सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट में जजों के रूप में नियुक्ति (एलिवेशन) के लिए जिन पांच नामों की सिफारिश की है, उसका नोटिफिकेशन सरकार ने सोमवार 1 जून को जारी कर दिया। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले इस कॉलेजियम में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एम.एम. सुंदरेश शामिल हैं। जिन पांच नामों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति मिली है, उनमें से कुछ अलग-अलग फैसलों की वजह से चर्चित हैं।
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित जजों की संख्या अब 37 हो गई है। पांच नए नामों में चार विभिन्न हाईकोर्टों के चीफ जस्टिस हैं और एक सीनियर एडवोकेट (वरिष्ठ वकील) हैं। खास बात यह है कि इनमें से कोई भी आगे चलकर भारत का मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने की कतार में नहीं होगा।
नए जजों में कुछ के अच्छे और विवादित फैसलों के बारे में जानिएः
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जस्टिस शील नागू राम रहीम को बरी कर चुके हैं

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त किया गया है। इन्होंने अक्टूबर 1987 में एक वकील के रूप में रजिस्ट्रेशन कराया था। मई 2011 में इन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अतिरिक्त जज और मई 2013 में स्थायी जज नियुक्त किया गया। मई 2024 में ये वहां के कार्यवाहक चीफ जस्टिस बने। इसके बाद 9 जुलाई 2024 को इन्होंने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के 36वें मुख्य जज के रूप में शपथ ली। अपने 12 साल से अधिक के कार्यकाल में उन्होंने 499 से अधिक रिपोर्ट किए गए फैसले लिखे हैं। सुप्रीम कोर्ट में इनका कार्यकाल दिसंबर 2029 तक (लगभग 3 वर्ष 7 महीने) रहेगा।

महत्वपूर्ण फैसले और मामले
कैदियों के अधिकार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में रहते हुए उन्होंने जेल परिसरों के भीतर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) स्थापित करने के आदेश दिए, जो दिल, किडनी और लिवर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सुसज्जित हों।
वैवाहिक विवाद: एक मामले में उनकी पीठ ने माना कि पत्नी द्वारा शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करना क्रूरता के दायरे में आ सकता है, और पति व उसके परिवार के प्रति सम्मान न दिखाना भी मानसिक क्रूरता है जो तलाक का आधार बन सकती है।
राम रहीम मामला: उनकी बेंच ने 2002 के चर्चित पत्रकार हत्याकांड में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को बरी कर दिया था।
अन्य मामले: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में उन्होंने 50,000 से अधिक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मानदेय न मिलने पर स्वत: संज्ञान लिया। साथ ही, कोर्ट आने वाले वकीलों और स्टाफ से पार्किंग शुल्क लेने पर रोक लगाई और जिला अदालतों के बुनियादी ढांचे को दिव्यांगों के अनुकूल बनाने का मुद्दा उठाया।

जस्टिस श्रीचंद्रशेखर कौन हैं

बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्रीचंद्रशेखर रांची में जन्मे थे और 1993 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी की। लगभग 19 वर्षों तक वकील के रूप में उन्होंने करीब 3500 मामलों की पैरवी की, जिनमें से अधिकतर सुप्रीम कोर्ट में थे। जनवरी 2013 में इन्हें झारखंड हाईकोर्ट का अतिरिक्त जज और जून 2014 में स्थायी जज बनाया गया। दिसंबर 2023 में झारखंड हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस रहने के बाद, सितंबर 2025 में इन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के 49वें चीफ जस्टिस के रूप में शपथ ली। सुप्रीम कोर्ट में इनका कार्यकाल मई 2030 तक (लगभग 3 वर्ष 11 महीने) रहेगा।

महत्वपूर्ण फैसले और मामले:

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर और अमित शाह मामला: उनकी बेंच ने सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में सभी 22 आरोपी पुलिसकर्मियों को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा। इसी मामले में उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) करने के खिलाफ दायर अंतरिम याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी द्वारा दायर की गई हो सकती है।
अन्य आपराधिक मामले: मालेगांव ब्लास्ट (2006) के आखिरी चार बचे आरोपियों के खिलाफ आरोप खारिज किए, मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर संजय पांडे के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द की, और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को मिली जेड-प्लस (Z+) सुरक्षा पर करदाताओं के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगाने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया।
वाणिज्यिक व पर्यावरण फैसले: उनकी पीठ ने मुंबई के एमएमआरडीए द्वारा बीकेसी (BKC) भूखंडों से जुड़े जुर्माना मांग नोटिस को रद्द कर एक बड़े निजी समूह सहित कई संस्थाओं को 700 करोड़ रुपये से अधिक वापस करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, वर्सोवा-भायंदर  सड़क परियोजना के लिए 45,000 से अधिक मैंग्रोव (सदाबहार वन) काटने की अनुमति दी।

जस्टिस संजीव सचदेवा कौन हैं

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेव ने अपना करियर दिल्ली से शुरू किया था। उन्होंने 1988 में दिल्ली बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराया। वह एक दशक से अधिक समय तक बार काउंसिल ऑफ इंडिया के स्थायी वकील और भारत सरकार के वरिष्ठ पैनल वकील रहे। जुलाई 2011 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर एडवोकेट) का दर्जा दिया। 2013 में वे दिल्ली हाई कोर्ट के अतिरिक्त जज बने। मई 2024 में उनका तबादला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में हुआ और जुलाई 2025 में वे वहां के चीफ जस्टिस नियुक्त किए गए। सुप्रीम कोर्ट में इनका कार्यकाल दिसंबर 2029 तक (साढ़े तीन साल से अधिक) रहेगा।

