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पुलिस अफ़सरों को सीजेआई की चेतावनी, सत्तारूढ़ दलों से साँठगाँठ की तो भुगतना होगा

सत्तारूढ़ दल की हर बात में हाँ में हाँ मिला कर और कई बार नियम- क़ानून और दिशा निर्देशों से परे जाकर पुलिस अफ़सरों के काम करने के तौर-तरीकों पर मुख्य न्यायाधीश ने गंभीर टिप्पणी की है और उन्हें चेतावनी दी है। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमना ने ऐसे अफ़सरों को कड़ी फटकार लगाते हुए चेतावनी दी है कि सरकार बदलने पर ऐसे लोगों को भुगतना पड़ता है और तब वे राहत के लिए अदालतों की शरण में जाते हैं। 

उन्होंने कहा,

जब आप सरकार के बहुत ही नज़दीक होते हैं तो एक दिन ऐसा भी आता है जब बिल्कुल दूसरी तरफ होते हैं और तब आपको भुगतना पड़ता है।


जस्टिस एन. वी. रमना, मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट

न्यायाधीश की चेतावनी

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "जब सरकार के साथ अच्छे रिश्ते होते हैं तो आप पैसे वसूलते हैं, सुविधाओं का लाभ लेते हैं और कई तरह के फ़ायदे उठाते हैं, इसके बाद जब सरकार बदलती है तो आपको सबकुछ ब्याज समेत चुकाना पड़ता है।" 

जस्टिस रमना की जिस बेंच ने ये बातें कहीं, उसमें जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस हिमा कोहली भी हैं। 

मुख्य न्यायाधीश ने यह तल्ख टिप्पणी निलंबित आईपीएस अधिकारी गुरजिंदर पाल सिंह के मामले में की। गुरजिंदर सिंह पर राजद्रोह और भ्रष्टाचार के मामले हैं। उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है। अदालत ने उनकी गिरफ़्तारी पर रोक लगा रखी है। उन्होंने अवैध वसूली के एक तीसरे मामले में राहत की माँग सुप्रीम कोर्ट से की। 

'परेशान करने वाली प्रवृत्ति'

सुप्रीम कोर्ट ने पहले दो मामलों में सुनवाई करते हुए 26 अगस्त को कहा था कि पुलिस अफ़सरों को ज़िम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए ताकि क़ानून का राज बना रहे। 

जज ने कहा था कि जब तक पुलिस अफ़सर राजनीतिक दलों को तरजीह देते रहेंगे, इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी। 

अदालत ने टिप्पणी की थी,

यह बहुत ही परेशान करने वाली प्रवृत्ति है। इसके लिए एक तरह से पुलिस विभाग को ही ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। यदि पुलिस विभाग के लोग दायित्व के साथ काम नहीं करेंगे और ऐसे व्यवहारों के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराए जाएंगे तो क़ानून का राज नहीं रहेगा।


जस्टिस एन. वी. रमना, मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट

मुख्य न्यायाधीश ने किया आगाह

मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रवृत्ति पर ही चोट करते हुए अफसरों को आगाह किया है कि यदि वे एक समय सत्तारूढ़ दल के साथ मिल कर ग़लत काम करेंगे और पद व पैसे के लिए नियम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाएंगे तो बाद में उन्हें भुगतना पड़ेगा, जब सरकार बदलेगी और दूसरा दल आएगा तो वह उनके खिलाफ़ कार्रवाई करेगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में पुलिस सुधार के लिए केंद्र सरकार को जो निर्देश दिया था, उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने के कई उपायों को लागू करने की बात भी थी। किसी सरकार ने इन सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया क्योंकि कोई राजनीतिक दल यह नहीं चाहता है कि पुलिस व प्रशासन पर उनकी पकड़ कम हो।

कई पुलिस अफ़सर भी नहीं चाहते कि किसी तरह का सुधार हो क्योंकि वे स्वयं भी सत्तारूढ़ दल की हां में हां मिला कर प्रमोशन और अच्छी पोस्टिंग चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने राजनेताओं व पुलिस अफ़सरों की इस सांठगांठ पर ही चोट की है। 

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