आरएसएस का मुखपत्र ऑर्गनाइज़र और पॉन्चजन्य देश की आजादी के बाद भारतीय संविधान को खारिज कर चुके हैं और उसकी जगह मनुस्मृति लागू करने की बात कही थी। अब उसी अखबार ने सोनिया गांधी और यूपीए शासनकाल में बनाई गई एनएसी (राष्ट्रीय सलाहकार समिति) को दिमागी नक्सल बताया है। ऑर्गनाइज़र और पॉन्चजन्य जब कोई चीज़ लिखते हैं तो उसे आरएसएस द्वारा कही गई बात मानी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था। लेकिन सारा विवाद अब एक नए स्तर पर पहुंच गया है। ऑर्गनाइजर (Organizer) ने अपने ताजा अंक में इस शब्द की परिभाषा को व्यापक करते हुए सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली यूपीए सरकार की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (NAC) को ‘दिमागी नक्सलियों का शासन पर कब्जा’ करार दिया है।
ऑर्गनाइजर के संपादकीय में किसान, छात्र और अन्य आंदोलनों को हिंदुत्व के खिलाफ एक व्यापक अभियान से जोड़ने की कोशिश की गई है। संपादक प्रफुल्ल केतकर ने आरोप लगाया कि अलग-अलग आंदोलनों के पीछे इस्लामिस्ट, माओवादी, मिशनरी, कार्यकर्ता, एनजीओ, कुछ बुद्धिजीवी, कानूनी पेशेवर, बॉलीवुड और मीडिया के कुछ हिस्सों का एक गठजोड़ काम कर रहा है। यानी ऑर्गनाइज़र यह कहना चाहता है कि जो भी संगठन सरकार के विरोध में खड़ा है वो दिमागी नक्सल है। उसने मिशनरी, एनजीओ, बॉलीवुड और कुछ पत्रकारों को भी इसी श्रेणी में शामिल कर लिया।

क्या है ‘दिमागी नक्सल’ का नया विवाद?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से दिए अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में कहा था कि भारत ने जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ अभी मौजूद हैं और वे हिंसा तथा अशांति पैदा करने का मौका तलाशते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने तथा युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही थी।
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विपक्ष की ओर से इस बयान पर सवाल उठाए जाने के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई दी थी कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा है। रिजिजू ने सोशल मीडिया पर इसकी अपनी परिभाषा देते हुए कहा था कि इसमें वे लोग शामिल हैं जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और संविधान को नहीं मानते, अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं या अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं तथा कथित तौर पर पूर्वोत्तर को देश से अलग करने की कोशिश करते हैं।
ऑर्गनाइजर के संपादकीय ने इस बहस को सीधे सोनिया गांधी और यूपीए दौर की नीतियों से जोड़ दिया है।

आरएसएस का पूरा कुनबा दिमागी नक्सल से परेशान?

संपादकीय में प्रफुल्ल केतकर ने लिखा कि ‘दिमागी नक्सल’ बंदूक लेकर नहीं चलते, बल्कि वे ‘प्रख्यात इतिहासकार या बुद्धिजीवी’, पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार, कानूनी विशेषज्ञ, मानवाधिकार कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, अभिनेता-अभिनेत्री और पर्यावरणविद् जैसे रूपों में काम करते हैं। उनका आरोप है कि ऐसे लोग शहरों में सक्रिय रहकर छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, किसानों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों के नाम पर अलग-अलग ‘फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन’ तैयार करते हैं।
इसी संदर्भ में संपादकीय ने सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल को निशाना बनाया। इसमें कहा गया कि सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की NAC ‘दिमागी नक्सलियों का शासन पर कब्जा’ थी। संपादकीय के मुताबिक, नौकरशाही, नीति निर्माण, कानूनी व्यवस्था, अकादमिक संस्थानों, मीडिया और एनजीओ में प्रवेश करना कथित ‘दिमागी नक्सल’ रणनीति का हिस्सा है।

सोनिया गांधी और NAC का इतिहास

नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की स्थापना 2004 में यूपीए सरकार के दौरान हुई थी। इसका उद्देश्य सरकार को नीतिगत मामलों में सलाह देना था। सोनिया गांधी इसकी अध्यक्ष थीं। NAC की सिफारिशों का संबंध कई महत्वपूर्ण सामाजिक और कल्याणकारी नीतियों से रहा। इनमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, सूचना का अधिकार कानून, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, मिड-डे मील योजना, जवाहरलाल नेहरू अर्बन रिन्यूअल मिशन और राष्ट्रीय पुनर्वास नीति जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। मनरेगा और आरटीआई इस काउंसिल की सबसे बड़ी देन हैं।
NAC में शिक्षाविदों, सामाजिक क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया गया था। सोनिया गांधी ने 2004 से मई 2006 तक NAC की अध्यक्षता की। ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ विवाद के बीच उन्होंने NAC और लोकसभा दोनों से इस्तीफा दे दिया था। बाद में 2010 में पुनर्गठित NAC में उन्होंने फिर अध्यक्ष पद संभाला।

