क्या किशोरों के बीच प्रेम संबंध में पोक्सो एक्ट का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है? कम से कम सुप्रीम कोर्ट तो यही मानता है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पोक्सो एक्ट में 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' जोड़ने पर विचार करने को कहा है। यह क्लॉज उन किशोरों को बचाएगा जो आपसी सहमति से प्रेम संबंध बनाते हैं और जिनकी उम्र में बहुत कम अंतर होता है, लेकिन कानून की सख्त धाराओं के कारण लड़के को जेल हो जाती है।

दरअसल, कोर्ट ने बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बने पोक्सो एक्ट के बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। यह अहम टिप्पणी जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने एक फैसले के अतिरिक्त नोट में की। कोर्ट ने फ़ैसले की कॉपी कानून सचिव को भेजने का आदेश दिया ताकि सरकार इस समस्या को रोकने के कदम उठाए, जिसमें 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' लाना और कानून का गलत इस्तेमाल करने वालों पर कार्रवाई का प्रावधान शामिल है।

क्या है रोमियो-जूलियट क्लॉज?

यह एक कानूनी छूट है जो अमेरिका जैसे कई देशों में लागू है। इसमें अगर दो किशोर आपसी प्यार में शारीरिक संबंध बनाते हैं और उनकी उम्र में सिर्फ 2-4 साल का फर्क हो तो इसे बलात्कार नहीं माना जाता। भारत में पोक्सो के तहत 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ कोई भी संबंध अपराध है, भले ही सहमति हो। इससे कई बार लड़के को उम्रकैद तक की सजा हो जाती है।

कोर्ट ने क्या कहा?

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस संजय करोल ने लिखा, 'पोक्सो के तहत लड़की के परिवार द्वारा लड़के के ख़िलाफ़ शिकायत करना आम हो गया है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे उनके प्रेम संबंध को पसंद नहीं करते। इससे कई युवा लड़के जेल में सड़ रहे हैं।' कोर्ट ने कहा कि यह कानून नेक इरादे से बना है, लेकिन जब इसका दुरुपयोग होता है तो न्याय का मतलब ही उल्टा हो जाता है।
कोर्ट ने दो तरह के मामलों की बात की। इसने कहा कि असली यौन शोषण के शिकार बच्चे डर और गरीबी के कारण चुप रह जाते हैं। लेकिन पढ़े-लिखे और पैसे वाले लोग लड़की की उम्र गलत बताकर या रिश्ते को तोड़ने के लिए कानून का फायदा उठाकर बदला लेते हैं।

यह फ़ैसला किस मामले में आया?

यह फ़ैसला उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर आया, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक आरोपी को अंतरिम जमानत दी थी। हाई कोर्ट ने पीड़िता की उम्र में विरोधाभास देखा और मेडिकल जांच का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के कुछ निर्देशों को रद्द कर दिया और कहा कि जमानत के समय हाई कोर्ट जांच एजेंसी को मेडिकल टेस्ट का आदेश नहीं दे सकता। इसने कहा कि उम्र तय करने के लिए पहले स्कूल सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेज देखें, फिर आखिरी उपाय के रूप में मेडिकल टेस्ट हो।

कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला दिया और कहा कि ऐसे मामलों में देखना चाहिए कि रिश्ते कैसा है और दोनों की मंशा क्या है। पीड़िता का बयान अगर सहमति और प्यार से है तो ध्यान दें। अदालत अपनी विवेक से फैसला ले।
अब केंद्र सरकार पर निर्भर है कि वह पोक्सो में बदलाव करे या नहीं। कई हाई कोर्ट पहले भी इस दुरुपयोग पर चिंता जता चुके हैं। जानकारों का कहना है कि यह क्लॉज लाने से सच्चे प्रेम संबंधों को बचाया जा सकता है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा कमजोर नहीं होनी चाहिए।