जिस दिन डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत लगातार तीसरे दिन बढ़ी और दस दिनों के अंदर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में चौथी बार इजाफा हुआ उस दिन पेट्रोल डीजल की चर्चा छोड़कर डॉलर रुपये की बात करना इसलिए भी ज्यादा जरूरी लगता है कि यह मोदी सरकार का सर्वाधिक उपेक्षित प्रबंधन का विषय रहा है। कहना न होगा कि कांग्रेस और यूपीए सरकार की हर कमजोरी को निशाना बनाने वाले नरेंद्र मोदी और उनकी टोली ने डॉलर की गिरावट को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था।
अगर मोदी जी और उनके शिष्य या उस्ताद बाबा रामदेव मोदी राज में डॉलर की औकात बताने वाला रेट लाने की बात करते थे तो अरुण जेटली जैसे लोग रुपये की गिरावट को मुल्क की इज्जत की गिरावट से जोड़ रहे थे। अब यह हिसाब लगाने की भी चीज नहीं रह गया कि तब डॉलर का रेट क्या था और अब क्या है। और डॉलर या बड़ी मुद्राओं के मुकाबले रुपये की गिरावट को निर्यात के लिए लाभकर बताने वाले भी अब स्वीकार करने लगे हैं कि आज की स्थिति नुकसानदेह हो गई है। और तो और रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मलहोत्रा ने भी एक आर्थिक अखबार को दिए इंटरव्यू में स्वीकार किया है कि रुपया ‘ओवरवैल्यू’ नहीं ‘अंडरवैल्यू’ है।
RBI गवर्नर से लेकर वित्त मंत्री तक की सफाई
रिजर्व बैंक गवर्नर के इस इंटरव्यू के अगले दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी एक आयोजन में कहा कि तीन ‘एफ’- हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं जिनमें फ़ोरेन करेंसी भी एक है। इन दोनों शीर्षस्थ लोगों के इन बयानों के संग संग रिजर्व बैंक और सरकार द्वारा ऐसे प्रयासों की झलक भी मुद्रा बाजार में दिखी जिससे रुपया कुछ स्थिर हो या चढ़े। जिन तीन दिनों के सुधार की चर्चा ऊपर है वे भी तेल के आयात बजट को कम करते हैं। लेकिन इस सरकारी कवायद में कितना कुछ गंभीर है और कितना तात्कालिक, यह कहना मुश्किल है। बल्कि जब भरभराकर गिरेगा। ऐसा बाजार के कथित तकनीकी विशेषज्ञों का हिसाब रहता है जो शेयर बाजार के मामले में ज्यादा लागू होता है। पर जाहिर तौर पर शेयर हों या मुद्रा वे तकनीकी आधार पर नहीं चलते। वे तो आर्थिक कामकाज और उनकी सफलता विफलता के साथ सरकारी फैसलों, प्राकृतिक कारणों से लेकर बाजार की मांग समेत ठोस आर्थिक कारणों से चलते हैं।शेयर बाजार को सिर्फ प्रबंधन का मामला बनाने का प्रयास
हमारी मुश्किल यह है कि हमने रुपये और उससे भी ज्यादा शेयर बाजार को सिर्फ प्रबंधन का मामला बनाने का प्रयास किया है। अधिकांश निवेश साझा कोषों के माध्यम से होने लगा है और उसका धन तरह-तरह से इकट्ठा किया जा रहा है जिसमें बाजार में निवेश और घर बैठे मोटी कमाई के लालच का हिस्सा काफी बड़ा होगा। लेकिन जब वेतन और प्रोविडेन्ट फंड से साझा कोषों को जोड़ा जाए और बाजार की हर गिरावट पर इन साझा कोषों को कठपुतलियों की तरह संचालित करके एक नकली उभार या उफान दिखाया जाए तो यह खेल एक सीमा तक ही चल सकता है।
