नालसार मामले में बुरे फँसे और माफी मांगकर बचने की कोशिश करने वाले बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को अब सुप्रीम कोर्ट में बड़ी चुनौती मिली है। याचिका में बीसीआई के फंड, ट्रस्ट PEARL-FIRST और गोवा स्थित IIULER के वित्तीय ऑडिट की मांग की गई है।
बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा।
नालसार मामले में इस्तीफा देने का दबाव झेल रहे बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के सामने अब सुप्रीम कोर्ट में एक और बड़ी मुश्किल आन खड़ृी हुई है। उनके लंबे कार्यकाल के ख़िलाफ़ अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई है। याचिका में बीसीआई के फंड, ट्रस्ट PEARL-FIRST और गोवा स्थित IIULER के वित्तीय ऑडिट की भी मांग की गई है। याचिका वकील योगमाया एम.जी. ने दायर की है।
शीर्ष अदालत में दायर याचिका में कहा गया है कि मनन कुमार मिश्रा पहली बार 2012 में बीसीआई चेयरमैन बने थे। 2014 में थोड़े समय के अंतराल के बाद वे फिर इस पद पर लौटे और तब से लगातार चेयरमैन बने हुए हैं। मार्च 2025 में उन्हें एक बार फिर निर्विरोध चुना गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह उनका लगातार सातवां कार्यकाल है। लाइल लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ा सवाल अप्रैल 2025 की उस सरकारी अधिसूचना पर उठाया गया है, जिसमें उनके कार्यकाल को 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक यानी पांच साल के लिए मान्यता दी गई।
दो साल के कार्यकाल का नियम बताया
याचिका में दावा किया गया है कि बीसीआई नियमों के अनुसार चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल दो वर्ष का होता है या फिर सदस्यता समाप्त होने तक, जो पहले हो। याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी प्रशासनिक अधिसूचना के ज़रिए नियमों से ज़्यादा समय तक किसी व्यक्ति को पद पर नहीं रखा जा सकता है।
नए चुनाव कराने की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि अप्रैल 2025 की अधिसूचना रद्द की जाए। मनन मिश्रा और वर्तमान उपाध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त घोषित किया जाए। स्वतंत्र निगरानी में समयबद्ध तरीके से नए चुनाव कराए जाएं। इसके साथ ही बीसीआई चेयरमैन और उपाध्यक्ष के लिए कार्यकाल की अधिकतम सीमा तय करने, 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' लागू करने और अलग-अलग राज्यों को नेतृत्व का अवसर देने के लिए रोटेशन व्यवस्था लागू करने की भी मांग की गई है।
राजनीतिक निष्पक्षता पर भी सवाल
याचिका में मनन मिश्रा की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2024 में वे बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा सदस्य बने। हालांकि केवल राजनीतिक संबद्धता को अयोग्यता का आधार नहीं बताया गया है। लेकिन देश के वकीलों की सर्वोच्च वैधानिक संस्था के प्रमुख रहते हुए राजनीतिक पद संभालने से संस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि बीसीआई के आधिकारिक मंच से कई बार राजनीतिक और सार्वजनिक मुद्दों पर बयान जारी किए गए। विशेष रूप से 23 जुलाई 2026 के एक बयान का उल्लेख किया गया है, जिसमें छात्र आंदोलनों को विदेशी ताकतों से प्रेरित और राष्ट्रविरोधी बताया गया था।
याचिका में पूछा गया है कि क्या ऐसे बयान बीसीआई की जनरल काउंसिल की मंजूरी से जारी किए गए थे और क्या वे बीसीआई के वैधानिक अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
PEARL-FIRST ट्रस्ट की जांच की मांग
