बिहार चुनाव से पहले महिलाओं के खातों में 10-10 हज़ार रुपये डालने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया था, क्या ये आपको याद है? बिहार को छोड़िए, पहले तमिलनाडु के केस को पढ़िए। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राज्यों द्वारा चुनाव से ठीक पहले फ्रीबीज यानी मुफ्त योजनाएं देने की कड़ी आलोचना की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ऐसी योजनाएं देश के लंबे समय के विकास को नुक़सान पहुँचा रही हैं। कोर्ट ने पूछा कि इस तरह की आदत कब तक चलेगी? इससे देश का राष्ट्र निर्माण रुक जाएगा। वैसे, बिहार में चुनाव से पहले महिलाओं के खाते में 10-10 हज़ार रुपये डालने का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था। इस मामले में अदालत ने क्या कहा था, यह जानने से पहले यह जान लें कि तमिलनाडु के इस ताज़ा मामले में क्या कहा है।

सुप्रीम कोर्ट की यह ताज़ा टिप्पणी तब आई है जब कोर्ट तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में बिजली संशोधन नियम 2024 के एक नियम को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील से कई सवाल किए।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, 'क्या यह जनहित में है कि राज्य सबके बिजली बिल भर दे? फ्रीबीज की वजह से पूरे देश में पहले से ही... हम सिर्फ तमिलनाडु की बात नहीं कर रहे, पूरे भारत की बात कर रहे हैं। हम किस तरह की संस्कृति बना रहे हैं? जो लोग बिजली बिल दे सकते हैं और जो गरीब हैं, उनके बीच क्या फर्क है? समझ में आता है कि कल्याणकारी राज्य के रूप में गरीबों को मदद मिले, लेकिन जो लोग बिल दे सकते हैं और जो नहीं दे सकते, उनके बीच फर्क किए बिना सबको देने लगें तो क्या यह तुष्टीकरण नहीं है?'

कोर्ट ने कहा कि कई राज्य पहले से ही घाटे में चल रहे हैं, फिर भी फ्रीबीज बांट रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश बोले, '
राज्यों के पास राजस्व से ज्यादा पैसा आता है तो क्या उसे सड़कें, अस्पताल, स्कूल बनाने में नहीं लगाना चाहिए? इसके बजाय चुनाव के समय खाना, कपड़े, बिजली मुफ्त बांटते रहते हैं। इस देश में क्या हो रहा है?
सूर्यकांत
सीजेआई

'राज्य अपनी नीतियों पर फिर से सोचें'

उन्होंने आगे कहा कि गरीबों और बच्चों को शिक्षा, इलाज जैसी मदद देना राज्य का फर्ज है। लेकिन अमीर और सक्षम लोगों को भी सब कुछ मुफ्त देना गलत है। उन्होंने कहा, 'जो लोग सब कुछ एंजॉय कर सकते हैं, उनके पास सारे साधन हैं, फिर भी फ्रीबीज पहले उनके पास पहुंच जाते हैं। क्या अब समय नहीं आ गया कि राज्य अपनी नीतियों पर फिर से सोचें?'

मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताई कि अगर सुबह से मुफ्त खाना, मुफ्त गैस, मुफ्त बिजली और सीधे बैंक में कैश ट्रांसफर होने लगे तो लोग काम क्यों करेंगे? उन्होंने कहा, 'लोगों को रोजगार के रास्ते खोलने चाहिए ताकि वे कमाकर अपनी इज्जत और आत्मसम्मान बनाए रखें। अगर सब कुछ एक जगह से मिलने लगे तो काम सीखने की ज़रूरत क्यों रहेगी? क्या यही राष्ट्र निर्माण है?'
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कोर्ट ने कहा कि विकास के लिए लंबी योजना बनानी चाहिए, न कि चुनावी वादे। उन्होंने कहा, 'हम चिंतित हैं कि राज्य घाटे में हैं और फिर भी पैसा बांट रहे हैं। यह पैसा कहां से आ रहा है? इसे विकास कार्यों में क्यों नहीं लगाया जाता?'

बिहार में महिलाओं को 10 हजार बांटने का केस

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद फरवरी 2026 में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत चुनाव आचार संहिता लागू होने के दौरान महिलाओं के खाते में 10000 रुपये ट्रांसफर करने को चुनौती दी गई थी। पार्टी का कहना था कि यह वोट खरीदने जैसा भ्रष्ट आचरण है और चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने जन सुराज पार्टी की इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पटना हाई कोर्ट जाने की सलाह दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि चुनाव हारने के बाद न्यायिक मंच का इस्तेमाल लोकप्रियता पाने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा था, 'लोगों ने आपको ठुकरा दिया, अब आप कोर्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं?'

कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पूरे चुनाव को रद्द करने जैसी मांग ठीक नहीं है। इसके लिए विशिष्ट उम्मीदवारों के खिलाफ ठोस सबूत चाहिए, न कि सामान्य आरोप।

रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट ने इस राशि को महिलाओं की सहायता के रूप में देखा और योजना के उद्देश्य स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता को मान्यता दी। हालाँकि, कोर्ट ने कोई विस्तृत फैसला या अंतिम टिप्पणी नहीं की, बल्कि याचिका की गंभीरता पर सवाल उठाकर इसे सीधे खारिज कर दिया।
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यह योजना महिलाओं को स्वरोजगार शुरू करने के लिए पहली किस्त के रूप में 10000 रुपये देती थी। सरकार इसे कल्याणकारी कदम बताती रही, जबकि विपक्ष ने इसे चुनावी फायदे के लिए दुरुपयोग कहा था। विपक्ष ने साफ़ तौर पर इसे चुनाव को प्रभावित करने के लिए 'वोट खरीदने' के लिए पैसे बाँटने के तौर पर प्रचारित किया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के आरोपों को लेकर सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की थी।

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियाँ फ्रीबीज और कल्याणकारी योजनाओं के बीच फर्क पर जोर देती हैं। कोर्ट कह रहा है कि जरूरतमंदों की मदद जरूरी है, लेकिन बिना भेदभाव के सबको मुफ्त देना विकास के रास्ते में रोड़ा है। हालाँकि, अदालत ने एक राज्य की फ्रीबीज की दूसरे राज्यों की फ्रीबीज से तुलना नहीं की।