सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सबरीमाला मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि अगर कोई धार्मिक प्रथा या अंधविश्वास सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य को नुक़सान पहुँचाता है तो अदालतें उसे रद्द कर सकती हैं। संसद या विधानसभा के पास धार्मिक सुधार का अधिकार है, लेकिन इससे अदालतों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति ख़त्म नहीं होती। अदालत की यह टिप्पणी तब आई है जब इसकी सुनवाई करने वाली बेंच में शामिल जजों ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की जोरदार पैरवी की है।
यह टिप्पणी 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने की। बेंच की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं। बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमल्या बागची शामिल हैं।

सबरीमाला मंदिर केस

यह सुनवाई सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2018 के फ़ैसले की समीक्षा से जुड़ी है। 2018 में 4:1 बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। अब 9 जजों की बेंच बड़े संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है– अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है? अदालतें धार्मिक प्रथाओं में कितना हस्तक्षेप कर सकती हैं? यह सीधे 2018 के फैसले को रद्द नहीं कर रही, बल्कि व्यापक मुद्दों पर विचार कर रही है।

केंद्र सरकार का तर्क

बुधवार को केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालतें यह फ़ैसला नहीं कर सकतीं कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। यह काम केवल विधायिका यानी संसद या विधानसभा का है। उन्होंने अनुच्छेद 25(2)(बी) का हवाला दिया, जिसमें सरकार को धार्मिक सुधार करने का अधिकार दिया गया है।

सॉलिसिटर जनरल की आपत्ति क्या?

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा, 'अगर कोई अंधविश्वास वाली प्रथा है तो अदालत को यह नहीं कहना चाहिए कि यह अंधविश्वास है। विधायिका इसे सुधार सकती है।' उन्होंने महाराष्ट्र और कर्नाटक के ब्लैक मैजिक और अंधविश्वास रोकने वाले क़ानूनों का उदाहरण दिया। उन्होंने आगे कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन जज क़ानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं। इसलिए अदालत को किसी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास कहकर रद्द नहीं करना चाहिए। भारत में बहुत सारी विविधताएं हैं- एक राज्य में जो धार्मिक लगे, दूसरे में वह अंधविश्वास लग सकता है।

अदालत का जवाब

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मेहता से कहा कि "आपने इसे बहुत सरलीकृत कर दिया। अदालत के पास न्यायिक समीक्षा का अधिकार है कि वह तय कर सके क्या अंधविश्वास है। उसके बाद विधायिका को कानून बनाना है।”
जस्टिस जॉयमल्या बागची ने पूछा, 'अगर जादू-टोना को धार्मिक प्रथा माना जाए तो क्या आप उसे अंधविश्वास कहेंगे?' सॉलिसिटर जनरल ने हां कहा। जस्टिस बागची ने आगे कहा कि अगर कोई प्रथा भेदभाव वाली है और उस पर कोई क़ानून नहीं बना है तो अदालत अनुच्छेद 32 या 226 के तहत उसे रद्द कर सकती है, खासकर अगर वह जन स्वास्थ्य, नैतिकता या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ हो।

सीजेआई की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, 'जैसे ही कोई ऐसी प्रथा सामने आएगी जो मानव बलि, नरभक्षण या जादू-टोना जैसी हो, अदालत साफ़ कह देगी कि यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य का उल्लंघन है।'
जस्टिस एमएम सुंदरेश ने कहा कि धार्मिक मामलों में अदालतों को संयम बरतना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अदालतों की पूरी शक्ति ख़त्म हो जाए। जस्टिस सुंदरेश ने चेतावनी दी कि अदालतें धर्म में तर्क या विज्ञान लागू नहीं कर सकतीं। सिर्फ वही प्रथाएं रद्द की जा सकती हैं जो साफ तौर पर गलत हों, जैसे सती प्रथा।

जरूरी धार्मिक प्रथा पर क्या कहा?

बेंच ने चर्चा की कि अदालतें जरूरी धार्मिक प्रथा तय करते समय केवल उस धर्म की अपनी फिलॉसफी से देखें, किसी दूसरे धर्म की नजर से नहीं। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा, 'कोर्ट को उस धर्म की फिलॉसफी के लेंस से देखना चाहिए। अगर प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के खिलाफ है, तो अदालत उसे रद्द कर सकती है।'

'महिलाएँ तीन दिन 'अछूत' नहीं मानी जा सकतीं'

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर एक दिन पहले ही अहम टिप्पणियाँ की हैं। यह टिप्पणियाँ 9-जजों की संविधान पीठ के सामने सबरीमाला मामले में 2018 के फैसले की समीक्षा की सुनवाई के पहले दिन आईं। जस्टिस नागरत्ना ने मंगलवार को कहा था कि "एक महिला को हर महीने तीन दिन 'अछूत' नहीं माना जा सकता है और फिर चौथे दिन अचानक अछूतपन खत्म हो जाए।” उन्होंने कहा कि 'अगर कोई सामाजिक बुराई को धार्मिक प्रथा का रंग दे दिया जाए तो अदालत निश्चित रूप से दोनों के बीच अंतर कर सकती है और हस्तक्षेप कर सकती है।'

धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक हस्तक्षेप?

उन्होंने साफ़ किया कि सामाजिक कुरीतियों को धार्मिक आस्था का हिस्सा बनाकर अदालत से बचाया नहीं जा सकता। अदालतें ऐसे मामलों में भेदभाव की समीक्षा कर सकती हैं। ये टिप्पणियाँ तब आईं थीं जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फैसले में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को “अनटचेबिलिटी” कहने पर आपत्ति जताई थी। जस्टिस नागरत्ना ने इसे वास्तविकता के आधार पर चुनौती दी।

अभी सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि अंधविश्वास या हानिकारक प्रथाओं पर अदालतों का दरवाजा बंद नहीं किया जा सकता है। यह फैसला आने वाले समय में कई धार्मिक प्रथाओं, महिलाओं के अधिकार और अंधविश्वास विरोधी कानूनों पर असर डाल सकता है।