याचिका का एक बड़ा हिस्सा PEARL-FIRST ट्रस्ट से जुड़ा है। यह ट्रस्ट बीसीआई Trust for Promotion of Education (Legal and Professional) and Reforms in Law and For Improvement of Research and Social Training के नाम से जाना जाता है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि एक स्वतंत्र जांच समिति गठित की जाए। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश को दी जाए। समिति के साथ सीएजी द्वारा नामित ऑडिटर और वित्तीय विशेषज्ञ भी शामिल हों।बीसीआई फंड और AIBE फीस के ऑडिट की मांग
याचिका में कहा गया है कि समिति बीसीआई के वैधानिक फंड, ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन यानी AIBE से प्राप्त फीस, ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड, ठेके और खरीद प्रक्रिया, संबंधित पक्षों के साथ हुए वित्तीय लेन-देन की जांच करे। याचिकाकर्ता का कहना है कि हर साल हजारों कानून स्नातक AIBE परीक्षा शुल्क जमा करते हैं, लेकिन इन पैसों का प्रबंधन कैसे होता है और उनका ऑडिट किस प्रकार किया जाता है, इस पर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है।
'IIULER गोवा की भी जांच हो'
याचिका में गोवा स्थित इंडिया इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लीगल एजुकेशन एंड रिसर्च यानी IIULER की नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों की भी स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि भर्ती प्रक्रिया, पदोन्नति, नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेज, चयन समिति की कार्यवाही और वित्तीय स्वीकृतियां जांच समिति के सामने रखी जाएं।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि बीसीआई, 1974 ट्रस्ट, PEARL-FIRST और IIULER से जुड़े सभी मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं और मामले के लंबित रहने तक उनमें कोई बदलाव या नष्ट करने की अनुमति न दी जाए।
मनन मिश्रा पर इस्तीफे का दबाव
नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों के मामले में बुरे फँसे बीसीआई के चेयरमैन मनन मिश्रा पर इस्तीफा देने का दबाव है। देश के सबसे प्रतिष्ठित वकील संगठनों में शामिल बॉम्बे बार एसोसिएशन यानी बीबीए ने हाल ही में उनके इस्तीफे की मांग की है। एसोसिएशन ने कहा कि नालसार यूनिवर्सिटी के छात्रों के खिलाफ की गई कार्रवाई गलत थी और बाद में मांगी गई माफी बहुत देर से आई तथा सिर्फ हालात संभालने की कोशिश थी।
बॉम्बे बार एसोसिएशन ने अपने पत्र में कहा है कि मनन मिश्रा द्वारा उठाया गया कदम एकतरफा था और इससे कानूनी पेशे की गरिमा को नुकसान पहुंचा। एसोसिएशन ने कहा कि बीसीआई द्वारा आदेश वापस लेना स्वागत योग्य है, लेकिन इससे पहले जो कार्रवाई की गई थी, वह गंभीर चिंता का विषय है।
क्या है पूरा विवाद?
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ हैदराबाद के कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया। शुरुआत में 2026 बैच के करीब 70 छात्रों ने इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखा। बाद में अन्य बैचों के कई छात्रों ने भी इस मांग का समर्थन किया।इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कड़ा कदम उठाते हुए निर्देश जारी किया कि नालसार के 2026 बैच के किसी भी छात्र का राज्य बार काउंसिल में वकील के रूप में नामांकन अगली सूचना तक न किया जाए। इसके साथ ही विश्वविद्यालय से यह भी कहा गया कि विरोध अभियान शुरू करने और उसमें शामिल छात्रों की पहचान कर रिपोर्ट भेजी जाए।
हालाँकि, इस आदेश की देशभर में आलोचना हुई। कॉकरोच जनता पार्टी ने तो मनन मिश्रा के आवास के बाहर तो प्रदर्शन की चेतावनी दे दी। भारी दबाव के बाद बीसीआई ने अपना आदेश वापस ले लिया। लेकिन मामले की जाँच जारी रखने की बात कही। इस पर भी मनन मिश्रा की आलोचना हुई। उन्हें फिर दूसरा आदेश भी वापस लेना पड़ा। बाद में तो उन्होंने माफी भी मांगी।