सोनम वांगचुक के अनशन पर उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो के बयान और हाईकोर्ट जाने ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सीजेपी के आंदोलन में सोनम वांगचुक की राजनीति अलग तरह की होती जा रही है। जानिए क्या है यह नई रणनीति।
सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके का फाइल फोटो
लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक का आंदोलन अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां राजनीतिक संकेत पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। लंबे समय से जारी उनके अनशन और दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो का 19 जुलाई को दिया गया बयान इस पूरे आंदोलन की दिशा बदलने वाला माना जा रहा है।
गीतांजलि आंगमो ने संकेत दिया कि यदि विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता सोनम वांगचुक से मिलकर यह भरोसा दिलाएं कि संसद के मानसून सत्र में लद्दाख, जवाबदेही और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जाएगा, तो सोनम वांगचुक अपना अनशन समाप्त करने पर विचार कर सकते हैं।
यह बयान कई सवाल खड़े करता है। क्या आंदोलन अपने निर्णायक चरण में पहुंच चुका है? क्या यह सरकार पर नैतिक दबाव बनाने की रणनीति है या फिर आंदोलन को सम्मानजनक तरीके से समाप्त करने का रास्ता खोजा जा रहा है?
एक दिन में बदला संदेश
दिलचस्प बात यह है कि इससे ठीक एक दिन पहले गीतांजलि आंगमो का रुख अलग दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा था कि यदि सोनम वांगचुक संसद मार्च में शामिल नहीं हो सके तो वह स्वयं मार्च का नेतृत्व करेंगी। उस समय संदेश यह था कि आंदोलन हर हाल में जारी रहेगा।
लेकिन 19 जुलाई के बयान में संघर्ष की जगह समाधान की संभावना पर अधिक जोर दिखाई देता है। संसद मार्च से ठीक पहले आया यह बयान यह संकेत देता है कि आंदोलन के अगले चरण को लेकर गंभीर विचार-विमर्श चल रहा है।
हालांकि दिल्ली पुलिस ने संसद मार्च की अनुमति नहीं दी है। ऐसे में यह भी संभव है कि परिस्थितियों को देखते हुए आंदोलन की रणनीति बदली जा रही हो।
क्या आंदोलन से सम्मानजनक निकास की तलाश?
मेरी नज़र में गीतांजलि आंगमो का बयान केवल एक मानवीय अपील नहीं बल्कि राजनीतिक संकेत भी है। मेरा मानना है कि सोनम वांगचुक अब इस आंदोलन से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलना चाहते हैं। गीतांजलि ने जो मांग विपक्ष के सामने रखी है, उस पर तो विपक्ष पहले से ही चल रहा है। लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दल पहले ही उनके प्रति समर्थन जता चुके हैं, उनकी गिरती हुई सेहत पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं और संसद में उनके मुद्दे उठाने की बात कह चुके हैं, तो फिर गीतांजलि आंगमो के बयान का औचित्य क्या रह जाता है?
