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वेतन नहीं मिलने से फूट-फूट कर रो पड़ी बीएसएनएल की महिला कर्मी

बीएसएनएल में आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गयी है कि 1.76 लाख कर्मचारियों को फ़रवरी का वेतन तक नहीं मिला है। कंपनी के 18 साल के इतिहास में पहली बार है कि यह समय पर वेतन देने में असमर्थ है। वेतन नहीं मिलने से कर्मचारियों को घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक महिला वेतन नहीं मिलने की बात कह रोती दिख रही हैं। इनके बारे में कहा जा रहा है कि यह महिला बीएसएनएल की कर्मचारी हैं जो वेतन नहीं मिलने से घर नहीं चला पा रही हैं। ख़ुद को 'नवोदय टाइम्स' अख़बार का रिपोर्टर बताने वाले सूरज सिंह नाम के ट्विटर हैंडल से भी इसे ट्वीट किया गया है।

वीडियो में महिला रोती-बिलखती हुई कहती हैं, 'मैं लेडी हूँ, मुझे कोई पैसा नहीं देगा। ठीक है, माँगूँगी तो भी कोई नहीं देगा। मेरे बच्चे छोटे हैं। सबके बच्चे कमा रहे हैं इसलिए सब चुप बैठे हैं। मैं कहाँ से करूँ, किससे माँगूँ।' महिला आगे कहती हैं कि वह अपना घर नहीं चला पा रही हैं। वह सवाल करती हैं, 'सेंटर में ऑफ़िसरों को तनख्वाह दी गयी, वह क्यों दी गयी? वे कितना काम करते हैं? उनकी सैलरी छोड़ी जाती तो ग्रुप 'सी', 'डी' के लोगों को सैलरी मिल जाती।' बच्चों की फीस से जुड़े एक सवाल के जवाब में महिला कहती हैं कि खाने के पैसे नहीं हैं, फीस कहाँ से जमा करें। 
मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च महीने के वेतन में भी कुछ दिनों की देरी हो सकती है। क़रीब 14 हज़ार करोड़ कर्ज के तले दबे बीएसएनएल की आर्थिक हालत ख़राब है और ऐसी ख़बरें पहले ही आ चुकी हैं कि कंपनी क़रीब 35 हज़ार कर्मचारियों-अफ़सरों को ज़बरन वीआरएस देने को मजबूर है।
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कर्मचारी संघ ने दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि सरकार कंपनी को वेतन देने के लिए फ़ंड जारी करे। इसके साथ ही उन्होंने कंपनी की हालत सुधारने के लिए भी आग्रह किया है। अपनी माँगों को लेकर कंपनी के कर्मचारी धरना-प्रदर्शन भी करते रहे हैं। 

वेतन में क्यों हो रही है देरी?

फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बीएसएनएल के एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि कंपनी ने केरल, जम्मू और कश्मीर, ओडिशा और कॉरपोरेट कार्यालय में कर्मचारियों को फ़रवरी का वेतन देना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार अधिकारी ने कहा कि जब आमदनी होगी तो कर्मचारियों को वेतन का भुगतान किया जाएगा, क्योंकि सरकार ने कोई वित्तीय सहायता नहीं दी है, इसलिए वेतन में देरी हो रही है।

बीएसएनएल के इन स्थायी कर्मचारियों से कहीं ज़्यादा दिक्कत संविदा पर काम करने वाले कर्मियों को है। मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि कुछ सर्कलों में तो उन्हें तीन-तीन महीने का वेतन नहीं मिला है।

अख़बार की रिपोर्ट में सूत्र के हवाले से लिखा गया है कि आर्थिक तंगी से निपटने के लिए बीएसएनएल बोर्ड ने बैंक लोन लेने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है, लेकिन दूरसंचार विभाग ने अभी तक इसे आगे नहीं बढ़ाया है। 

बता दें कि बीएसएनएल का घाटा हर साल बढ़ता जा रहा है। इसने वित्त वर्ष 2018 के लिए लगभग 8,000 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज किया, जबकि वित्त वर्ष 2017 में यह 4,786 करोड़ रुपये था। बीएसएनएल का क़रीब 55 फ़ीसदी पैसा वेतन के भुगतान में जाता है। कंपनी का वेतन बिल हर साल 8 फ़ीसदी बढ़ जाता है। 
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कर्मियों को वीआरएस देने की तैयारी क्यों?

बीएसएनएल क़रीब 35 हज़ार कर्मचारियों-अफ़सरों को ज़बरन वीआरएस देने को मजबूर है। उसने टीए-डीए, मेडिकल अर्न्ड लीव, पीएफ, ग्रेच्युटी, बोनस आदि सब फ़्रीज़ कर दिए हैं। बीती तिमाही में उसने दो हज़ार करोड़ का घाटा दर्ज़ किया है, उसका 15% रेवेन्यू कम हो गया है। इन कर्मचारियों को वीआरएस पर भेजने के लिये बीएसएनएल को क़रीब तेरह हज़ार करोड़ रुपयों की ज़रूरत होगी। दरअसल, रिलांयस जियो के अलावा देश का पूरा टेलीकॉम सेक्टर तबाही के रास्ते पर है। दर्ज़न भर से ज़्यादा प्राइवेट कंपनियों की जगह अब कुल तीन कंपनियाँ बची हैं। सबसे आगे जियो, फिर वोडाफ़ोन, आइडिया और भारती टेलीकॉम (एयरटेल)। इस सेक्टर पर क़रीब आठ लाख करोड़ रुपये की बैंकों की देनदारी है।

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