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पहले बजट के समय सीतारमण को मिली फटेहाल अर्थव्यवस्था

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपना पहला बजट ऐसे समय पेश करने जा रही हैं, जब अर्थव्यवस्था फटेहाल है। उन्हें अपने पूर्ववर्ती वित्त मंत्री अरुण जेटली से विरासत में ऐसी अर्थव्यवस्था मिली है, जो हर फ्रंट पर नाकाम है। ऐसा लग रहा था कि चुनाव के बाद अर्थव्यवस्था आगे न बढे, इसमें कम से कम ठहराव तो आ ही जाएगा। पर सभी इंडिकेटर बता रहे हैं कि फिसलन जारी है। अर्थव्यवस्था में सुधार का कोई संकेत नहीं है। इसके इंडिकेटरों में प्रमुख कारों की बिक्री लगातार तीसरे महीने गिरी है और पिछले 8 महीने के न्यूतनम स्तर पर पहुँच चुकी है। साफ़ है, चुनाव ख़त्म हो जाने, एक दल को पूर्ण बहुमत हासिल हो जाने और एक बहुत ही मजबूत और ठोस सरकार बन जाने के बावजूद अर्थव्यवस्था का लुढकना जारी है। 
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कार उद्योग ख़स्ता हाल

मोटर कार उद्योग का कहना है कि जून महीने में गाड़ियों की बिक्री 19 प्रतिशत कम हुई है, सिर्फ़ 2,22,000 गाड़ियों की बिक्री हुई है। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटो मैन्युफ़ैक्चरर्स के आँकड़े बताते हैं कि जून महीने में देश की सबसे बड़ी मोटर कंपनी मारुति सुज़ुकी की बिक्री 17.2 प्रतिशत गिर कर 1,11,014 पर आ गई। हुंदे की बिक्री 7.3 प्रतिशत कम हुई और कंपनी सिर्फ़ 42,007 गाड़ियाँ बेच सकी। इसी तरह टाटा मोटर्स की बिक्री में 27 प्रतिशत कि गिरावट दर्ज की गई और उसकी 13,351 गाड़ियाँ बिकीं। प्रतिशत के हिसाब से सबसे ज़्यादा नुक़सान होंडा को हुआ, जिसकी बिक्री में 41.4 प्रतिशत की कमी आई और उसकी सिर्फ़ 10,314 गाड़ियाँ बिकीं।
Bad Indian economy before Sitharaman first budget - Satya Hindi
यही हाल वाणिज्यिक गाड़ियों यानी कॉमर्शियल वेहिकल्स के क्षेत्र में हुआ। टाटा मोटर्स की गाड़ियाँ 7 प्रतिशत कम बिकीं और 35,722 पर आ गईं। महिंद्रा एंड महिंद्रा की बिक्री में 15 की गिरावट देखी गई और इसकी 16,394 गाड़ियाँ बिकीं। 

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि चुनाव के बाद सरकार ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की या कोई कदम नहीं उठाया, जिससे उद्योग को कोई फ़ायदा होता हो। ऐसा कोई काम भी नहीं हुआ, जिससे अर्थव्यवस्था को मदद मिलती हो।
यानी, उद्योग को कोई ट्रिगर नहीं मिला, ऐसे में यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि यकायक उद्योग करवट लेने लेगा। 

जीएसटी से कम राजस्व उगाही

अर्थव्यवस्था के नहीं सुधरने के दूसरे संकेत भी मिल रहे हैं। जून महीने के दौरान जीएसटी की राजस्व उगाही अपने लक्ष्य से कम है। यह 1 लाख करोड़ रुपए से नीचे रह गई। मई महीने में 1,00,289 करोड़ रुपए की जीएसटी वसूली हुई थी तो लोगों को उम्मीदें बँधी थीं। पर यह जून में गिर कर 99,939 करोड़ रुपये पर आ गई। जीएसटी उगाही को अर्थव्यवस्था का इंडिकेटर इसलिए माना जाना चाहिए कि अब तमाम उत्पादों पर यही एक टैक्स लगता है। इससे यह पता चलता है कि इस दौरान कारोबार कैसा रहा, उत्पादन और खपत या माँग की  क्या स्थिति रही। सरकार को कितने पैसे मिले, यह तो एक मुद्दा है ही। 

