फॉर्म 6 पर चुनाव आयोग को तब और बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि बिहार SIR फ़ैसले के दौरान नया फॉर्म 6 आया ही नहीं था। इसने नए फॉर्म 6 की वैधता पर न तो मंजूरी दी है और न ही खारिज किया है।
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फ़ॉर्म 6 में बदलाव को SC की मंज़ूरी मिलने के चुनाव आयोग के दावे को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा कि उसने न तो नए फ़ॉर्म 6 को मंज़ूरी दी है और न ही उसे ख़ारिज किया है। अदालत ने साफ़ किया कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े मई 2026 के फ़ैसले के समय नया फ़ॉर्म 6 आया ही नहीं था। इसलिए उस फ़ैसले में इस फ़ॉर्म की वैधता पर विचार नहीं हुआ था।
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह मौखिक टिप्पणी प्रिय मिश्रा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, फ़ॉर्म 6 में किए गए बदलावों और आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने कहा कि नए फ़ॉर्म 6 पर अभी कोई न्यायिक निर्णय नहीं हुआ है और अदालत इस मामले की जाँच करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया और इसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ दायर संबंधित याचिकाओं के साथ 27 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
‘नए फ़ॉर्म 6 पर कोई न्यायिक निर्णय नहीं हुआ’
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश ने पिछले सप्ताह चुनाव आयोग के उस दावे पर आपत्ति जताई थी, जिसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फ़ॉर्म 6 को मंज़ूरी दी है। वकील ने दलील दी कि 5 अक्टूबर को अदालत ने साफ़ कर दिया था कि फ़ॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी गई है, लेकिन इसके बावजूद चुनाव आयोग ने इसे सुप्रीम कोर्ट से स्वीकृत बताया।
इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि नए फ़ॉर्म 6 पर अदालत ने कोई निर्णय नहीं दिया है। उन्होंने साफ़ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि कोर्ट ने फ़ॉर्म को मंज़ूरी दी है या उसे ख़ारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वकीलों को शब्दों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी। इसके बाद जस्टिस बागची ने स्थिति और साफ़ करते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीश की पिछली टिप्पणी का मतलब केवल इतना था कि जब बिहार SIR पर फ़ैसला दिया गया था तब नया फ़ॉर्म 6 मौजूद नहीं था। उन्होंने कहा कि उस टिप्पणी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फ़ॉर्म को मंज़ूरी दे दी थी या उसकी वैधता ख़ारिज कर दी थी। अदालत ने कहा कि वह इस मुद्दे की जाँच करेगी।
चुनाव आयोग ने कब किया था दावा?
नए फ़ॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर विवाद तब बढ़ा जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद नए फ़ॉर्म में बदलाव लागू किए गए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने इन बदलावों पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि मतदाता पंजीकरण से जुड़े नियमों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना फ़ॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता है। इसके लिए पंजीकरण संबंधी नियमों में केंद्र सरकार की ओर से संशोधन की ज़रूरत हो सकती है।चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को भी एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। इसमें आयोग ने संकेत दिया कि बिहार SIR से संबंधित मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में नए फ़ॉर्म 6 की घोषणा को मंज़ूरी दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया है कि बिहार SIR के फ़ैसले के समय नया फ़ॉर्म 6 मौजूद ही नहीं था। इसलिए अदालत ने उस फ़ैसले में नए फ़ॉर्म की वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया था।
इस सफ़ाई से यह साफ़ हो गया है कि बिहार SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसले को नए फ़ॉर्म 6 की न्यायिक मंज़ूरी के रूप में पेश नहीं किया जा सकता है। हालाँकि, अदालत ने अभी फ़ॉर्म की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
नए फ़ॉर्म 6 में क्या बदलाव किया गया?
फ़ॉर्म 6 का इस्तेमाल उन पात्र नागरिकों के पंजीकरण के लिए किया जाता है, जो मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाना चाहते हैं। नए फ़ॉर्म में एक घोषणा जोड़ी गई है, जिसके तहत नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने वाले व्यक्ति को यह बताना होगा कि क्या वह या उसके माता-पिता पिछली एसआईआर प्रक्रिया के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची में दर्ज थे।याचिका में यह भी दावा किया गया है कि ऑनलाइन फ़ॉर्म 6 की प्रक्रिया में पिछली एसआईआर से जुड़ी घोषणा शामिल की गई और आवेदकों से यह बताने को कहा गया कि क्या वे, उनके माता-पिता या दादा-दादी पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में शामिल थे। पुराने फ़ॉर्म 6 में ऐसी घोषणा नहीं माँगी जाती थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की नई शर्त जोड़ने से मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। यहाँ विवाद केवल फ़ॉर्म में अतिरिक्त जानकारी माँगने तक सीमित नहीं है। मुख्य सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना वैधानिक फ़ॉर्म में ऐसा बदलाव कर सकता है।
नियम बदले बिना फ़ॉर्म में बदलाव कैसे?
याचिका में दावा किया गया है कि फ़ॉर्म 6 में किए गए बदलावों के लिए मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 यानी Registration of Electors Rules, 1960 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वैधानिक फ़ॉर्म में बदलाव करने के लिए नियमों के अनुरूप कार्रवाई होनी चाहिए। उनका आरोप है कि नई घोषणा जोड़ते समय इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित आपत्तियों का भी हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने बदलावों की वैधता पर सवाल उठाए थे और कहा था कि मामले को लागू नियमों के अनुसार निपटाया जाना चाहिए। हालाँकि, इन आपत्तियों और फ़ॉर्म में बदलाव की वैधता पर अंतिम निर्णय अदालत को करना है। सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का अंतिम उत्तर नहीं दिया।
ECI में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल
प्रिय मिश्रा और मध्य प्रदेश के पूर्व क़ानून मंत्री पी.सी. शर्मा की ओर से दायर याचिका में केवल फ़ॉर्म 6 का मुद्दा नहीं उठाया गया है। इसमें चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल किए गए हैं। याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के क़रीब 10 महीनों के दौरान क़रीब 14 फ़ैसले ऐसे लिए गए, जिनमें अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। उनके मुताबिक, आयोग को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सामूहिक विचार-विमर्श और निर्णय लेने की व्यवस्था का पालन करना चाहिए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ निर्णय और आधिकारिक संचार दूसरे चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंज़ूरी के बिना जारी किए गए। इसमें यह भी कहा गया है कि ऐसे फ़ैसले आयोग के संवैधानिक और वैधानिक दायित्वों से जुड़े सवाल खड़े करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इसे 27 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध किया है। अब अदालत के सामने फ़ॉर्म में बदलाव की वैधता, नियमों के पालन और चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े सवाल हैं।