Supreme Court slams Greater Noida magistrate: जंतर मंतर प्रदर्शन में ग्रेटर नोएडा का छात्र शामिल हुआ। पुलिस केस बनने पर ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस जारी किया। सीजेआई सूर्यकांत को आज पता चला तो उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट की ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे हुई?
सीजेपी जंतर मंतर प्रोटेस्ट I File Photo
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से Cockroach Janata Party (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र प्रदर्शन में शामिल होने वाले कानून के दूसरे वर्ष के एक छात्र को नोटिस जारी किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सवाल किया कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही देशभर में छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक या जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका है, तब एक मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस कैसे जारी कर दिया।
हालांकि संबंधित नोटिस बाद में वापस ले लिया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीर माना। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने बुधवार को यह मामला उठाया गया। कोर्ट ने साफ कहा कि उसके आदेश का उल्लंघन किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
‘मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है?’
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि छात्रों के खिलाफ कोई जबरन कार्रवाई नहीं की जाए। ऐसे में किसी मजिस्ट्रेट द्वारा छात्र को नोटिस जारी करना अदालत के आदेश की अवहेलना के समान है। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि जब अदालत ने छात्रों के खिलाफ coercive action यानी जबरन कार्रवाई पर रोक लगा रखी है तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।CJP प्रदर्शन में शामिल होने पर दिया गया था नोटिस
मामला एक कानून के दूसरे वर्ष के छात्र से जुड़ा है, जिसे CJP की ओर से आयोजित छात्र आंदोलन में भाग लेने के संबंध में ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया था। Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत जारी किया गया था। इस कार्रवाई का आधार छात्र द्वारा CJP के प्रस्तावित छात्र प्रदर्शन में भाग लेने के लिए कथित तौर पर प्रचार करना बताया गया। बाद में नोटिस वापस ले लिया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल नोटिस वापस ले लेना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह अदालत के पहले से दिए गए स्पष्ट निर्देश के बावजूद जारी किया गया था।1 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात सुप्रीम कोर्ट का 1 सितंबर का देशव्यापी निर्देश है। अदालत ने छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में छात्रों के खिलाफ आगे किसी भी तरह की coercive action पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले छात्र आंदोलनों से जुड़े मामलों में दर्ज FIR को रद्द करने और छात्रों के खिलाफ भविष्य में जबरन कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। इसी आदेश के बावजूद ग्रेटर नोएडा में छात्र को नोटिस जारी किया गया। यही वजह है कि बुधवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारी की कार्रवाई को गंभीरता से लिया।नोएडा के बेलगाम अफसरों पर अदालत की टिप्पणीः नोएडा में NSA के इस्तेमाल पर भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जताई थी नाराजगी। एक दिन पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम और पुलिस अधिकारियों को एक छात्र कार्यकर्ता के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने के मामले में कड़ी फटकार लगाई थी। हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ NSA के तहत हुई कार्रवाई को रद्द कर दिया था और डीएम को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। चौधरी को नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूर प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को उनके और एक्टिविस्ट-पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ NSA लगाया था।
हाईकोर्ट ने प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई पर बेहद तीखी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि अधिकारियों को यह याद रखना चाहिए कि उनकी निष्ठा संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति।
‘उत्तर प्रदेश Orwellian Dystopia में बदल सकता है’
इलाहाबाद हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ जस्टिस अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने अधिकारियों की शक्तियों के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी। अदालत ने कहा कि नौकरशाह और पुलिस अधिकारी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, गरिमा और कल्याण की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण शक्तियों से लैस होते हैं। अगर अधिकारी अपने संवैधानिक दायित्व और शपथ की अनदेखी करते हैं तो वे जनता की नजर में ब्रिटिश शासन के दमनकारी अवशेष जैसे दिखाई दे सकते हैं। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर नौकरशाही में गलत आचरण करने वाले अधिकारियों को नहीं रोका गया तो उत्तर प्रदेश जल्द ही एक ‘Orwellian Dystopia’ में बदल सकता है।नोएडा मज़दूर आंदोलन में अधिकारियों की बेरहमी
24 वर्षीय इतिहास स्नातक आकृति चौधरी को नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। प्रदर्शन में मजदूरों ने अधिक वेतन की मांग की थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने बाद में उनके खिलाफ NSA लगाया। हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को NSA के तहत उनकी हिरासत को रद्द करते हुए 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस की ओर से पेश किए गए डोजियर में महज आरोप थे और उनके समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री नहीं थी। हाईकोर्ट ने कहा कि NSA जैसे असाधारण कानून का इस्तेमाल करने से पहले जिलाधिकारी को पुलिस रिकॉर्ड की गहराई से जांच करनी चाहिए थी।
अदालत का संदेश क्या है
ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केवल एक छात्र को जारी किए गए नोटिस तक सीमित नहीं है। इस मामले में अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रशासनिक अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से ऊपर नहीं हैं। एक तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NSA के कथित दुरुपयोग पर अधिकारियों को संविधान के प्रति अपनी जवाबदेही याद दिलाई है, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने छात्र के खिलाफ जारी नोटिस को लेकर सवाल उठाते हुए प्रशासन को चेताया है। दोनों घटनाक्रमों में एक साझा संदेश दिखाई देता है- लोकतांत्रिक विरोध और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर कार्रवाई करते समय प्रशासन को अदालतों के निर्देशों और संविधान की सीमाओं का सख्ती से पालन करना होगा।