राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ ने जब दूसरी तिमाही के जीडीपी आंकड़े जारी किए, तो भारत के विकास की तारीफ़ हुई। 8.2 प्रतिशत की विकास दर यह पिछले छह तिमाहियों का उच्चतम स्तर है! लेकिन खुशी के इस दौर में एक सवाल उठा है। विपक्ष पूछ रहा है कि क्या ये आँकड़े वाकई सच्चे हैं, या सरकार ने इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है?

कांग्रेस ने कहा है कि यह भी अजीब संयोग है कि तिमाही जीडीपी के आँकड़े ठीक उसी समय जारी किए गए हैं, जब आईएमएफ की वार्षिक रिपोर्ट में भारत के नेशनल अकाउंट्स के आंकड़ों को C ग्रेड दिया गया -जो कि दूसरा सबसे कम मूल्यांकन है। जयराम रमेश ने कहा, 'आंकड़े निराशाजनक बने हुए हैं। Gross Fixed Capital Formation में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं दिख रही है। निजी निवेश में नई गति आए बिना उच्च जीडीपी वृद्धि दर लंबे समय तक टिक नहीं सकती -और ऐसी किसी सुधार के कोई सबूत दिखाई नहीं देते। अवास्तविक रूप से बहुत कम जीडीपी डिफ्लेक्टर- जो यह दिखाता है कि महँगाई दर सिर्फ 0.5% है -जबकि सच्चाई बिल्कुल उलट है। करोड़ों परिवार अपने रोजमर्रा खपत होने वाले वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं, और उनके अनुभवों से यह आँकड़ा ज़रा भी मेल नहीं खाता।'
पी चिंदबरम ने भी सवाल किया है कि सरकार को यह बताना होगा कि आईएमएफ़ ने भारत के नेशनल अकाउंट्स स्टैटिस्टिक्स के अपने सालाना रिव्यू में डेटा को ग्रेड 'C' क्यों दिया, जो दूसरा सबसे कम ग्रेड है।

आईएमएफ़ की रिपोर्ट ने बहुत साफ़-साफ बताया है कि भारत के नेशनल अकाउंट्स को क्यों सिर्फ 'C' ग्रेड मिला है-

पुराना बेस ईयर (2011-12) 

आज की अर्थव्यवस्था बिल्कुल बदल गई है, लेकिन हम अभी भी 13-14 साल पुराने हिसाब से जीडीपी निकाल रहे हैं। ये ऐसा है जैसे पुराने नक्शे से नई सड़कें ढूँढना। इसको लेकर विपक्ष सहित दुनिया भर में सवाल उठते रहे हैं।
ताज़ा ख़बरें

कम डिफ्लेटर का इस्तेमाल

जीडीपी को नॉमिनल यानी वर्तमान मूल्य से रीयल यानी स्थिर मूल्य में बदलने के लिए डिफ्लेटर यानी मुद्रास्फीति दर लगाया जाता है। आलोचकों का कहना है कि सरकार सीपीआई यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 4-4.5% के बजाय WPI यानी थोक मूल्य सूचकांक 0.3% पर अधिक निर्भर करती है, जिससे डिफ्लेटर बहुत कम 0.9-1.9% हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि रीयल वृद्धि अधिक दिखती है। मिसाल के तौर पर अप्रैल-जून 2025 में नॉमिनल जीडीपी वृद्धि 9.7% थी। सरकारी डिफ्लेटर 1.9% लगाने पर रीयल वृद्धि 7.8% बनती लेकिन वास्तविक मुद्रास्फीति 4.5% लगाएँ तो यह वृद्धि सिर्फ 5.2% रह जाती।

उत्पादन और खर्च के आँकड़ों में फर्क

एक तरफ कहते हैं कि इतना माल बना, दूसरी तरफ कहते हैं कि उतना खर्च ही नहीं हुआ। बीच का बहुत बड़ा हिस्सा, खासकर अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर गायब रह जाता है।
अर्थतंत्र से और ख़बरें

मौसम के हिसाब से एडजस्टेड आँकड़े नहीं!

हर तिमाही में त्योहार, बारिश वगैरह का असर अलग होता है, लेकिन हमारे आँकड़े उसको साफ करके नहीं दिखाते। इसलिए एक तिमाही से दूसरी तिमाही की सही तुलना करना मुश्किल हो जाता है।

ये चार बड़ी कमियाँ हैं, जिसकी वजह से दुनिया हमारे जीडीपी आँकड़ों पर सवाल उठाती है।

सरकार ने क्या कहा?

केंद्र सरकार ने दूसरी तिमाही की जीडीपी के इन आँकड़ों पर अपनी पीठ थपथपाई है। आँकड़े आते ही प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि यह सुधारों का नतीजा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे सुधारों और राजकोषीय अनुशासन का फल बताया है, जबकि मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि भारत अब 7 प्रतिशत से ऊपर की विकास दर की ओर अग्रसर है।
सर्वाधिक पढ़ी गयी ख़बरें
सरकार कुछ भी कहे, विपक्ष ने आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं। ये सवाल पिछले कुछ वर्षों से उठते रहे हैं- जैसे 2019-20 में जीडीपी गणना पद्धति पर विवाद। आलोचकों का तर्क है कि नॉमिनल जीडीपी और रीयल जीडीपी के बीच का फर्क असामान्य लगता है।

ये आँकड़े कितने भरोसेमंद हैं?

ये आँकड़े पूरी तरह ग़लत नहीं हैं। भारत की अर्थव्यवस्था में वास्तविक तेजी है और आईएमएफ़ 2025-26 के लिए 6.6% वृद्धि का अनुमान लगाता है। लेकिन कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन, विदेशी निवेश का बाहर जाना जैसे कई सवाल हैं। और ये सवाल तो वैध हैं ही कि कम डिफ्लेटर और पुरानी विधियां वृद्धि को 1-2.5% बढ़ा सकती हैं।