केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत साल 2026—27 का केंद्रीय बजट बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साल 2014 में जारी घोषणा पत्र की तरह वायदों का पुलिंदा है। बजट में अधिकांश योजनाओं का साल—दो साल में तो अर्थव्यवस्था पर कोई असर दिखता प्रतीत नहीं होता। इसकी वजह दुर्लभ खनिज गलियारे से लेकर नए जलमार्गों के विकास तक लगभग सभी बड़ी परियोजनाओं के लागू होने की अवधि खासी लंबी होना है। इसी तरह रोजगार संवर्धन के दावे वाली पर्यटन सुविधाओं के विस्तार एवं उनके लिए टूरिस्ट गाइड आदि के प्रशिक्षण एवं पैरा मेडिकल सेवाओं के लिए प्रशिक्षण सुविधाओं की स्थापना अथवा विस्तार एवं क्लाउड कंप्यूटिंग नेटवर्क के विस्तार के लिए स्वदेशी डेटा सेंटरों की स्थापना संबंधी घोषणाओं के लागू होने में लंबा समय लगने की आशंका है।
 
बजट की अधिकतर घोषणा अर्थव्यवस्था में दूरगामी परिवर्तनों की नीयत से की गई हैं जिनसे अगले वित्तवर्ष में तो कोई रोजगार बढ़ने अथवा पूंजी निवेश में तेजी आने की संभावना कोई सुर्खरू होती नहीं दिखती। इनमें से ज्यादातर की घोषणा साल 2029 के आम चुनाव के मद्देनजर की गई प्रतीत हो रही है। शायद इसीलिए बजट की प्रमुख घोषणाओं पर जोर देने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी बजट प्रतिक्रिया में देश की पहली महिला वित्तमंत्री द्वारा लगातार नौवें बजट की प्रस्तुति को अपनी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताने पर मजबूर होना पड़ा।
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बजट में राजनीतिक पैंतरेबाजी!

बजट में राजनीतिक पैंतरेबाजी भी भरपूर है। उसमें घोषित महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना दरअसल महात्मा गांधी नरेगा का नाम बदलने के खिलाफ कांग्रेस के देशव्यापी आंदोलन की धार कुंद करने का सरकारी औजार है। हालांकि इसका घोषित उद्देश्य खादी एवं ग्रामोद्योग क्षेत्र का आधुनिकीकरण बताया गया है। इसी तरह तमिलनाडु एवं केरल में दुर्लभ खनिज गलियारे विकसित करने की घोषणा उन राज्यों विधानसभा चुनाव से ऐन पहले की गई है।

प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव क्षेत्र काशी में शिप रिपेयर कारखाने की स्थापना की घोषणा से भी अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट बटोरने में सहायता मिल सकेगी। इसीलिए इस कारखाने का शिलान्यास भी जल्द से जल्द होने का कयास लगाया जा रहा है। बजट भाषण में सरकारी बैंकों के निजीकरण की बू भी आ रही है। यह काम बजट में घोषित सरकारी की बैंकों की उच्चस्तरीय समीक्षा समिति की रिपोर्ट आने के बाद परवान चढ़ सकता है। गौरतलब है कि बैंक कर्मचारी एवं अफसर संघ लेबर कोड की आड़ में दरअसल निजीकरण से सरकार को बाज आने की चेतावनी के तौर पर हड़ताल कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि सरकारी बैंकों के कर्मचारी अपनी रोजी—रोटी के लिए निजी कंपनियों के मोहताज होने की आशंका का विरोध कर रहे हैं। 

बजट में और एक फिरकी वित्तमंत्री ने सरकारी उद्योागों की जमीन के मौद्रीकरण की घोषणा करके फेंकी है। हालांकि इसका सीधा सा अर्थ सार्वजनिक प्रतिष्ठानों की अरबों रूपए की जमीन—जायदाद की बिक्री की तैयारी है।

