संभल में पुलिस पर एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश देने वाले जज का ट्रांसफर क्यों हुआ? कर्नल सोफिया क़ुरैशी पर मंत्री के आपत्तिजनक बयान के मामले में फ़ैसला देने वाले जस्टिस अतुल श्रीधरन का तबादला क्यों हुआ? जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने गंभीर ख़तरे की चेतावनी दी है।
सरकार के ख़िलाफ़ फैसले देने पर जजों का ट्रांसफर क्यों होता है? चाहे वह यूपी के संभल मामले में केसों की सुनवाई के बीच का मामला हो या फिर केंद्र के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित ट्रांसफर में संशोधन करने का मामला। क्या यह किसी भी सूरत में न्यायपालिका के लिए अच्छा है? सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के ऐसे संशोधन के विरोध में सुप्रीम कोर्ट के जज ही रहे हैं। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने केंद्र सरकार के अनुरोध पर जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर के कॉलेजियम के फ़ैसले की आलोचना की है। जस्टिस श्रीधरन ने कर्नल सोफिया क़ुरैशी के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में एमपी के एक मंत्री के ख़िलाफ़ स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की थी।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि केंद्र सरकार की मांग पर किसी हाई कोर्ट जज के ट्रांसफर प्रस्ताव में बदलाव करना कॉलेजियम सिस्टम की निष्ठा को खतरे में डालता है। जस्टिस भुइयां ने जोर दिया कि जजों के ट्रांसफर और पोस्टिंग में कार्यपालिका का कोई हक नहीं है। यह पूरी तरह न्यायपालिका का अपना क्षेत्र है। उन्होंने यह बयान पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में प्रिंसिपल जी.वी. पंडित मेमोरियल लेक्चर के दौरान दिया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम को बनाया ही इसलिए गया था ताकि जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर में सरकार का दखल न हो। अगर कॉलेजियम सरकार के दबाव में आ जाता है, तो इस सिस्टम का मूल मक़सद ख़त्म हो जाता है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर क्यों?
जस्टिस भुइयां ने पिछले साल अक्टूबर के एक मामले का ज़िक्र किया, जहाँ सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ट्रांसफर करने का प्रस्ताव किया था। लेकिन केंद्र सरकार की पुनर्विचार की मांग पर इसे बदलकर इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया। कॉलेजियम के रिकॉर्ड में खुद लिखा है कि यह बदलाव सरकार की मांग पर हुआ।
सरकार के ख़िलाफ़ दिया था फ़ैसला
जस्टिस भुइयां ने कहा, 'कॉलेजियम के रिकॉर्ड में यह लिखना कि ट्रांसफर केंद्र की मांग पर हुआ, संवैधानिक रूप से स्वतंत्र प्रक्रिया में कार्यपालिका के दखल को साफ़ दिखाता है।' लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने पूछा, 'क्या किसी जज को सिर्फ इसलिए ट्रांसफर किया जाए क्योंकि उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ कुछ असुविधाजनक फैसले दिए? क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती?'
उन्होंने कहा कि ट्रांसफर सिर्फ न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए होते हैं, न कि जजों को सजा देने के लिए जो सरकार को पसंद न आएं। छत्तीसगढ़ में ट्रांसफर होने पर जस्टिस श्रीधरन हाई कोर्ट कॉलेजियम के सदस्य बन जाते, लेकिन इलाहाबाद में उनकी सीनियरिटी बहुत कम रहती। जस्टिस श्रीधरन को एक स्वतंत्र जज के रूप में जाना जाता है। जस्टिस श्रीधरन ने कर्नल सोफिया क़ुरैशी के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में एमपी के एक मंत्री के ख़िलाफ़ स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की थी।
'केंद्र का दखल नहीं होना चाहिए'
जस्टिस भुइयां ने साफ़ कहा, 'केंद्र सरकार का हाई कोर्ट जजों के ट्रांसफर में कुछ भी दखल नहीं होना चाहिए। वे नहीं कह सकते कि फलां जज को ट्रांसफर नहीं करना चाहिए या करना चाहिए। यह न्यायपालिका का विशेष क्षेत्र है।' उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी कार्रवाई संविधान की बुनियादी विशेषता न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करती है।
