ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 10 अक्टूबर को प्रस्तावित दिल्ली मार्च से पहले राजधानी में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए जा रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और प्रशासन की ओर से असाधारण कदम उठाए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों को दिल्ली आने से रोकने, मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियां लगाने और ट्रेनों को रद्द करने की खबरों के बीच आंदोलन की रणनीति, विपक्ष की एकजुटता और सरकार की मंशा को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
क्या सरकार इस आंदोलन के बढ़ते जनसमर्थन से चिंतित है? क्या आंदोलनकारी दमन की आशंकाओं के बावजूद एकजुट हैं? हिंसा की आशंका के बीच आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखने की क्या रणनीति है? और यदि सरकार प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकती है, तो आंदोलन आगे किस रूप में जारी रहेगा?
इन सवालों पर जाने-माने सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने वरिष्ठ पत्रकार प्रो. मुकेश कुमार से बातचीत में अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि सरकार जिस पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था कर रही है, वह इस बात का संकेत है कि उसे आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की आशंका है। उनके मुताबिक, आंदोलन की पहली नैतिक और राजनीतिक जीत हो चुकी है, लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी है।
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‘सरकार को आंदोलन के जनसमर्थन का अंदाजा है’

मुकेश कुमार: दिल्ली मार्च को लेकर काफी असमंजस और आशंकाएं हैं। सरकार ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिशें हो रही हैं। ऐसे माहौल में आंदोलनकारी कितने उत्साहित और आश्वस्त हैं?
योगेंद्र यादव: सबसे पहले तो हमारे भीतर उत्साह है। इसकी वजह यह है कि सरकार के कदमों से लगता है कि उसने भी इस प्रदर्शन को मिल रहे जनसमर्थन की गंभीरता को समझ लिया है। आप देखिए कि पुलिस विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और पेइंग गेस्ट आवासों तक जाकर छात्रों को प्रदर्शन में शामिल न होने के लिए समझाने की कोशिश कर रही है। स्थानीय स्तर पर लोगों से अपील की जा रही है कि वे मार्च में न आएं। रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर भी घोषणाएं की जा रही हैं।
सवाल है कि यदि सरकार को लगता है कि प्रदर्शन में लोग शामिल ही नहीं होंगे, तो उन्हें रोकने के लिए इतनी कोशिश क्यों की जा रही है? इससे यही संकेत मिलता है कि प्रशासन को छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों के बड़ी संख्या में जुटने की आशंका है। दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों को बंद करने की योजना और राजधानी आने वाली ट्रेनों को रद्द किए जाने की खबरें भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। मैंने आंदोलनों के लंबे इतिहास में प्रदर्शनकारियों को ट्रेनों से उतारे जाते, रास्ते में रोके जाते और हिरासत में लिए जाते देखा है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में ट्रेनों को रद्द करने की बात असाधारण है। मेरा सवाल है कि अगर सरकार को लगता है कि कुछ प्रदर्शनकारियों को रास्ते में रोक देने से स्थिति संभल जाएगी, तो फिर ट्रेनों को ही रद्द करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
दिल्ली में बड़े पैमाने पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की खबरें हैं। अब तक सेना बुलाने या कर्फ्यू लगाने जैसी स्थिति नहीं बनी है, लेकिन बाकी कदमों से यह साफ दिखाई देता है कि प्रशासन इस प्रदर्शन को लेकर असाधारण रूप से सतर्क है। मैं इसे आंदोलन की पहली नैतिक और राजनीतिक जीत मानता हूं। अगर जनता के समर्थन को लेकर सरकार आश्वस्त होती, तो शायद उसे इस तरह के कदम उठाने की जरूरत नहीं पड़ती। मैंने एक मित्र से कहा कि पहले विपक्ष भारत बंद का आह्वान करता था, अब सरकार ही भारत बंद करवाने की स्थिति पैदा कर रही है। यदि लोगों को राजधानी में आने और अपनी बात रखने से रोकने के लिए इतनी बड़ी व्यवस्था करनी पड़े, तो इसे लोकतंत्र की उपलब्धि कैसे कहा जा सकता है?

