जिस सीएए यानी नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के ख़िलाफ़ एक समय देश में तूफान मचा था, विरोध-प्रदर्शनों में हिंसा हुई थी, उसके ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर अब सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। इसने गुरुवार को कहा है कि सीएए को चुनौती देने वाली याचिकाओं की अंतिम सुनवाई 5 मई से शुरू होगी। कोर्ट ने कहा कि यह मामला अब लंबे समय से लंबित है और अब इसे जल्द निपटाया जाएगा। इन याचिकाओं में सीएए को संविधान के मूल अधिकार समानता के अधिकार को उल्लंघन करने वाला बताया गया है और अदालत से इसे रद्द करने की मांग की गई है। 

कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की तीन जजों की बेंच ने गुरुवार को इस मामले पर निर्देश दिए। पिछली बार यह मामला 19 मार्च 2024 को सूचीबद्ध हुआ था, यानी लगभग दो साल पहले। अब तक कुल 240 से ज्यादा याचिकाओं पर विचार किया गया।
सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट से अनुरोध किया कि असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों से जुड़ी याचिकाओं को अलग से सुना जाए। वजह यह है कि इनमें नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए और इनर लाइन परमिट से जुड़े खास मुद्दे हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि जनवरी 2020 के आदेश के अनुसार, असम और त्रिपुरा से जुड़े मामले पहले से अलग श्रेणी में हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पहले बाक़ी देश से जुड़े मामलों की सुनवाई होगी, उसके बाद असम और त्रिपुरा वाले मामलों को लिया जाएगा। 5 मई को याचिकाकर्ताओं की सुनवाई पूरे दिन होगी। 6 मई को याचिकाकर्ताओं की सुनवाई आधे दिन होगी। 6 मई का दूसरा हाफ और 7 मई को केंद्र सरकार की दलीलें सुनी जाएंगी। 12 मई को याचिकाकर्ताओं की जवाबी दलीलें यानी रेजॉइंडर होंगी। इसके बाद कोर्ट फैसला सुरक्षित रख सकता है। कोर्ट ने सभी पक्षों से कहा है कि वे चार हफ्तों के अंदर अतिरिक्त दस्तावेज या लिखित नोट्स जमा कर दें।

सीएए 2019 क्या है?

नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए 2019 पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने का आसान रास्ता देता है। गैर-मुस्लिम प्रवासियों में हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को शामिल किया गया है। अगर वे 31 दिसंबर 2014 से पहले बिना दस्तावेजों के भारत आए थे तो उन्हें अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा और वे नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

सीएए मुसलमानों को इस सुविधा से बाहर रखता है, इसलिए कई लोग इसे असंवैधानिक बताते हैं। याचिकाकर्ता कहते हैं कि यह धर्म के आधार पर भेदभाव करता है और अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

सीएए के ख़िलाफ़ क्या आपत्ति?

नागरिकता संशोधन कानून 2019 के खिलाफ मुख्य रूप से संवैधानिक, मानवाधिकार और सामाजिक आधार पर दलीलें उठाई गई हैं। ये दलीलें विभिन्न संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और विरोध प्रदर्शनों से सामने आई हैं, जो क़ानून को भेदभावपूर्ण मानते हैं।

धर्म के आधार पर भेदभाव : सीएए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई को नागरिकता देने की प्रक्रिया तेज करता है, लेकिन मुस्लिमों को बाहर रखता है। इससे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है।

धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन : कानून भारत की सेकुलर संवैधानिक संरचना के खिलाफ है, क्योंकि यह पहली बार नागरिकता में धर्म को आधार बनाता है। इससे सभी धर्मों को समान मानने की देश की मूल भावना कमजोर होती है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और कानूनों का उल्लंघन: सीएए समानता के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, जिनके भारत हस्ताक्षरकर्ता है। यह मुस्लिम शरणार्थियों को असमानता का शिकार बनाता है और धार्मिक आधार पर भेदभाव को वैध बनाता है।

अन्य अल्पसंख्यकों की उपेक्षा: कानून केवल तीन देशों के गैर-मुस्लिमों को कवर करता है, लेकिन मुस्लिम अल्पसंख्यकों जैसे शिया, अहमदिया, रोहिंग्या या श्रीलंकाई तमिल हिंदुओं को बाहर रखता है, जो धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हैं। इससे यह मनमाना और अपूर्ण लगता है।

एनआरसी/एनपीआर के साथ जोड़कर मुस्लिमों पर निशाना: सीएए को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर के साथ जोड़कर देखा जाता है, जो मुस्लिमों को देश से बाहर करने का माध्यम बन सकता है। इससे मुस्लिम समुदाय को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का डर है।

क्षेत्रीय और सांस्कृतिक प्रभाव: विशेष रूप से असम जैसे राज्यों में यह अवैध प्रवासियों को वैध बनाता है, जो स्वदेशी संस्कृति और जनसंख्या को प्रभावित करता है। इससे स्थानीय लोगों की पहचान और संसाधनों पर खतरा माना जाता है।

असम के लोगों का विरोध क्यों?

असम से याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सीएए असम समझौते के ख़िलाफ़ है। केरल राज्य ने भी इस क़ानून के ख़िलाफ़ मूल मुक़दमा दायर किया है।

केंद्र सरकार का बचाव

हालाँकि, सरकार विरोध के हर तर्क को खारिज करती है। सरकार का कहना है कि सीएए किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनता। यह सिर्फ कुछ खास समूहों को नागरिकता देने की छूट देता है। सरकार कहती है कि किसी समूह को कम शामिल करना अपने आप में अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है।
मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने सीएए के नियम अधिसूचित किए थे, जिससे आवेदन प्रक्रिया शुरू हुई। राज्य स्तर पर समितियां बनाई गईं। इन नियमों को भी चुनौती दी गई, लेकिन कोर्ट ने अभी उनकी सुनवाई नहीं की।

यह मामला 2019 से लंबित है और देश में बड़े विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। अब मई 2026 में सुनवाई से इस कानून के भविष्य पर फैसला होगा।