गौरतलब है कि पिछली सरकारें ऐसी कार्रवाइयों को विनिवेश कहा करती थीं मगर जुमला प्रवीण प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने इन्हें सरकारी संपत्तियों के मौद्रीकरण का जामा पहना कर राजकोषीय घाटा पाटने का औजार बना लिया है।

वित्तमंत्री का भाषण नाउम्मीदी वाला

इस बजट की प्रधानमंत्री कितनी भी तारीफ करें मगर वित्तमंत्री का भाषण निवेशकों से लेकर नौकरी—पेशा लोगों एवं मजदूरों तक किसी भी वर्ग में उम्मीद जगाने में नाकाम रहा है। इसका सबूत शेयर बाजार से लेकर श्रमिक संगठनों की निराशाजनक प्रतिक्रिया से साफ—साफ मिल रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में विनिर्माण गतिविधि बढ़ाने के लिए एक भी नई और ठोस घोषणा बजट में दिखाई नहीं देती। सूक्ष्म से लेकर बड़े उद्योगों तक ज्यादातर क्षेत्रों में व्यापार अथवा उत्पादन संवर्धन संबंधी चालू योजनाओं में ही कतरब्योंत की गई है। बजट में सकल घरेलू उत्पाद याजी जीडीपी और कर्ज का अनुपात 55 प्रतिशत से अधिक बताया गया है। इससे साफ है कि पूंजीगत खर्च के लिए सरकार की मुट्ठी बहुत तंग है इसलिए सार्वजनिक व्यय बढ़ाने के लिए मोदी सरकार को अगले माली साल में और 17 लाख करोड़ रूपए से अधिक कर्जा लेना पड़ेगा। यदि मोदी सरकार सार्वजनिक व्यय बढ़ाने में नाकाम रही तो निजी पूंजी निवेश की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद भी पिछले पांच साल की तरह धूमिल ही रहेगी। हालांकि छह साल पहले कार्पोरेट टैक्स दरों में मोटी कटौती का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उसे देश में निजी पूंजी निवेश को बढ़ावा देने और विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार एवं रोजगार संवर्धन का अचूक उपाय बताया था।
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राजकोषीय घाटा और गिरता रुपया

सीतारमण ने चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 4.4 प्रतिशत और आने वाले वित्त वर्ष 2026—27 में राजाकोषीय घाटे की दर एक प्रतिशत घटकर 4.3 फीसद रहने का अनुमान जताया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में फैली नीतिगत एवं वित्तीय अनिश्चितता के कारण डूबते रुपए और चढ़ते अमेरिकी डॉलर के वर्तमान माहौल में इन घोषणाओं पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं किया जा सकता। अलबत्ता नई निजी आयकर प्रणाली इसी साल एक अप्रैल से पूर्णतया लागू होने की घोषणा का अर्थ पुरानी निजी आयकर प्रणाली का अवसान है। एक अप्रैल के बाद सभी करदाताओं अथवा आय का खुलासा करने वालों को नई निजी आयकर प्रणाली के तहत ही अपना इनकम रिटर्न भरना होगा। निजी आयकर की दरों में कोई कतरब्योत नहीं की गई है। अलबत्ता आप्रवासी भारतीयों को अपनी मातृभूमि में जमीन—जायदाद खरीदने पर करों में छूट देने का वायदा वित्तमंत्री ने किया है। 