महत्वपूर्ण फैसले और मामले
पीएम मोदी की डिग्री से जुड़ा मामला:
दिल्ली हाई कोर्ट में रहते हुए उन्होंने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी को वर्ष 1978 के बी.ए. परीक्षा रिकॉर्ड के निरीक्षण की अनुमति देने का निर्देश दिया गया था (जिस वर्ष पीएम नरेंद्र मोदी ने ग्रैजुएट किया था)।
तिब्बती नागरिकों का अधिकार: उन्होंने फैसला सुनाया था कि 1950 से 1987 के बीच भारत में जन्मे तिब्बती मूल के लोग भारतीय नागरिक हैं।
लाइव-स्ट्रीमिंग पर रोक: सितंबर 2025 में उन्होंने अदालती कार्यवाही के वीडियो के दुरुपयोग का हवाला देते हुए सभी आपराधिक मामलों की लाइव-स्ट्रीमिंग (सीधा प्रसारण) पर रोक लगा दी थी।
अवमानना कार्रवाई: इसी साल अप्रैल में उन्होंने भाजपा विधायक संजय पाठक के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की, जिन पर माइनिंग (खनन) के एक मामले में मौजूदा जज से संपर्क करने की कोशिश का आरोप था।

जस्टिस अरुण पल्ली कौन हैं 

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अपने परिवार में चौथी पीढ़ी के वकील थे। जस्टिस पल्ली ने 1988 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से वकालत शुरू की। वे सितंबर 2004 से मार्च 2007 तक पंजाब के अतिरिक्त महाधिवक्ता रहे और अप्रैल 2007 में वरिष्ठ अधिवक्ता बने। दिसंबर 2013 में वे पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जज बने और अप्रैल 2025 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का पदभार संभाला। सुप्रीम कोर्ट में इनका कार्यकाल सितंबर 2029 तक (लगभग 3 वर्ष 4 महीने) रहेगा।

महत्वपूर्ण फैसले और मामले
महबूबा मुफ्ती की याचिका खारिज:
दिसंबर 2025 में उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती द्वारा दायर उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जम्मू-कश्मीर से बाहर की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों को वापस लाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह याचिका राजनीतिक लाभ के लिए दायर की गई लगती है और अदालतों को राजनीतिक अभियानों का मंच नहीं बनाया जा सकता।
अस्पताल संकट पर संज्ञान: उसी महीने उनकी पीठ ने जम्मू के गवर्नमेंट सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में करीब 30 करोड़ रुपये के सरकारी बकाये का भुगतान न होने के कारण आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के पूरी तरह ठप होने पर स्वत: संज्ञान लिया था।
यूएपीए (UAPA) पर फैसला: हाल ही में उनकी पीठ ने व्यवस्था दी कि किसी सह-आरोपी का इकबालिया बयान, बिना किसी अन्य पुख्ता सबूत के, यूएपीए के तहत आरोपी को जमानत देने से रोकने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।

सीनियर एडवोकेट वी. मोहना कौन हैं

जस्टिस इंदु मल्होत्रा के बाद, वी. मोहना बार (वकालत) से सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में अनुशंसित होने वाली देश की दूसरी महिला वकील हैं। वह अपने परिवार की पहली वकील हैं। वह सुप्रीम कोर्ट के 76 साल के इतिहास में 12वीं महिला जज बनेंगी। उन्होंने कोयंबटूर लॉ कॉलेज से 5 वर्षीय लॉ कोर्स के पहले बैच (1983-1988) से स्नातक किया। दिल्ली आने के बाद उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन और पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल के चैंबर में काम किया। अप्रैल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा दिया था। सुप्रीम कोर्ट में इनका कार्यकाल जून 2031 तक (लगभग 5 वर्ष) रहेगा। विशेष बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट में वह जस्टिस के.वी. विश्वनाथन के साथ बेंच साझा करेंगी, जो कोयंबटूर लॉ कॉलेज में उनके सहपाठी थे।

महत्वपूर्ण मामले
सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन: उन्होंने भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने से जुड़े ऐतिहासिक मामले में पैरवी की थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया था।
एनजेएसी (NJAC) मामला: 2015 के एनजेएसी मामले में उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से पैरवी की थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अंततः कॉलेजियम प्रणाली को बदलने वाले 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के नियमों को चुनौती: उन्होंने वकीलों को चैंबर आवंटित करने के सुप्रीम कोर्ट के अपने ही मानदंडों को चुनौती दी थी, जिसमें न्यूनतम पेशियों की कट-ऑफ तारीख तय की गई थी। उन्होंने दलील दी थी कि यह नियम उनके जैसे नए नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ अन्याय है।

कॉलेजियम पर सवाल उठते रहे हैं

जजों की सिफारिश के पीछे कौन से मानदंड (Criteria) काम करते हैं, इस पर सार्वजनिक रूप से बहुत कम स्पष्टता होती है। वरिष्ठता बनाम योग्यता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, और फैसलों के राजनीतिक प्रभाव जैसे सवाल लगातार बने रहते हैं, क्योंकि कॉलेजियम अब शायद ही कभी इस बात का विस्तृत विवरण देता है कि किसी एक जज को दूसरे पर प्राथमिकता क्यों दी गई। कई बार ये भी आरोप लगे कि जज पारिवारिक संबंधों के आधार पर चयन करते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट कॉलिजियम ने इन आरोपों को हमेशा खारिज किया।