सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा है कि पैतृक संपत्ति और कारोबार के लिए शादीशुदा बेटी को 'परिवार' की परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसले में कहा है कि शादी के बाद भी बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य बनी रहती है। इसने साफ़ कह दिया कि यह पुरानी सोच गलत है कि शादी के बाद बेटी अपना मायका छोड़ देती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम फ़ैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फ़ैसले को पलटते हुए दिया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस नीति को भी रद्द कर दिया, जिसमें शादीशुदा बेटी को 'परिवार' की परिभाषा से बाहर रखा जाता था।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इसी हफ्ते मंगलवार को कहा कि शादी के बाद भी बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य बनी रहती है इसलिए सहानुभूति के आधार पर नौकरी, राशन की दुकान, कारोबार या अन्य सरकारी लाभों से विवाहित बेटी को बाहर नहीं किया जा सकता है।
यूपी सरकार का आदेश खारिज
यह मामला उत्तर प्रदेश की रहने वाली निशा नाम की एक महिला से जुड़ा था। उनकी मां सरकारी राशन की दुकान चलाती थीं। मां के मरने के बाद निशा ने सहानुभूति के आधार पर उस दुकान का आवंटन मांगा। निशा अपनी चार छोटी बहनों की इकलौती कमाने वाली सदस्य थीं। एक बहन तो विकलांग भी थीं। फिर भी निशा का आवेदन सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया गया क्योंकि वह शादीशुदा थीं। उत्तर प्रदेश सरकार के 2019 के आदेश में साफ़ लिखा था कि परिवार में सिर्फ 'अविवाहित, विधवा या कानूनी रूप से अलग हुई बेटी' ही शामिल मानी जाएगी। शादीशुदा बेटी को परिवार में नहीं गिना जाएगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार की इस नीति को संविधान के खिलाफ बताते हुए रद्द कर दिया। दि प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि यह नीति अनुच्छेद 14 यानी समानता का अधिकार और अनुच्छेद 15(1) यानी लिंग के आधार पर भेदभाव न करना का उल्लंघन करती है। इसने कहा कि शादी का मतलब यह नहीं होता कि बेटी का मां-बाप और भाई-बहनों से रिश्ता खत्म हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कह दिया कि शादी के बाद भी बेटी मायके की जिम्मेदारी ले सकती है। इसने कहा कि विवाहित बेटे को तो परिवार माना जाता है, लेकिन विवाहित बेटी को नहीं मानना लिंग के आधार पर भेदभाव है। अदालत ने अपने फ़ैसले के पक्ष में तर्क दिया कि आर्थिक ज़रूरत और सहायता की ज़रूरत शादी के बाद भी ख़त्म नहीं हो जाती है।
कोर्ट ने साफ़ कहा,शादी न तो बेटी और उसके मायके के बीच के रिश्ते को ख़त्म करती है और न ही यह मानने का आधार है कि अब वह आर्थिक रूप से मायके पर निर्भर नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने निशा के आवेदन को ठुकराने वाले आदेश को रद्द कर दिया और सरकार को 4 हफ्ते के अंदर उसके नाम राशन की दुकान आवंटित करने का आदेश दिया है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 में बदलाव
2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 में बदलाव होने से पहले बेटियाँ अपने पिता की मृत्यु के बाद केवल उनके हिस्से की संपत्ति पा सकती थीं, लेकिन वे पुरखों की संपत्ति को बाँटने की माँग नहीं कर सकती थीं। 2005 के बदलाव के बाद बेटियों को भी बेटों के बराबर अधिकार मिल गए। अब बेटी का जन्म होते ही उसे कोपार्सेनरी राइट यानी पिता की पुरखों की संपत्ति में जन्म से हिस्सा मिल जाता है और वह संपत्ति बाँटने की माँग कर सकती है।
अदालतों के पहले भी आए कई फ़ैसले
शादीशुदा महिलाओं के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फ़ैसला अकेला नहीं है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई बार यह बात कह चुका है। प्रकाश बनाम फुलवती केस
2015 में प्रकाश बनाम फुलवती मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने कहा कि यदि पिता 9 सितंबर 2005 से पहले मर गए हों तो बेटी को पुरखों की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा। 2018 में दानम्मा बनाम अमर मामले में दूसरी दो जजों की बेंच ने कहा कि 2001 में पिता के मरने के बावजूद भी दोनों बेटियों को संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।
इन दोनों विरोधाभासी फैसलों के कारण 2020 में जस्टिस अरुण मिश्रा, एस. अब्दुल नजीर और एम.आर. शाह की तीन जजों की बेंच ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि धारा 6 बेटी को जन्म से ही पुरखों की संपत्ति में अधिकार देती है। यह अधिकार पिता के 9 सितंबर 2005 को जीवित होने या न होने पर निर्भर नहीं करता। जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा था,
बेटी तो हमेशा बेटी होती है। बेटी जीवन भर कोपार्सेनर (पिता की पुरखों की संपत्ति में अधिकार) बनी रहती है, चाहे उसके पिता जीवित हों या नहीं।
इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने यह भी साफ किया कि शादी के बाद बेटी पूरी तरह से पति के परिवार में चली जाती है, यह पुरानी सोच गलत है। बेटी अपने मायके की संपत्ति की हकदार बनी रहती है। बॉम्बे, कर्नाटक और कलकत्ता हाईकोर्ट भी पहले ही ऐसी ही राय दे चुके हैं।
क्यों अहम है यह फ़ैसला?
आज भी कई जगहों पर पुरानी सोच है कि शादी के बाद बेटी 'पराया धन' हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह साफ़ किया है कि आर्थिक मदद और परिवार के अधिकार शादी के बाद भी बेटी के साथ बने रहते हैं। यह फैसला कंपैशनेट अप्वाइंटमेंट, पेंशन, संपत्ति बंटवारा, लैंड एक्विजिशन मुआवजा आदि कई क्षेत्रों में विवाहित बेटियों के हक को मजबूत करेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं के समान अधिकार की दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।