‘पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, विरोध रोकना नहीं’

मुकेश कुमार: आपने अन्ना आंदोलन सहित कई बड़े जनांदोलन देखे हैं। उस समय भी देशभर से लोग दिल्ली आते थे, लेकिन इस तरह की रोकथाम नहीं दिखाई देती थी। आज की स्थिति में क्या फर्क है? 
योगेंद्र यादव: हमारे राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब लाखों लोग आंदोलन करने दिल्ली आए। वामपंथी संगठनों की बड़ी रैलियों में भी देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आते थे। सरकारों को मालूम होता था कि ये लोग उनके विरोध में जुट रहे हैं, फिर भी उन्हें आने से रोकने के लिए इस तरह की व्यापक व्यवस्था नहीं की जाती थी। यह राजनीति का एक न्यूनतम लोकतांत्रिक कायदा था कि विरोध करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए। अन्ना आंदोलन के समय पुलिस की जिम्मेदारी थी कि वह सुनिश्चित करे कि कोई हथियार लेकर प्रदर्शन स्थल में प्रवेश न करे, शांति बनी रहे और किसी तरह की हिंसा न हो। यही पुलिस का काम है।
पुलिस का काम यह तय करना नहीं है कि नागरिक किसी राजनीतिक प्रदर्शन में शामिल हों या नहीं। यह भी पुलिस का काम नहीं है कि वह किसी राजनीतिक या संवैधानिक पदाधिकारी के पक्ष या विपक्ष में अपना फैसला सुनाए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलनकारी क्या आरोप लगा रहे हैं, उससे पुलिस की वर्दी का कोई संबंध नहीं होना चाहिए। कोई व्यक्ति आरोपों से सहमत हो सकता है और कोई असहमत। लेकिन पुलिस का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि किसी राजनीतिक पक्ष की दलील को सही या गलत बताना। पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा मिले और आम जनता को भी कोई असुविधा न हो। यदि पुलिस स्वयं लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने से रोकने लगे, तो यह गंभीर सवाल पैदा करता है।
एक और चिंताजनक बात यह है कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग प्रदर्शनकारियों को धमकी देते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे वीडियो सामने आने की बात कही जा रही है, जिनमें प्रदर्शनकारियों पर हमला करने की धमकी दी गई है। यदि कोई व्यक्ति खुले तौर पर हिंसा की धमकी देता है, तो पुलिस को उसके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए आने वाले लोगों को रोकने पर पूरी ताकत लगा दी जाए और हिंसा की धमकी देने वालों के खिलाफ कार्रवाई दिखाई न दे, तो यह दोहरे मानदंड का सवाल खड़ा करता है। 

‘सरकार की आंदोलन को बांटने की कोशिश सफल नहीं हुई’

मुकेश कुमार: क्या आपको लगता है कि सरकार आंदोलन के विस्तार से घबरा गई है? वह इतनी सख्ती क्यों कर रही है?
योगेंद्र यादव: मुझे लगता है कि सरकार ने शुरुआत में कुछ राजनीतिक आकलन किए होंगे, जो अब तक सही साबित नहीं हुए हैं। पहला आकलन यह रहा होगा कि आंदोलनकारी आपस में बंट जाएंगे। नेहा बोरा और अभिजीत दी जैसे प्रमुख चेहरों के बीच मतभेद पैदा होंगे और आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दूसरा आकलन यह रहा होगा कि विपक्षी दल एकजुट नहीं होंगे और राजनीतिक विपक्ष तथा जनांदोलन के बीच तालमेल नहीं बन पाएगा। यह आकलन भी गलत साबित होता दिखाई दे रहा है।
छात्र संगठनों ने मिलकर प्रदर्शन में भागीदारी की घोषणा की है। CYSS, AISA, SFI, AISF और दूसरे युवा संगठनों के साथ-साथ किसान संगठनों, शिक्षक संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने भी समर्थन जताया है। इसका अर्थ है कि आंदोलन केवल कुछ व्यक्तियों या किसी एक संगठन तक सीमित नहीं रह गया है। अलग-अलग विचारधाराओं और संगठनों के लोग एक साझा मुद्दे पर साथ आ रहे हैं। विपक्षी दलों ने भी केवल बयान जारी करने तक सीमित रहने के बजाय सड़क पर उतरने का फैसला किया है। नेता प्रतिपक्ष और दूसरे सांसदों का प्रदर्शन में शामिल होना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मैंने कहा था कि जब संसद सड़क पर आ जाती है, तो लोकतंत्र में ‘लोक’ का पलड़ा भारी होने लगता है और ‘तंत्र’ का पलड़ा हल्का हो जाता है। लोकतंत्र की ताकत जनता है। जब जनता अपने अधिकारों को लेकर सक्रिय होती है, तो राजनीतिक व्यवस्था पर जवाबदेही का दबाव बनता है। इस एकजुटता का एक और पहलू है। बीजू जनता दल और भारत राष्ट्र समिति जैसे दल, जो इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं रहे हैं, इस मुद्दे पर अपना समर्थन जताते दिखाई दिए हैं। इससे लगता है कि चुनावी राजनीति में अलग-अलग खेमों में रहने वाले दल भी इस विवाद पर साथ आने की संभावना देख रहे हैं। मेरे विचार से सरकार की चिंता का बड़ा कारण यही है कि आंदोलन को अलग-थलग करने की उसकी कोशिशें अब तक सफल नहीं हुई हैं।

