सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाएगा। यह मामला फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर 'बड़े षड्यंत्र' का आरोप लगाया गया है। इन आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत केस चल रहा है।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच यह फैसला सुनाएगी। दिसंबर 2025 में कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2 सितंबर के फ़ैसले के खिलाफ दाखिल स्पेशल लीव पिटिशन पर अपना ऑर्डर रिजर्व कर लिया था। हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि बिना रोक-टोक के प्रदर्शन का अधिकार संविधान के ढाँचे को नुक़सान पहुंचा सकता है और देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित कर सकता है।
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दिल्ली दंगे में उमर, शरजील पर आरोप क्या?

फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे हुए थे। ये सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भड़के। पुलिस का कहना है कि यह कोई अचानक हिंसा नहीं थी, बल्कि सोची-समझी साजिश थी। आरोपियों पर यूएपीए और पुरानी आईपीसी की धाराएं लगी हैं। उमर खालिद सितंबर 2020 से जेल में हैं। शरजील इमाम जनवरी 2020 से। दंगों के समय उमर दिल्ली में नहीं थे और शरजील पहले से हिरासत में थे। लेकिन पुलिस कहती है कि प्लानिंग पहले हो चुकी थी।

उमर खालिद के अलावा याचिकाकर्ताओं में गुलफिशा फातिमा, शरजील इमाम, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। ये बिना ट्रायल शुरू हुए पिछले पांच साल से ज्यादा समय से जेल में हैं। इनकी मुख्य दलील है कि इतने लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में रखना गलत है। पुलिस इन्हें दंगों का 'मास्टरमाइंड' बता रही है। इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से ज्यादा घायल हुए थे। दंगे नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान भड़के थे।

हाईकोर्ट ने कहा था कि प्रदर्शन के नाम पर हिंसा की साजिश रचना नहीं चल सकता। देरी के सवाल पर हाईकोर्ट ने बोला था कि जल्दबाजी में ट्रायल करना आरोपियों और दिल्ली सरकार दोनों के अधिकारों को नुक़सान पहुंचाएगा।

कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

आरोपियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट एएम सिंघवी और कपिल सिब्बल ने बहस की है। सिंघवी ने पूछा कि एक महिला को करीब छह साल से अंडरट्रायल बनाकर जेल में रखने से क्या सार्वजनिक हित सध रहा है? कपिल सिब्बल ने कहा कि इतनी लंबी हिरासत ट्रायल से पहले ही सजा जैसी है।

उमर खालिद के वकीलों ने तर्क दिया कि दिल्ली के ट्रायल कोर्टों ने 750 से ज्यादा दंगा केसों में से 93 में आरोपियों को बरी कर दिया है। उन्होंने पुलिस की जांच को कमजोर बताया और सबूतों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने, अंग्रेजी न जानने वाले अफसर का इंग्लिश में चार्जशीट दाखिल करने, अचानक गवाह प्रकट होने और मुस्लिम भीड़ का 'जय श्री राम' के नारे लगाते हुए तोड़फोड़ करने की पुलिस की दलीलों पर सवाल उठाए। उन्होंने 2022 से 2025 तक के ट्रायल कोर्ट के 17 फैसलों का हवाला दिया।
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दिल्ली पुलिस की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने बहस की। पुलिस ने शरजील इमाम के भाषणों के वीडियो दिखाए और कहा कि आरोपियों ने सांप्रदायिक दंगे भड़काने और सशस्त्र विद्रोह की साजिश रची, जिसका आख़िरी मक़सद 'सत्ता बदलना' था। पुलिस की एफिडेविट में कहा गया कि यह गहरी, पहले से सोची-समझी साजिश थी, जिससे 53 मौतें हुईं और दिल्ली में 753 एफआईआर दर्ज हुईं।

तुषार मेहता ने कहा कि 2020 के दंगे देश की संप्रभुता पर हमला थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि आरोपी खुद ट्रायल में देरी कर रहे हैं ताकि जमानत की दलील दे सकें। एसवी राजू बोले कि अगर आरोपी देरी न करें तो दो साल में ट्रायल पूरा हो सकता है।