सामाजिक सुधार के लिए क्या धर्म में राज्य का दखल हो सकता है और यदि हाँ तो क्या हर जगह इस पर एक जैसा ही नियम लागू हो सकता है? मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर राज्य धर्म में हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन अदालत भविष्य के लिए कोई एक सामान्य नियम नहीं बना सकती। हर मामला अपने आप में अलग होगा। सीजेआई की अध्यक्षता में 9 जजों वाली यह संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बड़े संवैधानिक सवाल पर सुनवाई कर रही थी।
इस नौ जजों की संवैधानिक बेंच में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जोयमल्या बागची शामिल थे।

CJI का बड़ा बयान

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा, 'सामाजिक कल्याण और सुधार बहुत व्यापक शब्द है। राज्य लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। अगर लोग किसी सामाजिक बुराई को दूर करना चाहते हैं तो राज्य क़ानून बना सकता है। लेकिन हम भविष्य के लिए कोई सामान्य गाइडलाइन नहीं बना सकते। यह हर केस पर निर्भर करेगा कि क्या यह अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत सुधार है या फिर धर्म के मामले में अनुचित हस्तक्षेप।'
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सीजेआई ने यह भी कहा कि राज्य सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए काम कर सकता है, लेकिन अदालत हर मामले को अलग-अलग देखेगी।

सबरीमाला पर जस्टिस नागरत्ना का सवाल

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक अहम सवाल पूछा– अगर केरल सरकार सामाजिक सुधार के नाम पर क़ानून बनाकर 10 से 50 साल की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दे, तो क्या यह धर्म के मामले में हस्तक्षेप माना जाएगा या वैध सुधार?
सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि अदालत को पहले उस परंपरा की जांच करनी होगी। अगर कोई परंपरा प्राचीन है, किसी संप्रदाय की रिवाज या कस्टम का हिस्सा है और भक्तों के पूजा अधिकार को पूरी तरह छीन नहीं रही, तो उसे सम्मान देना चाहिए। उन्होंने कहा, 'सामाजिक सुधार का नाम लेकर धर्म की आजादी में घुसपैठ नहीं होनी चाहिए। यह सिर्फ बहाना नहीं बनना चाहिए। अदालत को सच्ची जांच करनी होगी।'

जस्टिस जोयमल्या बागची ने कहा कि अनुच्छेद 25(2)(बी) राज्य को सामाजिक सुधार के लिए सीमित अधिकार देता है। सामान्य क़ानून धार्मिक संस्थानों की संपत्ति प्रबंधन पर लागू हो सकते हैं, लेकिन सीधे धार्मिक मामलों में दखल के लिए सख्ती से सुधार का औचित्य साबित करना होगा।

जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या राज्य डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पॉलिसी यानी नीति निर्देशक तत्व या मौलिक कर्तव्यों का हवाला देकर धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है? गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि सती प्रथा जैसी घृणित प्रथाओं को तो रोका जा सकता है, लेकिन हर सुधार में धर्म और राज्य के बीच सीधा संबंध साबित करना ज़रूरी है। वरना अनुच्छेता 25(2)(बी) धर्म की आजादी में चुपके से घुसपैठ बन सकता है।
गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि Essential Religious Practice यानी आवश्यक धार्मिक प्रथा के टेस्ट को पूरी तरह खारिज नहीं करना चाहिए। यह उन झूठी या अंधविश्वास वाली प्रथाओं को रोकने का औजार है जो धर्म का नाम लेकर चलाई जाती हैं। 
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जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अदालत को हर धार्मिक प्रथा को जरूरी या अनावश्यक बताने की ज़रूरत नहीं है। जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि जब अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत क़ानून बनता है तो आवश्यक धार्मिक प्रथा के टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती। बस देखना होता है कि क्या कोई धार्मिक प्रथा है या नहीं।
जस्टिस अरविंद कुमार ने पूछा कि अगर किसी धर्म में कई व्याख्याएं हैं तो अदालत किस आधार पर एक को दूसरी से ऊपर बताएगी? सुब्रमण्यम ने जवाब दिया कि अदालत सबूतों के आधार पर फैसला कर सकती है।

सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी

सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। यह मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है। इससे महिलाओं के मंदिर प्रवेश, धार्मिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन और राज्य के सुधार अधिकार जैसे बड़े सवालों पर फैसला होगा।
यह बहस भारत के संविधान में धर्म की आजादी और सामाजिक न्याय के बीच सही संतुलन खोजने की कोशिश है।