UPI पर लगने वाले MDR टैक्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कड़े सवाल किये। अदालत ने सवाल उठाया कि जब कानून इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराने की बात करता है, तो लेनदेन पर शुल्क लगाने की जिम्मेदारी किस पर आती है। इसे स्पष्ट करें।
₹2,000 से अधिक के चुनिंदा UPI लेनदेन पर Merchant Discount Rate (MDR) लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र से विस्तृत जवाब मांगा है। हालांकि अदालत ने फिलहाल इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होनी है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थीं। अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दाखिल याचिका पर बेंच सुनवाई कर रही थी। याचिका में वित्त मंत्रालय की 14 और 15 सितंबर की अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई है।
केंद्र से हलफनामा दाखिल करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से हलफनामे के जरिए यह स्पष्ट करने को कहा है कि ₹2,000 से अधिक के कुछ UPI व्यापारी लेनदेन पर MDR लगाने का कानूनी और नीतिगत आधार क्या है। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमण ने अदालत को बताया कि नया शुल्क 15 अक्टूबर से लागू होगा और करीब 96 फीसदी व्यापारी UPI लेनदेन इससे प्रभावित नहीं होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि आवश्यक सेवाओं से जुड़े लेनदेन में शुल्क अधिकतम ₹5 तक सीमित रहेगा।ASG ने अदालत से कहा कि यह न तो टैक्स है और न ही सरकारी फीस। सरकार इसमें से एक रुपया भी नहीं लेगी। उनके मुताबिक यह भुगतान प्रणाली में शामिल बैंकों और पेमेंट एग्रीगेटर्स के बीच सेटलमेंट शुल्क है।
जस्टिस बागची का सवाल- आखिर शुल्क का कानूनी आधार क्या है?
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सरकार से यह जानना चाहा कि अगर यह शुल्क टैक्स या फीस नहीं है तो इसके लिए कार्यपालिका के पास कानूनी अधिकार का स्रोत क्या है। उन्होंने पूछा कि जब इसे फीस नहीं माना जा रहा है तो इस तरह की राशि वसूलने का कानूनी आधार क्या है और आखिर यह किस सेवा के बदले ली जा रही है।सरकार ने दी सफाईः ASG ने जवाब दिया कि इसे किसी तरह की 'expropriation' यानी संपत्ति के अधिग्रहण के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन को पूरा करने में बैंकों की लागत आती है। क्रेडिट और डेबिट कार्ड लेनदेन में शुल्क पहले से मौजूद हैं, जबकि UPI को अब तक इन शुल्कों से छूट मिली हुई थी। सरकार का कहना है कि UPI के पूरे इकोसिस्टम को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए MDR की जरूरत है।
इनकम टैक्स कानून की धारा 269SU का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने Income Tax Act की धारा 269SU का भी हवाला दिया। यह प्रावधान कुछ निर्धारित कारोबारियों को ग्राहकों के लिए इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराने से संबंधित है। पीठ ने यह सवाल उठाया कि जब कानून इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराने की बात करता है, तो UPI के जरिए होने वाले लेनदेन में शुल्क लगाने की कानूनी प्रकृति और जिम्मेदारी किस पर आती है, इसे स्पष्ट किया जाना जरूरी है।याचिकाकर्ता ने अंतरिम रोक की मांग की
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से नए शुल्क ढांचे पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की। उनका तर्क था कि UPI पर शुल्क लगाने से लोगों और कारोबारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है और इससे कैश तथा काले धन के लेनदेन में वृद्धि की आशंका पैदा हो सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया और केंद्र, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) तथा UPI & Services Steering Committee को नोटिस जारी किया।क्या है नया UPI MDR सिस्टम?
केंद्र सरकार ने सितंबर में भुगतान व्यवस्था में बदलाव करते हुए ₹2,000 तक के UPI भुगतान को नो-चार्ज सुरक्षा के दायरे में रखा है। इसके बाद घोषित ढांचे के तहत ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा Person-to-Merchant (P2M) लेनदेन पर 0.4 फीसदी MDR लागू होगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेनदेन पर इसकी अधिकतम सीमा ₹300 होगी। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि Person-to-Person (P2P) UPI लेनदेन किसी भी राशि का हो, वह मुफ्त रहेगा। ₹2,000 तक के व्यापारी भुगतान भी मुफ्त रहेंगे। छोटे व्यापारियों के लिए भी शून्य-MDR व्यवस्था जारी रहेगी। सरकार के मुताबिक इसी वजह से करीब 96 फीसदी P2M लेनदेन पर नए MDR का असर नहीं पड़ेगा।नए ढांचे में कुछ essential और thin-margin sectors के लिए ₹2,000 से ऊपर के लेनदेन पर फ्लैट ₹5 MDR निर्धारित किया गया है। इनमें रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्र शामिल हैं। वहीं कैपिटल मार्केट से जुड़े लेनदेन पर MDR 0.02 फीसदी, अधिकतम ₹300 तक होगा।
सरकार का तर्क क्या है?
केंद्र का कहना है कि MDR कोई ऐसा शुल्क नहीं है जिसे सरकार सीधे वसूल रही है। यह भुगतान व्यवस्था में शामिल संस्थाओं के बीच वितरित होने वाला शुल्क है। सरकार के अनुसार इससे UPI के संचालन, बुनियादी ढांचे और भविष्य के विस्तार की लागत को संभालने में मदद मिलेगी। सरकार ने यह भी कहा है कि नए ढांचे से व्यक्तिगत UPI उपयोगकर्ताओं पर सीधे कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और छोटे कारोबारियों को भी सुरक्षा दी गई है।विवाद अब कानूनी सवालों पर केंद्रित
याचिका में केंद्र के फैसले को चुनौती देते हुए आरोप लगाया गया है कि MDR व्यवस्था पर्याप्त कानूनी सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लाई गई। याचिकाकर्ता ने Payment and Settlement Systems Act, 2007 में किए गए बदलाव और उसके आधार पर जारी अधिसूचनाओं की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं। इस तरह सुप्रीम कोर्ट के सामने फिलहाल मूल सवाल यह है कि ₹2,000 से ऊपर के चुनिंदा UPI व्यापारी लेनदेन पर MDR लगाने के लिए सरकार के पास पर्याप्त वैधानिक आधार है या नहीं। अदालत ने इस मुद्दे पर केंद्र से हलफनामा मांगा है, जबकि 15 अक्टूबर से प्रस्तावित व्यवस्था पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है।