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जब यातना दी ही नहीं गई तो क्यों झूठ बोल रही हैं साध्वी प्रज्ञा?

बीजेपी की उम्मीदवार बनते ही साध्वी प्रज्ञा सिंह ने रोना शुरू कर दिया कि आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) के मुखिया शहीद हेमंत करकरे ने उन्हें हिरासत में यातना दी। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। उन्हें दिन भर पीटा जाता था और इतना पीटा जाता था कि उनका शरीर सुन्न पड़ जाता था। 

बीजेपी के बड़े नेता भी चीख़-चीख़ कर टीवी चैनलों पर कह रहे हैं कि एक ‘साध्वी’ के साथ इतना बुरा बर्ताव किया गया। ऐसी कोई बहस नहीं होती जिसमें इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं पेश किया जा रहा हो। लेकिन, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ये आरोप झूठे हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह को यातना नहीं दी गयी और यह बात सच साबित हो चुकी है। फिर भी रोज इस झूठ को फैलाया जा रहा है। सवाल उठता है आख़िर क्यों? 
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साध्वी प्रज्ञा सिंह को 2008 में महाराष्ट्र के मालेगाँव ब्लास्ट के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया था। उनपर ब्लास्ट कराने और इसकी साज़िश रचने का आरोप लगा था। इस ब्लास्ट में छह लोग मारे गये थे। हेमंत करकरे तब महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख थे। करकरे ने प्रज्ञा से पूछताछ की थी। प्रज्ञा और बीजेपी के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने यह आरोप लगाया था कि उसे कठोर यातनायें दी गयीं। इन आरोपों की जाँच हुई। जाँच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की। आयोग ने 2015 में यह पाया कि प्रज्ञा के आरोप सही नहीं हैं और हेमंत करकरे और उनकी टीम को क्लीन चिट दे दी। 

मुंबई हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में प्रज्ञा को यातना दिये जाने की बात सिद्ध नहीं हो पायी। इस बात की पुष्टि इस मामले में सरकारी वकील रहीं रोहिणी सालियान ने भी की है।
सालियान ने एनडीटीवी को दिये एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘निचली अदालत ने प्रज्ञा को यातना दिये जाने या ग़ैरक़ानूनी तरीके से गिरफ़्तार किये जाने का कोई सबूत नहीं पाया था। अदालत के इस फ़ैसले को मुंबई हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी। हाई कोर्ट ने भी प्रज्ञा के आरोपों को सही नहीं माना। हाई कोर्ट ने प्रज्ञा की मेडिकल रिपोर्ट की जाँच के बाद कहा कि यातना के आरोप ग़लत हैं।’’ 
सालियान ने मोदी सरकार बनने के बाद कहा था कि एनआईए ने उन्हें मालेगाँव ब्लास्ट में ‘धीरे चलने’ के लिए कहा था जिसका अर्थ था कि प्रज्ञा जैसे आतंकवाद के अन्य आरोपियों को भी बचाया जाये और उन्हें सजा न मिले।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अगस्त 2014 में आदेश दिया था कि प्रज्ञा के आरोपों की जाँच के लिए एक सीनियर पुलिस अधिकारी के अधीन जाँच कमिटी बनाई जाए। कमिटी बनी। सीआईडी पुणे के तत्कालीन डीआईजी (प्रशासन) आर.एस. खैरे के नेतृत्व वाली इस कमिटी में येरवडा केंद्रीय जेल के तत्कालीन उप-अधीक्षक के.एच. कुर्लेकर, सीआईडी पुणे के पुलिस निरीक्षक जे.एम. कुलकर्णी और पुणे में दक्षता समिति की सदस्य रश्मि जोशी शामिल थे। 
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कमिटी ने अपनी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को सौंपी। इस रिपोर्ट के आधार पर आयोग ने 8 जुलाई 2015 को कहा, “जो आरोप लगाए गये हैं उसे जेल, अदालत, संबंधित अस्पताल और एटीएस के रिकॉर्ड सिद्ध नहीं करते।” आयोग ने यह भी कहा था कि अब आयोग के दख़ल देने की ज़रूरत नहीं है और केस को बंद किया जाता है। 

‘मुंबई मिरर’ अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़, कमिटी की इस रिपोर्ट से चार साल पहले यानी 2011 में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर टिप्पणी की थी। मानवाधिकार आयोग के हवाले से कोर्ट ने कहा था, “प्रज्ञा की दो अस्पतालों में जाँच की गयी, उन्हें प्रज्ञा पर कोई घाव के निशान नहीं मिले।”

प्रज्ञा ने अब क्या कहा?

