Saharanpur Mosque Demolition: सहारनपुर में मस्जिद गिराये जाने पर जमात-ए-इस्लामी हिन्द के चेयरमैन मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि वक्फ में रजिस्टर्ड ऐतिहासिक मस्जिद को गिराया जाना देश के संविधान की तौहीन है। उन्होंने कहा कि 1911 से इस मस्जिद के सरकारी दस्तावेज उपलब्ध हैं।
सहारनपुर में डीएम कैंपस में मस्जिद गिरा दी गई। मस्जिद 70 साल पुरानी थी
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में शनिवार को ऐतिहासिक मस्जिद को गिराए जाने के मामले ने अब राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। मौलाना अरशद मदनी ने मस्जिद के ध्वस्तीकरण को बेहद अफसोसजनक बताते हुए इसे संविधान, कानून के राज और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े गंभीर सवालों का मामला बताया है।
मदनी ने कहा कि अगर देश में संविधान और कानून सभी नागरिकों के लिए समान हैं, तो उनके लागू किए जाने में दोहरा मापदंड क्यों दिखाई देता है? उनके मुताबिक, आज बुलडोजर न्याय का प्रतीक कम और बदले, पूर्वाग्रह तथा नफरत की राजनीति का औजार ज्यादा बनते जा रहे हैं।
‘मामला सिर्फ मस्जिद का नहीं, संविधान की सर्वोच्चता का है’
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह विवाद केवल एक मस्जिद को गिराए जाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिकों की समानता और राज्य की निष्पक्ष भूमिका जैसे बुनियादी सवाल जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि देश में पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 अभी भी लागू है। साथ ही नए वक्फ कानून में भी ‘Waqf by User’ यानी लंबे समय से धार्मिक उपयोग में रही संपत्ति से संबंधित प्रावधान मौजूद है।‘वक्फ बोर्ड में दर्ज है मस्जिद, पुराने दस्तावेज भी मौजूद’
मदनी के मुताबिक, संबंधित मस्जिद वक्फ बोर्ड में रजिस्ट्रेशन नंबर 451 के तहत दर्ज है। पुराने भूमि अभिलेखों में याकूब खान और वाहिद खान के नाम भी दर्ज होने का दावा किया गया है। उन्होंने कहा कि मस्जिद कमेटी ने अदालत के सामने वर्ष 1911 से संबंधित दस्तावेज, नगरपालिका के रिकॉर्ड और पुराने राजस्व अभिलेख पेश किए थे। कमेटी का दावा था कि यह मस्जिद मौजूदा कलेक्ट्रेट भवन के निर्माण से भी पहले से मौजूद थी।मदनी ने सवाल उठाया कि जब इस तरह के ऐतिहासिक और कानूनी दस्तावेज अदालत के सामने रखे गए थे, तो उन्हें नजरअंदाज करते हुए मस्जिद को गिराने की कार्रवाई क्यों की गई? उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति न्याय की प्रक्रिया और उसके मानकों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
‘अतिक्रमण है तो हर धर्म के लिए एक जैसा कानून हो’
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख ने कहा कि यदि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा या अतिक्रमण किसी धार्मिक ढांचे के खिलाफ कार्रवाई का आधार है, तो यही मापदंड हर धर्म और समाज के हर वर्ग पर समान रूप से लागू होना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकारी जमीन, सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर दशकों से मौजूद दूसरे धार्मिक स्थलों के खिलाफ भी क्या प्रशासन उसी तेजी, सख्ती और मानक के साथ कार्रवाई करता है? मदनी ने कहा कि यदि ऐसा नहीं होता और किसी एक धार्मिक स्थल के खिलाफ असाधारण कठोरता दिखाई जाती है, तो यह समान न्याय के सिद्धांत के विपरीत दिखाई देता है।‘भारत किसी एक धर्म का देश नहीं’
मदनी ने कहा कि भारत किसी एक धर्म या समुदाय का नहीं है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और दूसरे सभी धर्मों के लोग इस देश को अपनी साझा मातृभूमि मानते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान ने किसी को प्रथम श्रेणी का नागरिक और किसी को द्वितीय श्रेणी का नागरिक नहीं बनाया है। इसलिए उनकी मांग किसी विशेष रियायत की नहीं, बल्कि समान न्याय की है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी मस्जिद पर एक कानून लागू होता है तो वही कानून दूसरे धार्मिक स्थलों पर भी लागू क्यों नहीं होना चाहिए? अगर किसी मुस्लिम नागरिक के लिए एक मानक है, तो वही मानक दूसरे नागरिकों पर भी लागू होना चाहिए।मदनी के मुताबिक, “अगर संविधान और कानून सबके लिए हैं, तो उनकी सुरक्षा और उनका पालन भी सबके लिए समान होना चाहिए।”
सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद का विवाद क्या है
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद पुरानी मस्जिद को लेकर विवाद उस समय गहरा गया जब प्रशासन ने इसके ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। मस्जिद से जुड़े लोगों की ओर से इसकी ऐतिहासिकता और पुराने राजस्व एवं नगरपालिका रिकॉर्ड का हवाला दिया गया है। मस्जिद कमेटी का मुख्य तर्क रहा है कि यह धार्मिक स्थल काफी पुराना है और इसके अस्तित्व से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध हैं। कमेटी ने अदालत के समक्ष 1911 के दस्तावेजों सहित पुराने रिकॉर्ड प्रस्तुत किए जाने की बात कही है।दूसरी ओर, प्रशासनिक कार्रवाई का मूल सवाल जमीन के स्वामित्व, सरकारी भूमि पर निर्माण और कथित अतिक्रमण से जुड़ा है। यही वजह है कि विवाद अब केवल एक स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक स्थलों, वक्फ संपत्तियों, सरकारी भूमि और कानून के समान अनुप्रयोग को लेकर व्यापक बहस का विषय बन गया है।
इस पूरे मामले में एक अहम कानूनी सवाल यह भी है कि पुराने धार्मिक स्थलों से जुड़े दावों और दस्तावेजों की जांच किस प्रक्रिया के तहत की जानी चाहिए और ध्वस्तीकरण जैसी कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को किस स्तर तक कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
विवाद के केंद्र में तीन बड़े सवाल
- पहला, क्या मस्जिद की जमीन और निर्माण से जुड़े पुराने दस्तावेजों की पर्याप्त कानूनी जांच की गई?
- दूसरा, यदि निर्माण को अतिक्रमण माना गया है तो क्या देशभर में समान परिस्थितियों वाले सभी धार्मिक ढांचों के लिए एक जैसा मापदंड अपनाया जाता है?
- तीसरा, धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में प्रशासनिक कार्रवाई और संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता तथा समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
मौलाना अरशद मदनी का बयान इसी व्यापक बहस को सामने लाता है। उनका जोर इस बात पर है कि कानून की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है जब उसका इस्तेमाल धर्म, समुदाय या राजनीतिक पहचान से परे समान रूप से किया जाए।