ममता बनर्जी ने याचिका में ECI के 17 सितंबर के उस फ़ैसले को चुनौती दी है जिसके तहत AITC के नाम और उसके 'फूल और घास' चुनाव निशान को फ्रीज़ कर दिया गया था। अब 4 सप्ताह में हलफनाा देना होगा और फिर 3 महीने में अंतिम निर्णय होगा।
ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव निशान को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चुनाव आयोग यानी ईसीआई के लिए समयसीमा तय कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों गुट चार सप्ताह के भीतर अपने हलफनामे और जवाबी हलफनामे दाखिल करें। इसके बाद चुनाव आयोग को विवाद पर अंतिम फ़ैसला तीन महीने के भीतर करना होगा।
इस तरह दोनों पक्षों की ओर से दलीलें और दस्तावेज दाखिल करने के लिए चार सप्ताह और उसके बाद चुनाव आयोग के अंतिम फैसले के लिए तीन महीने मिलाकर पूरी प्रक्रिया करीब चार महीने में पूरी करनी होगी।
यह विवाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस यानी एआईटीसी के मूल नाम और उसके पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव निशान को लेकर है। चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को पार्टी के भीतर दो प्रतिद्वंद्वी गुट होने का हवाला देते हुए इस नाम और निशान को अंतरिम तौर पर फ्रीज़ कर दिया था। ममता बनर्जी ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
4 हफ़्ते में हलफनामे देने होंगे
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक़ पहले दोनों पक्षों को अपनी दलीलें, हलफनामे और जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह मिलेंगे। इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने के भीतर इस विवाद पर अपना अंतिम निर्णय देना होगा।
इससे पहले चुनाव आयोग की ओर से अदालत में यह कहा गया था कि चुनाव निशान से जुड़े विवादों में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं के हलफनामे आते हैं और इस वजह से प्रक्रिया में समय लग सकता है। आयोग की ओर से अधिक समय की मांग की गई थी, लेकिन अदालत ने तीन महीने की समयसीमा को पर्याप्त माना।
SC ने ECI से मांगी थी समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट ने चार दिन पहले 24 सितंबर को हुई सुनवाई में ही चुनाव आयोग से पूछा था कि वह इस विवाद पर अंतिम फैसला कितने समय में कर सकता है।
पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का सही अवसर मिलना चाहिए, लेकिन कार्यवाही अनिश्चित समय तक नहीं चल सकती। अदालत ने शिवसेना के नाम और चुनाव निशान से जुड़े लंबे विवाद का भी संदर्भ दिया था और कहा था कि देरी का अंजाम सब देख चुके हैं।
ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा था कि उनकी ओर से फिलहाल अंतरिम आदेश को चुनौती देकर चुनाव रोकने की मांग नहीं की जा रही है। उनकी मुख्य मांग विवाद पर जल्द अंतिम निर्णय की थी। इसके बाद अदालत ने ईसीआई से समयसीमा बताने को कहा था। सोमवार की सुनवाई में इसी मुद्दे पर अंतिम समयसीमा तय कर दी गई।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को एक अंतरिम आदेश के जरिए टीएमसी के मूल नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव निशान को फ्रीज़ कर दिया था। आयोग के सामने पार्टी के दो गुटों ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताया था। एक गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में है, जबकि दूसरा गुट ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में है।
चुनाव आयोग ने इस स्थिति में दोनों पक्षों को आगामी उपचुनावों के लिए अलग-अलग नाम और निशान दिए। यह व्यवस्था फिलहाल अंतरिम है और इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग ने मूल पार्टी के नाम और निशान पर अंतिम फ़ैसला सुना दिया है।ममता गुट को मिला ‘फुटबॉल प्लेयर’ निशान
चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था के तहत ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव निशान दिया गया है। दूसरे यानी ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ यानी लिफाफा चुनाव निशान दिया गया है। यह व्यवस्था अक्टूबर में होने वाले पश्चिम बंगाल के उपचुनावों, जिनमें नंदीग्राम और रेजीनगर भी शामिल हैं, के लिए लागू है।
इस मामले में एक बड़ी बात यह है कि चुनाव आयोग ने जो नाम और निशान दोनों गुटों को दिए हैं, वह अंतरिम व्यवस्था है। यानी आयोग ने अभी यह अंतिम रूप से तय नहीं किया है कि मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ निशान का अधिकार किस गुट को मिलेगा।
मूल विवाद पर फ़ैसला चुनाव आयोग को चुनाव निशान आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सोमवार को इसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए समयसीमा तय की है।
बड़ी संख्या में हलफनामे आते हैं: ECI
सोमवार की सुनवाई में चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि ऐसे विवादों में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं के हलफनामे और दस्तावेज सामने आते हैं। उन्होंने इसी वजह से पर्याप्त समय की जरूरत बताई।
अदालत ने इस दलील को सुनने के बाद प्रक्रिया को समयबद्ध करने का फ़ैसला किया। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह भी सुझाव दिया कि बड़ी संख्या में दस्तावेजों और हलफनामों को संभालने के लिए तकनीक और AI आधारित साधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि अगर अदालत कोई समयसीमा तय करती है तो उसकी गणना उस तारीख से की जानी चाहिए जब दोनों पक्ष अपने हलफनामे दाखिल कर दें। ममता बनर्जी की ओर से पेश कपिल सिब्बल और कल्याण बनर्जी ने इसके जवाब में कहा कि ममता गुट अपनी प्रतिक्रियाएं जुलाई में ही दाखिल कर चुका है, जबकि दूसरे पक्ष की ओर से जवाब दाखिल किया जाना बाक़ी था।चुनावी प्रक्रिया में SC का दखल नहीं
इस विवाद के बीच पश्चिम बंगाल में उपचुनावों की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट की पिछली सुनवाई में यह साफ़ हुआ था कि अदालत तत्काल चल रहे उपचुनावों की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। 24 सितंबर को अदालत ने कहा था कि चुनाव कार्यक्रम घोषित हो चुका है और उम्मीदवार नामांकन दाखिल कर चुके हैं। इसलिए फिलहाल अंतरिम व्यवस्था को बदलने के बजाय मूल विवाद का अंतिम समाधान जल्द किया जाना चाहिए।
इसका मतलब यह है कि अक्टूबर के उपचुनावों में दोनों गुट फ़िलहाल ईसीआई द्वारा दिए गए अलग-अलग नाम और चुनाव निशान के साथ मैदान में उतरेंगे।
चुनाव आयोग अब क्या करेगा?
ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुट अपने हलफनामे और जवाब दाखिल करेंगे। इसके बाद तीन महीने में चुनाव आयोग दोनों पक्षों के दावों, दस्तावेजों और सबूतों पर विचार करेगा। ईसीआई पैरा 15 के तहत यह तय करेगा कि मूल टीएमसी नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव निशान पर किस पक्ष का दावा स्वीकार किया जाए।तब तक दोनों गुटों के लिए दिए गए अलग-अलग नाम और निशान लागू रहेंगे, जहाँ तक मौजूदा चुनावी व्यवस्था का सवाल है। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अनिश्चित समय तक चलने से रोकने के लिए पूरी प्रक्रिया की समयसीमा तय कर दी है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश अहम क्यों?
टीएमसी का नाम और ‘फूल-घास’ निशान लंबे समय से पार्टी की चुनावी पहचान का हिस्सा रहा है। ऐसे में इस विवाद का अंतिम फैसला पार्टी के दोनों गुटों के लिए अहम होगा। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को विवाद के मेरिट यानी मूल दावे पर कोई राय नहीं दी है। अदालत ने केवल प्रक्रिया को समयबद्ध किया है। दोनों पक्ष अपने दावे और आपत्तियाँ चुनाव आयोग के सामने रख सकते हैं और अंतिम फ़ैसला ईसीआई को ही करना है।