दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और एक पूर्व चुनाव आयुक्त ने मौजूदा चुनाव आयोग से एसआईआर विवाद में सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जानकारी देने की मांग की है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी और ओ.पी. रावत, तथा पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने अलग-अलग टिप्पणियों में कहा है कि आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसके भीतर उठाई गई आपत्तियों पर क्या विचार हुआ और अंतिम फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए। उनके बयान चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर मतभेदों की खबरों के बीच सामने आये हैं। 
यह विवाद इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद तेज हुआ है जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर कई बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों का संबंध मतदाता नाम जोड़ने और हटाने, नाम बहाल करने, Form 6, चुनावी डेटा के केंद्रीकरण और चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम जैसे मुद्दों से था।

कुरैशी ने कहा- तीनों चुनाव आयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सारी बातें बतायें

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस.वाई. कुरैशी ने चुनाव आयोग के इस खंडन के संदर्भ में कि अलग-अलग राय संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं, कहा कि बेहतर होगा कि तीनों मौजूदा चुनाव आयुक्त सार्वजनिक रूप से सामने आकर स्थिति स्पष्ट करें। कुरैशी ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी चाहिए और यह बताना चाहिए कि SIR को लेकर वास्तव में उनके बीच क्या चर्चा हुई थी।
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कुरैशी ने सवाल उठाया कि अगर मतदाता सूची के पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया ही गैरकानूनी पाई जाती है, तो उसके आधार पर चुनाव कैसे कराया जा सकता है। उनका कहना था कि अगर प्रक्रिया में गंभीर गलती हुई है तो कानूनी तौर पर स्थिति को पहले वाली अवस्था में वापस ले जाने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
  • उन्होंने सवाल किया कि अगर चुनाव आयोग 2002 के पुराने SIR को आधार मानकर पीछे जा सकता है तो 2025 की स्थिति में वापस जाने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता।

'SIR के बाद जनता का भरोसा प्रभावित'

एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान विपक्ष की ओर से नरेंद्र मोदी सरकार के पक्ष में काम करने के आरोपों का सामना किया था, ने भी मौजूदा स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि SIR को लेकर पैदा हुई स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है और चुनाव आयोग के प्रति जनता के विश्वास को फिर से स्थापित करना आसान नहीं होगा। उनके मुताबिक, मतदाता सूची की प्रकृति ऐसी है कि एक बार बड़े पैमाने पर बदलाव होने के बाद पूरी प्रक्रिया को पहले की स्थिति में वापस ले जाना आसान नहीं होता, यहां तक कि अदालतों के हस्तक्षेप के बावजूद भी। 

एसआईआर ने जनता में भय पैदा कियाः पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने भी आयोग के भीतर मौजूदा घटनाक्रम को असामान्य बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में चुनाव आयोग के कामकाज में आम तौर पर फैसलों को सर्वसम्मति से होते देखा था। उनके अनुसार, मौजूदा SIR प्रक्रिया ने मतदाताओं के बीच भय की स्थिति पैदा की है। रावत ने SIR को लेकर पैदा हुए विवाद की तुलना ऐसी स्थिति से की जिसमें बनाई गई व्यवस्था आगे चलकर अपने ही स्तर पर समस्याएं पैदा करने लगे।

अशोक लवासा ने Form 6 पर उठाया सवाल

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी चुनाव आयोग से पूरे तथ्य सार्वजनिक करने की मांग की है। लवासा ने कहा कि आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर क्या विचार किया गया, उन्हें आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किया गया या नहीं और उन पर चर्चा किस स्तर पर हुई। उन्होंने खास तौर पर Form 6 में कथित बदलाव पर सवाल उठाया। Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होता है।

लवासा ने सवाल किया कि यदि Form 6 में बदलाव किया गया, तो क्या इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था। उनका सवाल यह भी था कि क्या चुनाव आयोग तीनों आयुक्तों की सहमति होने की स्थिति में भी ऐसा Form बदल सकता है, जिसके लिए नियमों में तय प्रक्रिया मौजूद है। उनके मुताबिक, यह सिर्फ यह सवाल नहीं है कि तीनों चुनाव आयुक्त सहमत थे या नहीं। मूल सवाल यह भी है कि क्या जिस प्रक्रिया के तहत बदलाव किया गया, वह कानून के अनुरूप थी।

