हैदराबाद में उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में विवाद जारी है। IIIT-हैदराबाद में स्क्रीनिंग रद्द किए जाने के कुछ दिनों बाद NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों ने बुधवार शाम कैंपस में डॉक्यूमेंट्री ‘Prisoner No. 626710 is Present’ की स्क्रीनिंग आयोजित की। छात्रों के मुताबिक यह स्क्रीनिंग “एकजुटता” और फिल्म में उठाए गए सवालों पर बातचीत के लिए की गई थी।
स्क्रीनिंग में कैंपस के छात्रों ने हिस्सा लिया। छात्रों ने इसे “solidarity screening” बताया। एक छात्र ने कहा कि फिल्म न्याय व्यवस्था में देरी और उन विचाराधीन कैदियों के सवाल उठाती है जो वर्षों तक मुकदमा शुरू हुए बिना जेल में रहते हैं। छात्रों ने विश्वविद्यालयों के अन्य छात्र संगठनों से भी ऐसी स्क्रीनिंग आयोजित करने की अपील की है।

स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं दी गई थी

हालांकि NALSAR प्रशासन ने इस आयोजन से खुद को अलग कर लिया है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्रीकृष्ण देव राव ने कहा कि NALSAR ने डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग को अधिकृत नहीं किया था और विश्वविद्यालय के किसी भी प्राधिकारी ने इसके लिए आधिकारिक अनुमति नहीं दी थी। इससे यह स्पष्ट है कि छात्रों द्वारा आयोजित कार्यक्रम और विश्वविद्यालय प्रशासन की आधिकारिक गतिविधि के बीच अंतर रखा गया है।
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IIIT हैदराबाद में क्यों रद्द हुई थी स्क्रीनिंग?

इस पूरे विवाद की शुरुआत IIIT-हैदराबाद से हुई। वहां छात्रों के एक समूह ने 18 सितंबर को KRB Auditorium में शाम 8 बजे ‘Prisoner No. 626710 is Present’ की स्क्रीनिंग प्रस्तावित की थी। डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार ललित वाचानी ने बनाई है। 17 सितंबर को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा था कि ऐसी फिल्म, जिसे बोर्ड से प्रमाणपत्र नहीं मिला है, उसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग Cinematograph Act का उल्लंघन हो सकती है, जब तक कि कानून के तहत कोई विशेष छूट प्राप्त न की गई हो। CBFC ने IIIT-हैदराबाद को भी टैग करते हुए आवश्यक कार्रवाई की ओर ध्यान दिलाया था।
इसके बाद IIIT-हैदराबाद ने स्क्रीनिंग रद्द कर दी और कहा कि यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित या अधिकृत नहीं था। संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी कैंपस स्पेस में- जिसमें कक्षाएं, प्रयोगशालाएं और कार्यालय भी शामिल हैं—इस फिल्म की सार्वजनिक या निजी स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं होगी।

‘No Tyrants, No Silence’ से जुड़े आठ छात्रों को नोटिस

विवाद केवल डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं रहा। IIIT-हैदराबाद ने ‘No Tyrants, No Silence’ (NTNS) नामक स्वतंत्र छात्र मंच से जुड़े आठ छात्रों को अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी। संस्थान के मुताबिक यह समूह आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त छात्र संगठन नहीं था।
छात्रों को भेजे गए नोटिस में संस्थान का नाम इस्तेमाल करने वाली सोशल मीडिया हैंडल, वेबसाइट और अन्य सामग्री हटाने के लिए कहा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा नहीं करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, यहां तक कि संस्थान से निष्कासन जैसी कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी। छात्रों ने कार्रवाई के आधार और उन नियमों पर सवाल उठाए जिनके तहत स्वतंत्र छात्र समूह चलाने या अपने विचार प्रकाशित करने पर रोक लगाई जा रही है। NTNS इससे पहले जाति, मेरिट, छात्र भागीदारी, संस्थागत फैसलों और तकनीकी शिक्षा से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक सवालों पर चर्चाएं आयोजित कर चुका है।

NLSIU बेंगलुरु में भी विवाद

उमर खालिद की इसी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग का प्रस्ताव National Law School of India University (NLSIU), Bengaluru में भी रखा गया था। वहां RSS से संबद्ध छात्र संगठन ABVP ने इसका विरोध किया और आरोप लगाया कि कैंपस का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए किया जा सकता है। छात्र समिति ने पहले स्क्रीनिंग स्थगित करते हुए “लॉजिस्टिक और सुरक्षा संबंधी कारणों” का हवाला दिया था। बाद में ABVP की बेंगलुरु इकाई ने दावा किया कि स्क्रीनिंग रद्द कर दी गई। बाद की रिपोर्टों के अनुसार आयोजकों ने आपराधिक कार्रवाई की धमकी, डराने-धमकाने और doxxing समेत कई तरह के दबाव का भी दावा किया था।

डॉक्यूमेंट्री में क्या है?

‘Prisoner No. 626710 is Present’ फिल्मकार ललित वाचानी की डॉक्यूमेंट्री है। यह उमर खालिद के छात्र कार्यकर्ता के रूप में उनके सफर, सितंबर 2020 में गिरफ्तारी और उसके बाद जेल में रहने की स्थिति पर केंद्रित है। उमर खालिद पर अभी तक मुकदमे की कार्यवाही अदालत ने शुरू नहीं की है। लेकिन इस दौरान उमर खालिद को जेल में रहते हुए लगभग छह साल बीत रहे हैं।
खालिद को सितंबर 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) समेत विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं और वह तब से हिरासत में हैं। अभियोजन पक्ष ने उन पर फरवरी 2020 के दंगों की कथित बड़ी साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया है।

विवाद का बड़ा सवाल: कैंपस में अभिव्यक्ति की आजादी

इस पूरे घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, छात्र संगठनों की स्वायत्तता, फिल्म प्रमाणन कानून और राजनीतिक-सामाजिक बहस की सीमाओं को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। एक तरफ CBFC का कहना है कि बिना प्रमाणन वाली फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग कानून के तहत समस्या पैदा कर सकती है। दूसरी तरफ छात्रों ने इसे चर्चा और विचार-विमर्श के अवसर के रूप में आयोजित किया है। IIIT-हैदराबाद और NALSAR दोनों ने अपने-अपने मामलों में यह स्पष्ट किया है कि संबंधित स्क्रीनिंग विश्वविद्यालय की आधिकारिक गतिविधि नहीं थी।
इस तरह IIIT-हैदराबाद में रद्द हुई स्क्रीनिंग के बाद NALSAR में छात्रों द्वारा की गई स्क्रीनिंग ने विवाद को एक नए चरण में पहुंचा दिया है, जहां कानूनी प्रमाणन, विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति और छात्रों के स्वतंत्र राजनीतिक-सामाजिक विमर्श- तीनों सवाल एक साथ सामने हैं।