‘सरकार के सामने राजनीतिक समाधान और दमन, दो रास्ते हैं’

मुकेश कुमार: यदि आंदोलन का विस्तार हो रहा है और विपक्ष भी साथ आ रहा है, तो सरकार के पास क्या विकल्प बचते हैं?
योगेंद्र यादव: सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहला, राजनीतिक संवाद के जरिए समाधान निकाला जाए। दूसरा, आंदोलन को बलपूर्वक दबाने की कोशिश की जाए। राजनीतिक समाधान बहुत कठिन नहीं है, क्योंकि आंदोलन से जुड़े संगठनों और राजनीतिक दलों की प्रमुख मांगें स्पष्ट हैं। पहली मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें। दूसरी मांग विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को वापस लेने और मतदाता सूची से जुड़े विवादों की समीक्षा करने की है। तीसरी मांग चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उन्हें कानूनी संरक्षण देने से संबंधित 2023 के कानून को रद्द करने की है।
सरकार चाहे तो इन मांगों पर बातचीत शुरू कर सकती है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर निर्णय लिया जा सकता है। चुनाव आयोग के भीतर SIR की प्रक्रिया की समीक्षा की घोषणा की जा सकती है। इसी तरह नियुक्ति और कानूनी संरक्षण से संबंधित कानून पर भी राजनीतिक और संसदीय प्रक्रिया के जरिए विचार किया जा सकता है। मेरा कहना है कि सरकार को इन मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। लोकतंत्र में विरोध का जवाब केवल पुलिस बल से नहीं दिया जा सकता। लेकिन अब तक जो संकेत मिले हैं, उनसे लगता है कि सरकार संवाद के बजाय सख्ती का रास्ता अपना रही है। यदि वह प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए भारी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात करती है, तो सवाल उठेगा कि क्या यह उसकी ताकत है या राजनीतिक असहजता का संकेत। कुछ दिन पहले चुनाव आयोग तक जाने वाले लोगों की एक छोटी-सी टोली को रोकने के लिए भी बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाने की बात सामने आई थी। यदि कुछ लोगों को रोकने के लिए हजारों सुरक्षाकर्मियों की जरूरत पड़े, तो इसे सरकार की राजनीतिक सफलता कैसे माना जा सकता है?

‘आंदोलन लंबा चला तो चुनाव आयोग पर उठे सवाल और व्यापक होंगे’

मुकेश कुमार: क्या सरकार की ओर से आंदोलनकारियों के साथ बातचीत का कोई संदेश आया है? 
योगेंद्र यादव: मेरी जानकारी में ऐसा कोई संदेश नहीं आया है। पिछले कई दिनों से हम प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं और अपनी मांगें सार्वजनिक रूप से रख रहे हैं। यदि सरकार की ओर से बातचीत की कोई पहल होती, तो हम उसका जवाब देते। मुझे लगता है कि सत्ता में बैठे लोगों को कभी-कभी यह भ्रम हो जाता है कि हर समस्या का समाधान प्रबंधन से किया जा सकता है। किसी को दबाव से, किसी को आर्थिक प्रलोभन से और किसी को पुलिस कार्रवाई से नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र में जनता की असहमति को हमेशा इस तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जब लोग किसी मुद्दे को अपने अधिकारों से जुड़ा हुआ मानने लगते हैं, तो उन्हें चुप कराना आसान नहीं होता।
सरकार को यह समझना चाहिए कि आंदोलन को दबाने की कोशिश से समस्या समाप्त नहीं होगी। यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो उनका जवाब पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता के जरिए दिया जाना चाहिए। हर दिन नए आरोप और खुलासे सामने आने की बात कही जा रही है। उदाहरण के लिए, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने, नोटिस नहीं मिलने और नाम हटाने के कारण स्पष्ट नहीं किए जाने जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और चुनाव आयोग को तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। यदि सरकार विवाद का समाधान नहीं करती और आंदोलन लंबा खिंचता है, तो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बहस और व्यापक हो सकती है। इसलिए सरकार के हित में भी यही होगा कि वह समय रहते संवाद का रास्ता अपनाए।