हालांकि इसे गिरते रुपए को डॉलर के मुकाबले स्थिरता प्रदान करने के फेर में फूंकी जाने वाली विदेशी मुद्रा की भरपाई का जरिया भी माना जा रहा है। इसके जरिए आप्रवासियों से आने वाली विदेशी मुद्रा से भारत को लगातार गिरती प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की दर के कारण होने वाले विदेशी मुद्रा की कमी को संतुलित करने में भी मदद मिलेगी। इसका दूसरा और देश के मध्य वर्ग के लिए चुनौतीपूर्ण पहलू ये है एनआरआई द्वारा जमीन—जायदाद की खरीद बढ़ने से महानगरों में और उनके आसपास रिहायशी इकाइयों के दामों में और विकट तेजी आएगी जिससे उनके लिए अपने घर के सपने के पूरा होने का इंतजार और लंबा हो जाएगा। गौरतलब है कि 2024 के आम चुनाव के बाद देश में रिहायशी और व्यावसायिक इकाइयों तथा प्लॉट आदि के दाम यूं भी आसमान छू रहे हैं और सरकार हाथ बांधे सटोरियों की मुनाफाखोरी का तमाशा देख रही है।
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वित्तमंत्री के सुधारों का दावा

बजट भाषण में वित्तमंत्री ने दावा किया कि पिछले छह महीने में केंद्र सरकार 350 नियमगत सुधार लागू कर चुकी है जिनसे काम—धंधा और जीवनचर्या दोनों ही सरल हुए हैं। उन्होने बताया कि सेवा एवं वित्तीय क्षेत्र रोजगार बढ़ाने के लिए आधुनिकतम प्रौद्योगिकी अपनाने के प्रोत्साहन पर सरकार खास ध्यान दे रही है। उन्होंने जिलों की तर्ज पर शहरों में भी विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र बनाने, पुराने औद्योगिक क्षेत्रों का कायाकल्प करने, बायोफार्मा को बढ़ावा देने, आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज प्रोत्साहित करने के लिए उसकी जड़ी—बूटियां उगाने से लेकर दवाओं की उच्चस्तरीय जाचं एवं प्रमाणन सुविधाएं स्थापित करने तथा प्रशिक्षणशालाओं की स्थापना का भी एलान किया। उनके अनुसार इसके लिए पांच साल में इस मद में 10,000 करोड़ रुपए और सेमीकंडक्टर मिशन के लिए 45,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
केरल, तमिलनाडु एवं ओडिशा में केंद्र सरकार दुर्लभ खनिजों के खनन के लिए तीन गलियारे विकसित करेगी। इसके अलावा तीन कैमिकल पार्क बनाने, दो सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के अंतर्गत हाई टेक टूल रूम स्थापित करके पूंजीगत उत्पादों यानी सुरंग खोदने की मशीन, यात्री एवं माल ढोने वाली लिफ्टों आदि के स्वदेशी उत्पादन की तैयारी के लिए पांच साल में 10,000 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। रेशम, सूत एवं उन के रेशों का उत्पादन बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय रेशा योजना तथा विशाल कपड़ा उत्पादन एवं सिलाई सेंटरों की स्थापना के साथ ही खादी, हथकरधा एवं ग्रामोद्योगों का उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता तथा डिजाइन सुधारने के लिए महात्मा गांधी ग्राम स्वराज योजना का भी एलान बजट में किया गया है।

इसी तरह खेल उपकरणों, सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों के संवर्धन, पांच लाख आबादी वाले शहरों में बुनियादी ढांचा सुधार, निजी डेवलपरों के लिए भरोसा कोष बनाने सहित अलग—अलग वित्तीय घोषणा बजट में हैं। बजट के अनुसार 28 नए जलमार्ग विकसित किए जाएंगे। इनमें चलने वाले यात्री एवं मालवाहक जहाजों को चलाने एवं उनकी मरम्मत के प्रशिक्षण के लिए संस्थान पटना एवं काशी में बनाए जाएंगे। तेज गति की रेलगाड़ियां चलाने को सात गलियारे बनाने एवं केमिकल, तेल रिफाइनरी, बिजली उत्पादन संयंत्रों तथा इस्पात कारखानों में कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकी लागू करने संबंधी बजट प्रावधान भी किए गए हैं। इस प्रकार अर्थव्यवस्था के लगभग हरेक क्षेत्र के लिए इस बजट में कोई न कोई घोषणा एवं बजट राशि का प्रावधान है मगर उनका परिणाम दिखने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।