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कोरोना से कच्चे तेल की कीमतें गिरीं, भारत के लिए है सुनहरा मौका

पहले से चल रही आर्थिक सुस्ती और उसके बाद कोरोना संक्रमण की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में आई अभूतपूर्व कमी भारत के लिए ज़बरदस्त मौका ले कर आई है। भारत इसका फ़ायदा उठा कर अरबों रुपये बचा सकता है, बचे पैसे से भारत में खपत और माँग निकल सकती है और तेज़ी से फिसल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को एक सहारा मिल सकता है।
अमेरिकी के न्यूयॉर्क एक्सचेंज में कच्चे तेल की कीमत 30 प्रतिशत गिर कर 32 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। इसके बाद स्थिति थोड़ी सुधरी और 11 मार्च को यह 35.95 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई। 
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क्या है मामला?

इसकी वजह यह है कि कोरोना वायरस संक्रमण के कारण  कच्चे तेल की माँग में कमी आने के बाद तेल निर्यातक देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ (ओपेक) ने तेल उत्पादन में कटौती का प्रस्ताव रखा। 
ओपेक ने तेल उत्पादन में रोज़ाना 15 लाख बैरल प्रति दिन की कटौती का प्रस्ताव रखा ताकि तेल की कीमतों के गिरने पर रोक लगे। रूस ने इसे नहीं माना  और उसने उत्पादन में कटौती से इनकार कर दिया। इससे झल्लाए सऊदी अरब ने अप्रैल महीने में उत्पादन बढ़ाने और कीमत कम करने का एलान कर दिया।  इसके बाद ही तेल की कीमतें बेतहाशा गिरीं। 

क्या कहना है विशेषज्ञों का?

मॉर्गन स्टेनली ने अपने अध्ययन में कहा है कि तेल की कीमतें अभी और गिरेंगी। एक दूसरी कंपनी बार्कलेज़ ने कहा है कि कच्चे तेल की कीमतें 43 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही रहेंगी। स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने इसके 35 डॉलर के आसपास रहने का अनुमान लगाया है। केअर रेटिंग्स का अनुमान तेल की कीमतों के 40-45 डॉलर प्रति बैरल तक ही रहने का कयास लगाया है। यानी तेल की कीमतें 40 डॉलर प्रति बैरल के आसापास ही मंडराती रहेंगी, जबकि फरवरी के अंत में यह 59 डॉलर पर थी। 

भारत के लिए सुनहरा मौका

यह भारत के लिए बहुत बड़ा मौका है। भारत अपनी ज़रूरतों का 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। भारत ने 2018-19 के दौरान तेल आयात पर 111.90 अरब डॉलर खर्च किया। इसके एक साल पहले भारत को तेल खरीद पर 87.80 अरब डॉलर खर्च करना पड़ना था। 
एक मोटे अनुमान के मुताबिक़, यदि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 1 डॉलर प्रति बैरल गिरती है तो भारत का 1.50 अरब डॉलर बचता है। इस हिसाब से भारत को साल भर में लगभग 30 अरब डॉलर कम भुगतान करना होगा।
यह बहुत बड़ी रकम है, ख़ास कर तब जब देश की अर्थव्यवस्था बदहाली में हो, निर्यात कम हो रहा हो, विदेशी निवेश घट रहा हो। यदि तेल कंपनियाँ इस पैसे का एक छोटा हिस्सा भी आम जनता के साथ साझा करती है, यानी पेट्रोल, डीज़ल जैसे उत्पादों की कीमतों में कमी करती है तो उसका बड़ा असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। 
आम उपभोक्ताओं के पास पैसे होंगे तो वह उसका इस्तेमाल दूसरी चीजें खरीदने में कर सकता है। इससे खपत बढ़ सकती है और माँग निकल सकती है। पूरी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी, यह धीरे-धीरे चल पड़ेगी।

आपकी जेब में कितना आएगा?

लेकिन इसमें एक बड़ा पेच यह है कि सरकार कितने पैसे जनता तक पहुँचने देगी और कितने पैसे ख़ुद रख लेगी। पेट्रोलियम उत्पाद अभी भी जीएसटी में शामिल नहीं है। यह वैल्यू एडेड टैक्स यानी वैट के तहत आता है। तमाम राज्य सरकारें अपने हिसाब से वैट लगाती हैं, नतीजा यह होता है कि कम कीमत का लाभ उपभोक्ता तक पहुँच नहीं पाता है। 
सरकार तेल कीमतों के गिरने से होने वाले फ़ायदे का बड़ा हिस्सा ख़ुद रख लेगी। एक उदाहरण लेते हैं। दिल्ली में 1 मार्च को डीलरों तक पहुँचे पेट्रोल की कीमत 32.93 रुपए प्रति लीटर थी। उपभोक्ताओं को यह 71.71 रुपए में मिला था।
इसमें केंद्र सरकार को जाने वाला उत्पादन कर यानी एक्साइज़ ड्यूटी 19.98, डीलर का कमीशन 3.55 रुपए, दिल्ली सरकार का वैट 15.25 रुपए भी शामिल है। 
एक्साइज़ ड्यूटी तय है। पर वैट हर राज्य में अलग-अलग लगता है, क्योंकि वह राज्य सरकार तय करती है। कर्नाटक में 32 प्रतिशत तो महाराष्ट्र में 26 प्रतिशत है। 
यह मुमकिन है कि राज्य सरकारें इस स्थिति का फ़ायदा उठा कर वैट की दर बढ़ा दें। ऐसा हुआ तो राज्य सरकारों की कमाई भले बढ़ जाएं, पर उपभोक्ताओं तक अतिरिक्त पैसा नहीं पहुँचने की वजह से दूसरे सेक्टरों में माँग और खपत नहीं बढेंगी। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को उतना फ़ायदा नहीं होगा, जितना अनुमान लगाय जाता है। पर इसके बावजूद भारत को एक स्वर्णिम मौका तो मिल ही रहा है। 

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