संघ को ‘सिविल सोसाइटी और उसके लोग दिमागी नक्सल नज़र आते हैंः ऑर्गनाइजर के संपादकीय में सिविल सोसाइटी की भूमिका पर भी तीखा हमला किया गया है। इसमें दावा किया गया कि ‘दिमागी नक्सल’ सिविल सोसाइटी को संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ प्रतिरोध के औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। संपादकीय का तर्क है कि लोकतांत्रिक तरीकों के जरिये लोकतंत्र को कमजोर करना उनकी कथित रणनीति है। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे लोग अत्यधिक शिक्षित होते हैं और कई बार वास्तविक समस्याएं उठाते हैं, लेकिन उनके ज्ञान और बौद्धिक क्षमता का इस्तेमाल कथित तौर पर ‘विनाशकारी उद्देश्यों’ के लिए किया जाता है।

सोशल मीडिया और बड़ी टेक कंपनियों पर भी आरोप

ऑर्गनाइजर ने इस कथित नेटवर्क में बड़ी टेक कंपनियों की भूमिका का भी आरोप लगाया है। संपादकीय के मुताबिक, एजेंडा-आधारित व्यक्ति और संगठन सोशल मीडिया के जरिए लोगों के दिमाग को प्रभावित करते हैं। इसमें दावा किया गया कि बड़ी टेक कंपनियों के ‘हैंडलर और फंडर’ के एल्गोरिदम इन लोगों को फायदा पहुंचाते हैं और उन्हें बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित करने में मदद करते हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों के पीछे भी दिमागी नक्सल

संपादकीय में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास मॉडल में व्यापक सुधार की जरूरत को स्वीकार किया गया है। लेकिन साथ ही कहा गया कि ये समस्याएं न तो पिछले 12 वर्षों में पैदा हुई हैं और न ही केवल बीजेपी शासित राज्यों तक सीमित हैं। ऑर्गनाइजर का आरोप है कि इन मुद्दों को उठाने के पीछे असली उद्देश्य हिंदुत्व को ‘वर्चस्व’ के रूप में पेश करना और अलग-अलग पहचान को गैर-हिंदू पहचान के रूप में खड़ा करना है।

किसान और छात्र आंदोलनों को भी जोड़ाः आरएसएस के अखबार के संपादकीय ने विभिन्न आंदोलनों के बीच एक कथित पैटर्न होने का दावा किया है। इसमें कहा गया कि कट्टरपंथी इस्लामिस्ट, माओवादी और ईसाई मिशनरी, चुनिंदा बुद्धिजीवी, कानूनी पेशेवर, एनजीओ, बॉलीवुड से जुड़े लोग, सांस्कृतिक संगठन और मीडिया प्लेटफॉर्म मिलकर आंदोलनों को प्रभावित कर रहे हैं। इसके मुताबिक, किसान आंदोलनों से लेकर छात्र आंदोलनों तक का अंतिम असर हिंदू पहचान के खिलाफ जाता है।

अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक Gene Sharp भी दिमागी नक्सल

ऑर्गनाइजर ने अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक जीन शार्प (Gene Sharp) का भी उल्लेख किया है। शार्प अहिंसक राजनीतिक संघर्ष और रणनीतिक प्रतिरोध पर अपने काम के लिए जाने जाते थे। उन्होंने 1983 में Albert Einstein Institution की स्थापना की थी। संपादकीय ने शार्प को ‘Boston-based Dimagi’ बताते हुए आरोप लगाया कि चुनावों को बदनाम करना, सरकारी नीतियों और विधायी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाना, अलग-अलग समूहों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना और निर्वाचित सरकार की वैधता को कमजोर करना कथित रणनीति के हिस्से हैं। संपादकीय ने इस संदर्भ में ‘अवार्ड वापसी’ अभियान से लेकर कथित ‘दिमागी नक्सल पार्टी’ तक को जोड़कर देखने की बात कही है।

आरएसएस का अखबार हर असहमति को दिमागी नक्सल से जोड़ रहा 

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री के भाषण के बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द की राजनीतिक व्याख्या अब केवल माओवादी विचारधारा के आरोप तक सीमित नहीं रह गई है। RSS से जुड़े साप्ताहिक के संपादकीय ने इसे यूपीए दौर की संस्थाओं, सिविल सोसाइटी, बुद्धिजीवियों, आंदोलनों और मीडिया तक विस्तारित कर दिया है। इससे कांग्रेस और बीजेपी के बीच वैचारिक टकराव और तेज होने की संभावना है। खासकर सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली NAC को सीधे ‘दिमागी नक्सलियों का शासन पर कब्जा’ बताए जाने से यह मुद्दा कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन सकता है।
वहीं, सरकार की ओर से पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि प्रधानमंत्री का निशाना विपक्षी नेताओं पर नहीं था। रिजिजू ने ‘दिमागी नक्सल’ की अपनी परिभाषा में संविधान-विरोध, माओवादी समर्थन और अलगाववाद को आधार बताया था। यानी विवाद अब सिर्फ एक राजनीतिक शब्द के इस्तेमाल का नहीं है। यह सवाल भी उठ रहा है कि लोकतांत्रिक असहमति, सामाजिक आंदोलनों, सिविल सोसाइटी और सरकार की आलोचना की सीमा कहां तक है और किस बिंदु पर किसी व्यक्ति या संगठन को ‘दिमागी नक्सल’ की श्रेणी में रखा जाएगा।