‘हमारी तरफ से हिंसा नहीं होगी, चाहे उकसावे की कितनी भी कोशिश हो’

मुकेश कुमार: कुछ लोगों को आशंका है कि आंदोलन के दौरान हिंसा हो सकती है और फिर सरकार उसी को आधार बनाकर कार्रवाई कर सकती है। क्या आपको भी ऐसी आशंका है?
योगेंद्र यादव: मैं इस मौके पर सभी प्रदर्शनकारियों से अपील करना चाहता हूं कि वे पूरी तैयारी के साथ आएं और किसी भी परिस्थिति में हिंसा का रास्ता न अपनाएं। घर से निकलने से पहले भोजन कर लें, अपने साथ पानी रखें और कुछ खाने का सामान भी ले आएं। हो सकता है कि लंबे समय तक बाहर रहना पड़े। अपने साथ गमछा, दुपट्टा या कोई दूसरा उपयोगी कपड़ा भी रख सकते हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम संकल्प लेकर निकलें कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम हाथ नहीं उठाएंगे।
हम संविधान को बचाने के लिए आ रहे हैं, संविधान और कानून को तोड़ने के लिए नहीं। पुलिस की वर्दी में खड़ा सिपाही हमारा दुश्मन नहीं है। वह भी किसी किसान, मजदूर या गरीब परिवार का बेटा है। उसे दुश्मन मानकर चलना गलत होगा। हमारा संघर्ष किसी व्यक्तिगत पुलिसकर्मी से नहीं, बल्कि उन नीतियों और निर्णयों से है जिन पर हम सवाल उठा रहे हैं। मैं सभी प्रदर्शनकारियों से कहना चाहता हूं कि किसी भी उकसावे में न आएं। यदि कोई व्यक्ति हिंसा करने की कोशिश करता है, तो उससे दूरी बनाएं और आयोजकों तथा संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दें। यदि कोई बाहरी तत्व प्रदर्शन में घुसकर पत्थरबाजी या दूसरी हिंसक गतिविधियां करता है, तो शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को उससे खुद भिड़ने के बजाय उसे अलग करने और पुलिस को सूचना देने का प्रयास करना चाहिए। हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि आंदोलन की नैतिक ताकत बनी रहे। हिंसा से आंदोलन का मुद्दा पीछे छूट सकता है और असली सवालों से ध्यान भटक सकता है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों की जिम्मेदारी है कि शांति बनी रहे। पुलिस को निष्पक्षता से काम करना चाहिए और प्रदर्शनकारियों को अनुशासन बनाए रखना चाहिए।

‘जहां पुलिस रोके, वहीं आपका जंतर-मंतर’

