एक बड़े घटनाक्रम में, अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने भारतीय अरबपति और उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ दर्ज रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी से जुड़े सभी आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही भारत के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल अडानी के खिलाफ अमेरिका में चल रहा हाई-प्रोफाइल कानूनी मामला समाप्त हो गया है। लेकिन इस मामले में जज ने जो टिप्पणियां की हैं, वो हमेशा दर्ज रहेंगी। जज ने इस मुकदमे को वापस लेने की पूरी प्रक्रिया की आलोचना की है।
अदालत का यह फैसला अमेरिकी न्याय विभाग (Department of Justice - DOJ) की उस याचिका के बाद आया है, जिसमें उन्होंने अडानी के खिलाफ दर्ज इस मुकदमे को वापस लेने का अनुरोध किया था।

क्या था पूरा मामला?

वर्ष 2024 में अमेरिकी अभियोजकों ने गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और अन्य पर गंभीर आरोप लगाए थे। आरोप था कि अडानी समूह की नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) परियोजनाओं के लिए भारतीय अधिकारियों को लगभग 26.5 करोड़ डॉलर (265 मिलियन डॉलर) की रिश्वत देने का वादा किया गया या भुगतान किया गया। साथ ही अमेरिकी निवेशकों और बैंकों से धोखाधड़ी कर इस जानकारी को छिपाने का दावा किया गया था।
अडानी समूह और गौतम अडानी ने शुरुआत से ही इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया था।
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जज गराफिस का 47 पन्नों का आदेश: प्रक्रिया पर जताई चिंता

न्यू यॉर्क (ब्रुकलिन) के अमेरिकी जिला जज निकोलस गराफिस ने सोमवार को 47 पन्नों के अपने आदेश में न्याय विभाग की मांग को स्वीकार करते हुए आरोपों को "विथ प्रिज्युडिस" (With Prejudice) खारिज कर दिया। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिकी सरकार भविष्य में इन्हीं आरोपों पर गौतम अडानी के खिलाफ दोबारा मामला दर्ज नहीं कर सकती।

जज ने केस वापस लेने की प्रक्रिया सही नहीं मानी

मामला खारिज करने के बावजूद जज गराफिस ने न्याय विभाग के इस फैसले तक पहुँचने के तरीके की तीखी आलोचना की और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए: जज ने नोट किया कि न्याय विभाग के प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककोटर ने मामले की जांच करने वाले एफबीआई (FBI), सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के अधिकारियों और मूल अभियोजकों से परामर्श किए बिना अडानी के वकीलों के साथ सीधे तालमेल बनाकर केस वापस लेने का फैसला किया। जज ने कहा- मुकदमा वापस लेने के फैसले में अनियमितताएं चिंताजनक हैं। मैककोटर ने जांच से जुड़े अनगिनत अधिकारियों की प्रोफेशनल राय को नजरअंदाज कर अपनी व्यक्तिगत राय को प्राथमिकता दी।
यह फैसला अमेरिकी न्याय विभाग के रुख को स्वीकार करना मात्र है, इसे अदालत द्वारा मामले के तथ्यों की पुष्टि या सरकार के तर्कों का समर्थन न समझा जाए।
- निकोलस गराफिस, जिला जज ब्रुकलिन फेडरल कोर्ट
अडानी रिश्वत मामले में जज ने कड़ी टिप्पणी की

न्याय विभाग ने केस वापस क्यों लिया?

मई में न्याय विभाग ने अदालत से मामला वापस लेने की अपील की थी। इसके पीछे मुख्य कारण दिए गए थे:  कथित घटनाक्रम का बड़ा हिस्सा अमेरिका से बाहर (भारत में) हुआ था, जिससे मुकदमा चलाना कानूनी रूप से जटिल था। यह मामला अब अमेरिकी न्याय विभाग की वर्तमान प्राथमिकताओं के अनुकूल नहीं था।

पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण मोड़

यह कदम तब उठाया गया जब अडानी ने अपनी नई कानूनी टीम में रॉबर्ट जे. गियुफ्रा जूनियर को शामिल किया। गियुफ्रा अमेरिकी लॉ फर्म सुलिवन एंड क्रॉमवेल के सह-अध्यक्ष और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निजी वकील हैं। उन्होंने इस साल की शुरुआत में न्याय विभाग के अधिकारियों के साथ बैठकें की थीं।
शुरुआत में जून में जज गराफिस ने सरकार के इस कदम का विरोध किया था और स्पष्टीकरण मांगा था कि क्या अडानी द्वारा अमेरिका में 10 अरब डॉलर ($10bn) के निवेश और 15,000 नौकरियां पैदा करने के वादे का इस फैसले से कोई लेना-देना है?

गौतम अडानी ने नवंबर 2024 में डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव जीतने पर बधाई देते हुए इस बड़े निवेश की घोषणा की थी।

अडानी के वकीलों और खुद गौतम अडानी ने शपथ पत्र दाखिल कर स्पष्ट किया कि निवेश का प्रस्ताव कभी भी केस वापस लेने की शर्त के रूप में नहीं दिया गया था। जज गराफिस ने आखिरकार स्वीकार किया कि इस निवेश वादे का न्याय विभाग के फैसले पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जनता इस बात का खुद आकलन कर सकती है कि ऐसे वित्तीय प्रस्तावों का कानून के शासन और निष्पक्ष न्याय की धारणा पर क्या असर पड़ता है।

अडानी ने फैसले का स्वागत किया

फैसले का स्वागत करते हुए गौतम अडानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा: "मैं अमेरिकी अदालत के फैसले का नम्रता और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति गहरे सम्मान के साथ स्वागत करता हूँ। इस चुनौतीपूर्ण समय के दौरान, सत्य, निष्पक्षता और कानून के शासन में हमारा विश्वास अटूट रहा। उन सभी का आभार जिन्होंने हम पर और न्याय प्रणाली पर भरोसा बनाए रखा।"

सिविल मामलों और अन्य समझौतों की स्थिति

यह आपराधिक मामला अडानी समूह के खिलाफ चल रही अन्य सिविल कानूनी कार्यवाहियों से अलग है:
एसईसी (SEC) सिविल सेटलमेंट: मई में निवेशकों को दी गई जानकारियों से जुड़े सिविल आरोपों को सुलझाने के लिए गौतम अडानी 6 मिलियन डॉलर और उनके भतीजे सागर अडानी 12 मिलियन डॉलर का भुगतान करने पर सहमत हुए थे (बिना किसी अपराध को स्वीकार या अस्वीकार किए)।
ईरान प्रतिबंधों का मामला: अडानी ग्रुप की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज ने अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के उल्लंघन से जुड़े सिविल मामले को निपटाने के लिए अमेरिकी खजाने को 275 मिलियन डॉलर का भुगतान करने पर सहमति जताई थी।
64 वर्षीय गौतम अडानी अडानी समूह के अध्यक्ष हैं। उनका कारोबारी साम्राज्य ऊर्जा, बंदरगाह, हवाई अड्डे, खनन और बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) जैसे विविध क्षेत्रों में फैला हुआ है। वह भारत के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक हैं और गुजरात राज्य से ताल्लुक रखते हैं। पीएम मोदी से उनके गहरे रिश्ते हैं। भारत के विपक्षी दलों का आरोप है कि 2014 में केंद्र में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी ग्रुप कई गुना रफ्तार से बढ़ा। उसने अंबानी समूह को भी पीछे छोड़ दिया है।