मनीलाइफ की रिपोर्ट में दावा है कि आरटीआई से खुलासा हुआ है कि बैंक ऑफ बड़ौदा ने पिछले छह वर्षों में 100 करोड़ से ज़्यादा के 35715 करोड़ रुपये के लोन राइट-ऑफ कर दिए हैं, लेकिन गोपनीयता का हवाला देकर डिफॉल्टरों के नाम बताने से इनकार कर दिया है।
सरकारी बैंक ऑफ बड़ौदा ने पिछले छह वित्तीय वर्षों में 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक के बकाया वाले कर्जदारों के 35 हज़ार 715 करोड़ रुपये के लोन 'टेक्निकल राइट-ऑफ' कर दिए यानी बट्टे खाते में डाल दिए हैं। मनीलाइफ़ ने रिपोर्ट दी है कि यह जानकारी एक आरटीआई आवेदन के जवाब में सामने आई है। लेकिन बैंक ने इन बड़े कर्जदारों के नाम सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है और इसके पीछे सूचना का अधिकार कानून की गोपनीयता संबंधी धाराओं का हवाला दिया है। हालाँकि, कई बार ऐसेे सरकारी बैंक छोटे कर्जदारों के नाम तो अख़बारों में छपवाते रहे हैं और कुर्की जैसी कार्रवाई भी की जाती रही है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के राइट-ऑफ़ का यह दावा वित्तीय मामलों की वेबसाइट मनीलाइफ की एक रिपोर्ट में किया गया है। इसमें पुणे के आरटीआई एक्टिविस्ट विवेक वेलणकर को बैंक की ओर से दिए गए जवाब का हवाला दिया गया है। योगेश सपकले की रिपोर्ट में आरटीआई के जवाब के हवाले से बताया गया है कि बैंक ऑफ बड़ौदा ने वित्त वर्ष 2020-21 से 2025-26 के बीच 100 करोड़ रुपये से अधिक के लोन खातों में कुल 35 हज़ार 715 करोड़ रुपये का राइट-ऑफ किया है।
रिपोर्ट में बैंक के हवाले से कहा गया है कि यह 'टेक्निकल राइट-ऑफ' है। यानी इन राशियों को लेखा-जोखा से हटाया गया है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि बैंक ने वसूली की कोशिश पूरी तरह बंद कर दी है। लेकिन इसके साथ यह भी सवाल उठता है कि तो फिर इन डिफॉल्टरों के नाम बताने में बैंक को क्या दिक्कत है?
बड़े डिफॉल्टरों के नाम बताने से इनकार
रिपोर्ट के अनुसार आरटीआई आवेदन में उन सभी बड़े कर्जदारों के नाम भी मांगे गए थे जिनके 100 करोड़ रुपये से अधिक के लोन राइट-ऑफ किए गए। लेकिन बैंक ऑफ बड़ौदा ने यह जानकारी देने से इनकार कर दिया। बैंक ने कहा कि यह तीसरे पक्ष से जुड़ी निजी जानकारी है। इसे सार्वजनिक करने से निजता का उल्लंघन होगा। इसलिए सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत यह जानकारी नहीं दी जा सकती है। इसी तरह एनसीएलटी या अन्य मंचों के जरिए समझौता करने वाले कर्जदारों के नाम भी बैंक ने साझा नहीं किए। आरटीआई कार्यकर्ता और सजग नागरिक मंच के अध्यक्ष विवेक वेलणकर ने सवाल उठाया कि छोटे कर्जदारों के नाम तो बैंक अखबारों में प्रकाशित कर देते हैं और उनकी संपत्तियां नीलाम कर देते हैं, लेकिन हजारों करोड़ रुपये के बड़े कर्जदारों की पहचान छिपाई जाती है।
वेलणकर ने कहा कि जिन लोगों को इतने बड़े लोन मंजूर किए गए, जिनकी वसूली नहीं हो सकी, और जिन मामलों में हजारों करोड़ रुपये का हेयरकट स्वीकार किया गया, उन मामलों में बैंक के अधिकारियों और निदेशक मंडल की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
केवल 9946 करोड़ रुपये की ही वसूली
बैंक ने यह भी बताया कि जिन खातों में 35715 करोड़ रुपये का तकनीकी राइट-ऑफ किया गया उनमें से अब तक कुल 9946 करोड़ रुपये की ही वसूली हो सकी है। यानी कुल राइट-ऑफ राशि का क़रीब 28 प्रतिशत ही वापस मिल पाया है।
रिपोर्ट के अनुसार आरटीआई कार्यकर्ता विवेक वेलणकर का कहना है कि यह आँकड़ा इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि इसमें सभी खाते 100 करोड़ रुपये से अधिक के बड़े कर्जदारों से जुड़े हैं।
आरटीआई में यह भी पूछा गया था कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण यानी एनसीएलटी या अन्य मंचों के ज़रिए जिन बड़े कर्जदारों के मामलों का समझौता किया गया, उनमें बैंक ने कितना 'हेयरकट' लिया। बैंक ने व्यक्तिगत खातों की जानकारी तो नहीं दी, लेकिन बताया कि 2020-21 से 2025-26 के बीच कुल 7817 करोड़ रुपये का हेयरकट स्वीकार किया गया। हेयरकट का मतलब है कि बैंक ने कर्ज की पूरी राशि वसूलने के बजाय कम रकम लेकर समझौता कर लिया और बाकी रकम छोड़ दी।
पुराने वर्षों का पूरा डेटा भी नहीं दिया
आरटीआई में इससे पहले के वर्षों की जानकारी भी मांगी गई थी, लेकिन बैंक ने कहा कि मांगी गई पूरी जानकारी उस रूप में उपलब्ध नहीं है। बैंक का कहना है कि इतनी विस्तृत जानकारी तैयार करने में अत्यधिक संसाधन लगेंगे, इसलिए आरटीआई अधिनियम की धारा 7(9) के तहत केवल उपलब्ध आंकड़े ही दिए गए। इस कारण बैंक ने केवल 2020-21 से 2025-26 तक का डेटा उपलब्ध कराया।
क्या है 'टेक्निकल राइट-ऑफ'?
बैंकिंग व्यवस्था में टेक्निकल राइट-ऑफ का मतलब यह नहीं होता कि कर्ज माफ कर दिया गया है। इसका अर्थ केवल इतना है कि बैंक उस राशि को अपनी बैलेंस शीट से हटा देता है ताकि वित्तीय रिकॉर्ड साफ रहे। इसके बाद भी बैंक कानूनी प्रक्रिया, एनसीएलटी या अन्य माध्यमों से उस रकम की वसूली की कोशिश जारी रख सकता है। हालाँकि, आरटीआई से सामने आए आँकड़ों ने एक बार फिर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बड़े कॉरपोरेट कर्ज, उनकी वसूली और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज कर दी है।