उदारीकरण की शुरुआत से यह खेल शुरू हुआ है लेकिन अब तो बाजार कुछ अदृश्य ‘तेजड़ियों’ की पूरी गिरफ्त में आ गया है। और यह हमारे निवेशकों और साझा कोष के प्रबंधकों को चाहे जिस वजह से समझ न आये लेकिन बाजार जानने वाला हर आदमी जानता है कि हमारे अधिकांश शेयर अपने वास्तविक मूल्य से काफी ऊपर चल रहे हैं। इस एहसास के साथ पिछले साल डेढ़ साल में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अपनी पूंजी निकाली है।
डॉलर की मांग बढ़ने और रुपये के मुकाबले चढ़ने की एक बड़ी वजह विदेशी पूंजी को निकालना भी है। सब कुछ जानकर भी इस पूंजी पलायन को थामने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। उसकी जगह साझा कोषों के माध्यम से देसी पूंजी भरी गई है।
डॉलर की मांग सिर्फ विदेशी संस्थागत निवेशकों के हाथ खींचने से ही नहीं बढ़ी है। यह विदेश व्यापार के असंतुलन और चालू खाते के घाटे से भी जुड़ा मामला है। हमारी कंपनियों ने विदेशों में निवेश किया है जो सामान्य ढंग से अच्छी बात है, लेकिन खास परिस्थिति में चिंता की भी बात है। हमारे बच्चे कम संख्या में विदेश पढ़ने जा रहे हैं, लोगों की विदेश यात्राओं पर खर्च कम हुआ है। इनसे राहत मिलनी चाहिए थी और मिली भी होगी, पर गिरावट का बढ़ना ज्यादा चिंता की बात है। अगर हमारी मुद्रा साल भर में ग्यारह फीसदी तक गिरी है तो इसे सिर्फ खाड़ी युद्ध का असर बताना बहानेबाजी है। इसी दौर में दुनिया के कई देशों की मुद्राएं मजबूत हुई हैं तो कई की गिरावट हमसे बहुत कम रही है। वियतनाम, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों की मुद्राओं में सुधार हुआ है। यह निश्चित है कि खाड़ी युद्ध ने तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी करके हमारे विदेश व्यापार के घाटे का बोझ बढ़ा दिया है लेकिन यह भी सच है कि इस अवधि में हमें वैसा संकट नहीं झेलना पड़ा जैसा काफी सारे देशों में देखने में आया है।
पर तेल का खेल हमारी सरकार जिस तरह खेलती रही है वह सामान्य तर्क से परे है। हम रूसी तेल छोड़कर वेनेजुएला से तेल लें और वह भी ज्यादा गंदगी वाला, ज्यादा ढुलाई खर्च वाला, यह किसे समझ आएगा। और रूस से तेल लेने न लेने का फैसला अचानक ट्रम्प क्यों करने लगे हैं और हम उसे मानने लगे हैं, यह समझना और मुश्किल है। चुनाव हो तो तेल की कीमत न बढाई जाएं और चुनाव बीतते ही कीमतें धारावाहिक हिसाब से बढ़ें, यह बात भी हैरान करती है।
पेट्रोलियम जीएसटी के दायरे में क्यों नहीं?
जीएसटी को आये दसेक साल हो गए, जाने कितने रिवीजन हो गए लेकिन पेट्रोलियम को उसके दायरे में कब लाया जाएगा, अभी भी अस्पष्ट है। और तब तक सरकार कई तरह के करों के सहारे हर साल लाखों करोड़ रुपये अतिरिक्त वसूलती जा रही है। ग्यारह बारह वर्षों में चालीस लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त वसूली का अनुमान है। और अब प्रधानमंत्री आर्थिक तरक्की की शान की जगह आर्थिक मुश्किलों का रोना क्यों रोने लगे हैं। यह कीमतें बढ़ाने के बहाने के तौर पर देखा जा रहा है। सो बारह साल में अगर डॉलर की तेजी थामने और रुपये को सम्मानजनक स्थान पर ले जाने का कोई एक भी गंभीर प्रयास नहीं हुआ है तो अभी भी वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर की बातचीत में गंभीरता नहीं दिखती। सारा नज़रिया झाड़-फूँक वाला है, हर स्थिति का राजनैतिक लाभ लेने वाला है। ऐसे में यह बीमारी ठीक नहीं हो सकती।