ERO की वैधानिक शक्तियों पर भी सवाल

लवासा ने चुनावी डेटा के केंद्रीकरण और Electoral Registration Officers (ERO) की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि चुनावी डेटाबेस को केंद्रीकृत करना अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन संबंधित ERO को अपनी वैधानिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए सिस्टम में आवश्यक अधिकार मिलना चाहिए। ERO ही अपने अधिकार क्षेत्र में मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने जैसे फैसलों से संबंधित वैधानिक भूमिका निभाता है। इसलिए यदि किसी तकनीकी सिस्टम के कारण ERO अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाता है, तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी सवाल खड़ा कर सकता है।

'आपत्ति और औपचारिक असहमति में फर्क'

लवासा ने यह भी स्पष्ट किया कि हर आंतरिक टिप्पणी को औपचारिक 'dissent' यानी असहमति नहीं कहा जा सकता। उनके मुताबिक, किसी आयुक्त द्वारा किसी प्रस्ताव या प्रक्रिया पर सवाल उठाना और औपचारिक रूप से किसी एजेंडे पर विपरीत मत दर्ज करना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए चुनाव आयोग को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि संधू और जोशी की आपत्तियां किस प्रकृति की थीं, क्या उन पर विचार किया गया और अंतिम निर्णय कैसे लिया गया।

कानून की धारा 18 क्या कहती है

विवाद के बीच Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 18 भी चर्चा में है। इस प्रावधान के अनुसार, आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से चलाया जाना चाहिए। यदि आयुक्तों के बीच मतभेद हो तो बहुमत का निर्णय प्रभावी होता है। इसी वजह से यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि मौजूदा मामले में दर्ज की गई आपत्तियां केवल आंतरिक टिप्पणियां थीं या औपचारिक असहमति, और अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिए गए।

चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?

आयोग ने कहा है कि अलग-अलग टिप्पणियां और सुझाव किसी भी संस्थान के सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और पिछले एक साल में आयोग के सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने यह भी कहा कि आंतरिक नोट्स और तकनीकी सुझावों को संस्थागत असहमति के रूप में पेश करना पूरे घटनाक्रम का केवल एक हिस्सा दिखाना है। चुनाव आयोग ने कहा है कि लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक checks and balances उसकी सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार, उसके सभी आधिकारिक आदेश और प्रशासनिक निर्देश कानून तथा निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप जारी किए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में SIR समेत मतदाता सूची से जुड़े फैसले और अन्य चुनाव सुधार पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों के आधार पर किए गए।
आयोग ने ECINet को लेकर भी कहा है कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म सुरक्षा प्रोटोकॉल, साइबर सुरक्षा जांच और ऑडिट नियंत्रण के तहत काम करते हैं। आयोग के अनुसार ERO और DEO अपने वैधानिक अधिकारों के तहत मतदाता पंजीकरण और नाम हटाने की प्रक्रिया संचालित करते हैं।

चुनाव आयोग में पहले भी सामने आ चुके हैं मतभेद

मौजूदा विवाद चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का पहला उदाहरण नहीं है। 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को कथित पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोपों के आधार पर हटाने की सिफारिश की थी। केंद्र सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और बाद में चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बने। इससे पहले 1993 से 1995 के बीच टी.एन. शेषन और चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल तथा जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के बीच भी तीखा विवाद सामने आया था। शेषन ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग के गठन को अदालत में चुनौती दी थी और मामला कानूनी लड़ाई में बदल गया था।

2019 में लवासा ने दर्ज की थी असहमति

अशोक लवासा का मौजूदा विवाद से जुड़ाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन से जुड़े मामलों में चुनाव आयोग द्वारा दी गई क्लीन चिट पर असहमति के नोट दर्ज किए थे। लवासा चाहते थे कि उनके dissent notes को अंतिम आदेश के साथ रिकॉर्ड में शामिल किया जाए। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने यह मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद लवासा ने चुनाव आयोग से इस्तीफा दिया और बाद में एशियन डेवलपमेंट बैंक से जुड़े।

अब सबसे बड़ा सवाल- आपत्तियां क्या थीं और उनका क्या हुआ?

SIR विवाद में अब मूल सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग राय थी या नहीं। सवाल यह है कि:
  • दो चुनाव आयुक्तों ने किन फैसलों पर आपत्ति दर्ज की?
  • क्या ये सिर्फ शुरुआती स्तर की टिप्पणियां थीं या औपचारिक असहमति?
  • क्या आपत्तियों को आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया गया?
  • क्या उन पर तीनों आयुक्तों के बीच चर्चा हुई?
  • Form 6 में बदलाव किस कानूनी अधिकार के तहत किया गया?
  • क्या डिजिटल सिस्टम ने ERO की वैधानिक शक्तियों को प्रभावित किया?
  • और यदि किसी फैसले पर आयुक्तों में मतभेद था, तो अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से लिया गया?