हैरानी की बात यह है कि जब उन्हें यातना दी ही नहीं गयी तो प्रज्ञा सिंह इसी सप्ताह 18 अप्रैल को हुए बीजेपी के एक कार्यक्रम में क्यों रो पड़ीं? प्रज्ञा सिंह ने क्यों कहा, “मुझे ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से 13 दिनों तक हिरासत में रखा। पहले ही दिन बिना कुछ पूछे पीटना शुरू कर दिया। चौड़ी बेल्ट से मारा जाता था। बेल्ट इतनी सख़्त होती थी कि एक बार में ही शरीर सूज जाता...। बेल्ट की मार से पूरा नर्वस सिस्टम सुन्न पड़ जाता था। वे दिन-रात पीटते थे।” उन्होंने रोते हुए कहा था, “मैं आपको अपनी पीड़ा नहीं बता रही हूँ। लेकिन इतना कह रही हूँ कि और कोई बहन आज के बाद इस पीड़ा का सामना न करे। पीटते-पीटते इतनी गंदी गालियाँ देते थे, कहते थे उल्टा लटका देंगे, तुझे निर्वस्त्र करेंगे। असहनीय है मेरे लिए कहना।” 

करकरे पर दिया था विवादित बयान 

इस बयान के बाद प्रज्ञा सिंह ने इसी सप्ताह मुंबई हमले में शहीद हुए पूर्व एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया था, जो अपमानजनक हैं। उन्होंने कहा था, “मैंने कहा तेरा (मुंबई एटीएस चीफ़ हेमंत करकरे) सर्वनाश होगा। ठीक सवा महीने में सूतक लगा है। जिस दिन मैं गई थी, उस दिन उसे सूतक लग गया था और ठीक सवा महीने में इसको आतंकवादियों ने मारा और उसका अंत हो गया।” हालाँकि चौतरफ़ा दबाव पड़ने के बाद उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया। 

उन्होंने कहा, “अगर किसी ने हमको प्रताड़ित किया तो हमने उसे कुछ कह दिया। यह बिल्कुल हमारा बयान होना चाहिए। लेकिन इससे देश के दुश्मनों को बल मिलता है। मैं यह बयान वापस लेती हूँ।” 

प्रज्ञा ठाकुर ने बयान तो वापस ले लिया पर प्रज्ञा के मन में कोई पश्चात्ताप नहीं दिखता। शहीद करकरे पर उनके भद्दे और घिनौने बयान के बाद जिस तरह से देश में ग़ुस्सा फैला उससे डर कर बीजेपी ने बयान वापस दिलवाया है।

क्या है मालेगाँव ब्लास्ट मामला?

आपको बता दें कि 9 सितंबर 2008 को उत्तरी महाराष्ट्र के मालेगाँव के मुसलिम बहुल इलाक़े में हुए बम विस्फोट के मामले में प्रज्ञा को एटीएस ने अक्टूबर 2008 में 11 संदिग्ध लोगों के साथ गिरफ़्तार किया था। इसमें सभी अभियुक्त हिन्दू थे। 

11 अभियुक्तों में प्रज्ञा के साथ स्वामी अमृतानंद उर्फ दयानंद पांडे, सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय और आर्मी अफ़सर प्रसाद श्रीकांत पुरोहित के नाम भी शामिल थे। सभी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया गया। इसी बीच 2008 में मुंबई आतंकी हमले में हेमंत करकरे शहीद हो गये। 

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प्रज्ञा ठाकुर को क़रीब नौ साल तक जेल में रहना पड़ा था। फ़िलहाल वह मेडिकल ग्राउंड पर ज़मानत पर बाहर हैं। उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चल रहा है। फिर भी बीजेपी ने प्रज्ञा को भोपाल से चुनाव लड़ाने का फ़ैसला किया है।आरएसएस की हमेशा तीख़ी आलोचना करने वाले दिग्विजय सिंह से उनका मुक़ाबला है। 

दिग्विजय पर यह आरोप लगता है कि उन्होंने हिंदू आतंकवाद का नाम दिया था। ज़ाहिर है कि बीजेपी प्रज्ञा के बहाने पूरे चुनाव को आतंकवाद की तरफ मोड़ देना चाहती है ताकि बेरोज़गारी, किसानी, ग़रीबी, बर्बाद होती अर्थव्यवस्था की तरफ़ लोगों का ध्यान न जाये। इसलिये प्रज्ञा से झूठ बुलवाया जा रहा है और यह सब सबकुछ चुनाव जीतने के लिये हो रहा है। 

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