उन्होंने याद दिलाया कि कॉलेजियम सिस्टम सुप्रीम कोर्ट ने इसलिए बनाया ताकि नियुक्तियां सरकार के प्रभाव से मुक्त रहें। अब जब सरकार कॉलेजियम को ख़त्म करने की कोशिश नाकाम हो चुकी है तो जजों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे सिस्टम को स्वतंत्र रखें।
जस्टिस भुइयां ने कहा, 'कॉलेजियम सदस्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सिस्टम पर कोई दखल न हो। हम जजों ने संविधान की रक्षा की शपथ ली है - बिना डर, पक्षपात, स्नेह या द्वेष के। हमें अपनी शपथ पर खरा उतरना होगा।' उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता अटल है और इसे हर कीमत पर बचाना होगा।
'न्यायपालिका पर सबसे बड़ा खतरा अंदर से'
जस्टिस भुइयां ने चिंता जताई कि आज न्यायपालिका पर सबसे बड़ा ख़तरा 'अंदर से' आ सकता है। अगर जज राजनीतिक या वैचारिक झुकाव से फ़ैसले लें तो लोकतंत्र के लिए बुरा दिन होगा। उन्होंने कहा, 'अगर किसी केस का फ़ैसला सिर्फ यह जानकर तय हो जाए कि कौन सा जज या बेंच सुन रहा है, तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद होगा।'
जस्टिस भुइयां ने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र और कानून के राज की रक्षा के लिए ज़रूरी है। इसके लिए ऐसे जज चाहिए जो समय की राजनीतिक हवाओं के खिलाफ सीधे खड़े रहें।
'राजा' दे रहा है न्याय: कांग्रेस
सरकार के ख़िलाफ़ फ़ैसला देने वाले जजों के ट्रांसफर को लेकर कांग्रेस ने भी बड़ा हमला किया है। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, "जो संभल, दिल्ली, जयपुर, गुजरात में हुआ.. वह दिखता है कि भगवान के बाद अगर कोई किसी से न्याय की उम्मीद करता है तो वह राजा है। भगवान भी राजा के माध्यम से ही लोगों को न्याय दिलवाते हैं, लेकिन जब राजा न्याय के रास्ते में आ जाए और न्याय ना मिलने दे- तो क्या होगा? अगर राजा इंसाफ दिलाने के समय धर्म, जाति और भाषा देखे तब आप सोचिए कि इस देश में कितने दिनों तक लोकतंत्र बच सकता है।" खेड़ा ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि योगी आदित्यनाथ इस 'गुजरात मॉडल' को यूपी में लागू नहीं करेंगे, क्योंकि इस मॉडल से आम आदमी को न्याय नहीं मिलेगा।
खेड़ा ने कहा, 'मैंने आपको गुजरात का उदाहरण दिखाया है, जहां डीजी वंजारा, माया कोडनानी या बाबू बजरंगी जैसे तमाम लोगों को जज बदलकर राहत दी गई। वहीं, एक दूसरा मॉडल भी है, जिसमें मोटा भाई जज का ट्रांसफर कहीं और ही कर देते हैं। ऐसा मॉडल लोकतंत्र और इंसाफ के लिए बेहद घातक है।' उन्होंने संभल में जज के तबादले का ज़िक्र किया।
संभल में जज का ट्रांसफर
यूपी के संभल में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के ट्रांसफर का मामला हाल ही में बहुत विवादास्पद हो गया है। यह पूरा विवाद संभल हिंसा से जुड़ा है। शाही जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हिंसा हुई थी और 3 मुस्लिम युवकों की गोली लगने से मौत हो गई। इस मामले में पुलिस पर आरोप लगे कि वे ज्यादा बल प्रयोग कर रहे थे। संभल के तत्कालीन सीजेएम विभांशु सुधीर ने 9 जनवरी को एएसपी अनुज चौधरी समेत 20 पुलिसकर्मियों पर एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश दिया। और फिर विभांशु सुधीर का अचानक तबादला हो गया और सिविल जज बनाकर अन्य जगह भेजा गया। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जज आदित्य सिंह को संभल का नया सीजेएम बनाया। आदित्य सिंह वही जज हैं जिन्होंने पहले संभल की जामा मस्जिद सर्वे का आदेश दिया था। विवाद हुआ तो कुछ घंटों में ही आदित्य सिंह को भी हटा दिया गया। अब नए सीजेएम को संभल भेजा गया है।
पवन खेड़ा ने कहा है कि संभल का यह पहला मामला नहीं है, इससे पहले सरकार के ख़िलाफ़ फैसला देने वाले कई और जजों का तबादल किया गया है। दिल्ली दंगों में भी बीजेपी नेताओं के खिलाफ आदेश देने वाले जस्टिस मुरलीधरन का भी आधी रात को तबादला कर दिया गया था। हाल ही में राजस्थान में अडानी के खिलाफ फैसला सुनाने वाले जज दिनेश कुमार गुप्ता का भी ट्रांसफर कर दिया गया था।