मुकेश कुमार: लोगों के सामने एक व्यावहारिक सवाल भी है। यदि उन्हें जंतर-मंतर तक पहुंचने नहीं दिया जाता, तो वे कहां जाएं और अपना विरोध कैसे दर्ज कराएं?
योगेंद्र यादव: मेरी अपील है कि लोग जंतर-मंतर की दिशा में चलें। लेकिन यदि पुलिस उन्हें रास्ते में रोक देती है, तो वहां टकराव करने के बजाय शांतिपूर्वक बैठ जाएं। जहां पुलिस आपको रोके, वही आपका जंतर-मंतर है। किसान आंदोलन का अनुभव हमारे सामने है। जब किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने से रोका गया, तो उन्होंने दिल्ली के आसपास के विभिन्न स्थानों पर अपना विरोध जारी रखा। इस तरह आंदोलन एक स्थान तक सीमित नहीं रहा। यदि जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोका जाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि विरोध समाप्त हो जाएगा। दिल्ली में अलग-अलग स्थानों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी जा सकती है। प्रदर्शनकारियों को चाहिए कि वे वहां बैठकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोपों और मतदाता सूची से जुड़े विवादों पर चर्चा करें। जनता को इन मुद्दों की जानकारी दें और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें रखें। हमारा उद्देश्य किसी से भिड़ना नहीं, बल्कि जनता के सामने तथ्यों और सवालों को रखना है। एक स्थान पर प्रदर्शन रोक देने से लोगों की आवाज समाप्त नहीं होती। यदि आंदोलन को जंतर-मंतर तक सीमित रखने की कोशिश की जाएगी, तो वह दूसरे स्थानों पर भी अपनी बात रख सकता है। लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने के अनेक शांतिपूर्ण तरीके हैं।

‘तीन मांगों पर सहमति है, इनके पूरा होने तक संघर्ष जारी रहेगा’

मुकेश कुमार: क्या दिल्ली मार्च के बाद भी आंदोलन जारी रहेगा? आगे इसकी दिशा क्या होगी?
योगेंद्र यादव: यह स्पष्ट है कि आंदोलन केवल एक दिन के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। दिल्ली मार्च इसका एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसके बाद आंदोलन किस रूप में आगे बढ़ेगा, इसका फैसला युवा संगठनों और आंदोलन से जुड़े दूसरे पक्षों को मिलकर करना होगा। हमारी भूमिका आंदोलन का समर्थन करने, जरूरत पड़ने पर सलाह देने और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संघर्ष में सहयोग करने की है। आंदोलन का नेतृत्व करने वाले युवा और संगठन मिलकर आगे की रणनीति तय करेंगे। लेकिन तीन बुनियादी मांगों को लेकर व्यापक सहमति है। पहली, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग। दूसरी, SIR की प्रक्रिया को वापस लेने, उसकी समीक्षा करने और मतदाता सूची में किए गए बदलावों से संबंधित शिकायतों का समाधान करने की मांग। तीसरी, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उन्हें कानूनी संरक्षण देने से संबंधित 2023 के कानून को रद्द करने की मांग। हमारा कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर जनता का विश्वास बना रहना चाहिए। यदि मतदाता सूची में नाम हटाए जाने या चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब पारदर्शी प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए। जब तक इन मांगों पर संतोषजनक समाधान नहीं निकलता, आंदोलन किसी न किसी रूप में जारी रहेगा। सरकार को यह समझना चाहिए कि युवा जब किसी मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो उसे केवल एक संगठन या एक नेतृत्व तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। आंदोलन का स्वरूप बदल सकता है, उसमें शामिल लोगों की संख्या घट-बढ़ सकती है और उसके केंद्र भी बदल सकते हैं। लेकिन इससे उसके पीछे उठाए जा रहे सवाल समाप्त नहीं हो जाते। सरकार से कहना चाहता हूं कि जनभावनाओं को बलपूर्वक रोकने की कोशिश न करे। पानी के बहाव को रोकने की कोशिश करने के बजाय यह समझने की जरूरत है कि वह बह क्यों रहा है।
मुकेश कुमार: यानी यह मार्च केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष की शुरुआत है?
योगेंद्र यादव: बिल्कुल। यह केवल एक दिन का सांकेतिक प्रदर्शन नहीं है। यह आंदोलन तब तक जारी रहने की संभावना रखता है, जब तक उसके मूल सवालों का समाधान नहीं होता। आने वाले दिनों में इसकी रणनीति, स्वरूप और नेतृत्व में बदलाव हो सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता के अधिकारों से जुड़े सवाल अपनी जगह बने रहेंगे। सरकार के पास अभी भी संवाद और राजनीतिक समाधान का रास्ता खुला है। उसे आंदोलनकारियों की मांगों को सुनना चाहिए और लोकतांत्रिक तरीके से समाधान निकालना चाहिए। हमारी ओर से स्पष्ट संदेश है कि संघर्ष शांतिपूर्ण होगा, संविधान के दायरे में होगा और जनता के अधिकारों के लिए होगा।