाओं से जवाब मांगने वाले हों तो “देशविरोधी”।
अगर हर असहमति के पीछे साजिश खोजी जाएगी तो फिर लोकतंत्र में असहमति बचेगी कहां?

SIR पर सवाल का जवाब ‘साजिश’ नहीं, पारदर्शिता है

SIR को लेकर सबसे गंभीर सवाल मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिकों के मताधिकार से जुड़े हैं। यदि लाखों नाम हटते हैं, तो सवाल पूछा जाएगा।
यदि किसी नागरिक को अपना नाम साबित करने के लिए दस्तावेज देने पड़ते हैं, तो सवाल पूछा जाएगा। यदि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर विपक्ष और नागरिक संगठन आपत्ति करते हैं, तो सवाल पूछा जाएगा। इन सवालों का समाधान केवल यह कह देना नहीं है कि विरोधी ताकतें भारत को बदनाम कर रही हैं। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता उसकी आलोचना रोकने से नहीं, बल्कि आलोचना का तथ्यात्मक और पारदर्शी जवाब देने से मजबूत होगी। और यही लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत है।

IIT छात्र की मौत को भी विचारधारा में क्यों बदला जाए?

IIT बॉम्बे के छात्र की आत्महत्या को लेकर Organiser ने जातिगत भेदभाव के आरोपों और आंदोलन पर सवाल उठाए हैं। लेकिन किसी छात्र की मृत्यु को राजनीतिक खेमेबंदी में बदलने के बजाय प्राथमिक प्रश्न होना चाहिए—क्या संस्थान में शिकायतों और मानसिक दबाव से निपटने की पर्याप्त व्यवस्था थी? क्या लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच हुई? क्या परिवार और छात्र की शिकायतों को गंभीरता से लिया गया? यदि जांच के बाद आरोप गलत साबित होते हैं तो वह तथ्य सामने आना चाहिए। लेकिन जांच से पहले ही आंदोलन को वैचारिक षड्यंत्र बता देना भी उतना ही खतरनाक है। मृत्यु का राजनीतिक इस्तेमाल गलत है, लेकिन मृत्यु से जुड़े सवालों को राजनीतिक लेबल लगाकर दबा देना भी लोकतांत्रिक रास्ता नहीं है।
UPI: आर्थिक नीति पर सवाल भी देशद्रोह?
UPI को भारत की बड़ी डिजिटल उपलब्धि माना जाता है। लेकिन किसी नीति की सफलता का अर्थ यह नहीं कि उसके हर प्रस्ताव पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए। UPI पर MDR को लेकर RSS परिवार के भीतर भी एक दिलचस्प मतभेद सामने आया है। जहां Organiser प्रस्तावित शुल्क को लेकर उठ रहे विरोध को राजनीतिक अभियान के संदर्भ में देखता है, वहीं RSS से जुड़े Swadeshi Jagran Manch ने MDR को लेकर सरकार के सामने गंभीर आपत्तियां रखी हैं।
  • तो क्या Swadeshi Jagran Manch भी “कम्युनिस्ट-इस्लामिस्ट कैबल” का हिस्सा है?
निश्चित रूप से नहीं। यही तथ्य Organiser के व्यापक आरोप को कमजोर करता है। 
  • नीति पर असहमति को देशद्रोह कहना तब और मुश्किल हो जाता है जब असहमति उसी वैचारिक परिवार के भीतर से भी उठ रही हो।

गांधी और आंबेडकर को किससे बचाने की जरूरत है?

Organiser ने अपने संपादकीय में गांधी और आंबेडकर को मार्क्स और माओ से “बचाने” की बात की है। लेकिन गांधी और आंबेडकर की विरासत को बचाने की सबसे पहली जरूरत किससे है? शायद उन लोगों से जो गांधी को केवल प्रतीक में और आंबेडकर को केवल प्रतिमा में बदल देना चाहते हैं, लेकिन उनके विचारों के असुविधाजनक हिस्सों से बचना चाहते हैं।
गांधी का लोकतांत्रिक असहमति पर जोर और आंबेडकर का संवैधानिक लोकतंत्र पर आग्रह—दोनों किसी भी सत्ता के लिए असुविधाजनक हो सकते हैं। 
आंबेडकर ने संविधान सभा में लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित नहीं माना था। उनके लिए लोकतंत्र एक सामाजिक जीवन-पद्धति भी था। इसलिए यदि कोई नागरिक चुनाव आयोग से सवाल करता है, मतदाता सूची पर आपत्ति करता है या सरकार की आर्थिक नीति का विरोध करता है तो उसे लोकतंत्र के दायरे से बाहर धकेलना गांधी और आंबेडकर की विरासत की रक्षा नहीं, बल्कि उसका संकुचन होगा।

असली खतरा विरोध नहीं, सवाल से डरना है

आज Organiser के संपादकीय को केवल एक पत्रिका का लेख मानकर छोड़ देना आसान है। लेकिन इसके पीछे छिपे राजनीतिक तर्क को समझना जरूरी है। तर्क यह है कि अलग-अलग असंतोषों के पीछे कोई बड़ा षड्यंत्र है। लेकिन लोकतंत्र में अलग-अलग लोगों के अलग-अलग मुद्दों पर एक साथ सवाल उठाने का अर्थ हमेशा षड्यंत्र नहीं होता। कभी-कभी इसका अर्थ यह भी होता है कि लोगों को वास्तव में व्यवस्था से शिकायत है। SIR पर सवाल हैं क्योंकि मताधिकार महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग पर सवाल हैं क्योंकि चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं। IIT छात्र की मौत पर सवाल हैं क्योंकि संस्थानों की जवाबदेही जरूरी है। UPI पर सवाल हैं क्योंकि आर्थिक नीतियों का असर नागरिकों और कारोबारियों पर पड़ता है। और इन सवालों को दबाने के बजाय उनका जवाब देना ही लोकतंत्र की ताकत है।
जिस लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना अपराध जैसा बना दिया जाए, वहां गांधी और आंबेडकर को मार्क्स और माओ से नहीं, बल्कि असहमति से डरने वाली राजनीति से बचाने की जरूरत है।