कम पूँजी निवेश

पूंजी निवेश का हाल इससे बेहतर नहीं है। सेंटर फ़ॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी सीएमआईई का कहना है कि अप्रैल-जून तिमाही में 43,300 करोड़ रुपए का निवेश हुआ। यह जनवरी-मार्च तिमाही के निवेश से 81 प्रतिशत कम है। यह पिछले साल के अप्रैल-जून तिमाही के निवेश से 87 प्रतिशत कम है।

कम बारिश, कम बुवाई

मौसम विभाग का कहना है कि जून में 97.9 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि औसत बारिश 151.1 मिलीमीटर रहती है। यदि इन दो दिनों में अच्छी बारिश हुई तो भी यह 106 मिलीमीटर के आसपास ही रहेगी, यह भी औसत से कम होगा। साल 1920 से अब तक सिर्फ़ चार बार ऐसा हुआ कि इस बार के जून से कम बारिश हुई है। ये साल हैं 2009 (85.7 मिलीमीटर), 2014 (95.4 मिलीमीटर), 1926 (98.7 मिलीमीटर) और 1923 (102 मिलीमीटर)। 
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खरीफ़ की बुवाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। लगभग 25 प्रतिशत कम बुवाई हुई है। कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़, इस बार अब तक सिर्फ़ 146.61 लाख हेक्टेअर में खरीफ़ की बुवाई हुई है। पिछले साल इसी दौरान 162.07 लाख हेक्टेअर ज़मीन पर खरीफ़ की बुवाई अब तक हो चुकी थी।

फिसलती जीडीपी 

पहले से ही दयनीय हालत में पहुँच चुके कृषि क्षेत्र के लिए यह चिंताजनक स्थिति होगी। चिंताजनक स्थिति तो आर्थिक विकास के लिए भी होगी। यदि फ़सलें प्रभावित होंगी तो इसका सीधा असर कृषि की विकास दर और सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पर भी पड़ेगा। बता दें कि 2018-19 में कृषि की विकास दर सिर्फ़ 2.9 फ़ीसदी रही और आख़िरी तिमाही में तो यह सिर्फ़ 0.1 फ़ीसदी थी। 

जीडीपी विकास दर भी मार्च तिमाही में गिरकर 5.8 फ़ीसदी पर आ गई है। इसका असर तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार पर भी पड़ेगा और बेरोज़गारी बढ़ने की आशंका रहेगी। हाल ही में सरकारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 45 साल में रिकॉर्ड बेरोज़गारी है। यानी स्थिति और बदतर होने की आशंका है।
लेकिन शुरुआत तो बीजेपी के चुनाव जीतने के बाद ही हो गई थी। नरेंद्र मोदी सरकार के पदभार संभालते ही अर्थव्यवस्था से जुड़ी बुरी ख़बरें आने लगी थीं। पहली मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को लेकर इतनी लापरवाह रही कि हर मामले में अर्थव्यवस्था पिछड़ती रही और उसका नतीजा भी उसी समय दिखने लगा। पर चुनाव सामने होने की वजह से सरकार उन आँकड़ों को लगातार छिपा रही थी। अब ये बातें सामने आने लगी हैं। ताज़ा मिसाल खाद्य पदार्थों के सूचकांक को लेकर है। खाद्य पदार्थों का थोक मूल्य सूचकांक पिछले तिमाही में बढ़ कर 7.37 प्रतिशत पर पहुँच गया, जिससे सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक है। दिसंबर 2018 में यह -0.42 प्रतिशत पर था।

सवाल है कि इस स्थिति में निर्मला सीतारमण क्या करेंगी? अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए उनके पास क्या उपाय है, कौन बड़े सुधार हैं, जिनके भरोसे वह अर्थव्यवस्था में जान फँक पाएँगी, सवाल यह है। इसी हफ़्ते बजट आ जाएगा, पता चल जाएगा कि वह कितना कुछ कर पाई हैं। लेकिन बहुत उम्मीद करना वित्त मंत्रालय से ज़्यादती होगी। 
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