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से वांगचुक के समर्थन में बयान दिए हैं। ऐसे में यदि विपक्ष संसद के भीतर इन मुद्दों को उठाने का भरोसा देता है, तो आंदोलन को अगले राजनीतिक चरण में ले जाने की कोशिश के रूप में भी इसे देखा जा सकता है। आखिर सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके (कॉकरोच जनता पार्टी) अपने आंदोलन को कांग्रेस या विपक्ष के साथ मिलकर क्यों नहीं चलाते या अब तक क्यों नहीं चलाया।
वरिष्ठ पत्रकार राजू पुरुलेकर ने पहले ही इस आंदोलन को लेकर कुछ सवाल उठाए थे। उनके अनुसार आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि आंदोलन की वास्तविक दिशा क्या है और इसके राजनीतिक परिणाम किस ओर जाते हैं।
मुझे अब घटनाक्रम उसी दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। यदि आंदोलन का समापन राजनीतिक आश्वासनों के आधार पर होता है, तो यह स्वाभाविक रूप से इस प्रश्न को जन्म देगा कि आंदोलन का अंतिम उद्देश्य क्या था और वह किस हद तक पूरा हुआ।विपक्ष पहले से ही कई राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। राहुल गांधी और कांग्रेस लंबे समय से पेपर लीक के मुद्दे पर अभियान चला रहे हैं। इसके अलावा मतदाता सूची, चुनावी पारदर्शिता और कन्फर्म "वोट चोरी" जैसे मुद्दों को भी लगातार उठाया गया है।
बिहार, असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में मतदाता सूची से जुड़े विवादों ने राहुल गांधी द्वारा उठाई गई आशंकाओं को बल दिया है। इन मामलों की निष्पक्ष जांच और राजनीतिक जवाबदेही की आवश्यकता है। जिन लोगों को इन घटनाओं में कोई समस्या दिखाई नहीं देती, वे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उठ रहे गंभीर सवालों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
लद्दाख हिल काउंसिल और सोनम वांगचुक
सरकार ने लद्दाख हिल काउंसिल को लेकर जो पहल की है, क्या सोनम वांगचुक का आंदोलन उससे प्रभावित होने जा रहा है। यह देखने वाली बात होगी कि भविष्य में सोनम वांगचुक की भूमिका क्या रहती है। क्या वे किसी औपचारिक राजनीतिक या संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं, या फिर आंदोलनकारी के रूप में अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाए रखते हैं।
जब सरकार दिल्ली में लद्दाख के प्रतिनिधियों से बातचीत कर रही थी, उसी समय सोनम वांगचुक दिल्ली में भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे। इसलिए आने वाले समय में यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों प्रक्रियाओं के बीच क्या संबंध था।
क्या अन्य मुद्दे पीछे छूट गए? सारे घटनाक्रम के मद्देनज़र महत्वपूर्ण राजनीतिक निष्कर्ष यह भी है कि सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके के आंदोलन के कारण अयोध्या में कथित राम मंदिर घोटाले का मुद्दा सार्वजनिक बहस में पीछे चला गया।
संसद के मानसून सत्र में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष किन मुद्दों को प्राथमिकता देता है। क्या वह शिक्षा, पेपर लीक के सवालों पर अधिक जोर देगा, या अयोध्या से जुड़े आरोपों को भी समान मजबूती से उठाएगा?
मानसून सत्र पर टिकी निगाहें
अब पूरा ध्यान संसद के मानसून सत्र पर है। यदि विपक्ष वास्तव में सोनम वांगचुक, शिक्षा, जवाबदेही, चुनावी पारदर्शिता और अन्य लोकतांत्रिक मुद्दों को मजबूती से उठाता है, तो आंदोलन का प्रभाव संसद के भीतर भी दिखाई दे सकता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो आंदोलन की राजनीतिक उपयोगिता और विपक्ष की प्रतिबद्धता- दोनों पर प्रश्न उठ सकते हैं।
सोनम वांगचुक के आंदोलन का यह नया चरण केवल एक अनशन समाप्त होने या जारी रहने का प्रश्न नहीं है। यह उस व्यापक राजनीतिक संघर्ष से जुड़ा हुआ है जिसमें लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही, संसद की भूमिका, विपक्ष की सक्रियता और जन आंदोलनों की प्रभावशीलता जैसे बड़े प्रश्न शामिल हैं।
देश के नागरिकों को केवल सरकार ही नहीं बल्कि विपक्ष, आंदोलनकारी नेताओं और इस पूरे घटनाक्रम पर भी समान रूप से नजर रखनी चाहिए। आने वाले दिनों में संसद का मानसून सत्र यह तय करेगा कि ये आंदोलन केवल प्रतीकात्मक साबित होते हैं या वास्तव में राष्ट्रीय राजनीति और लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।