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एलटीसी नकद वाउचर स्कीम और त्योहारी एडवांस से बदहाल अर्थव्यवस्था को कितना सहारा?

बदहाल भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार माँग और खपत बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसके तहत दो महत्वपूर्ण फ़ैसले किए गए हैं- लीव ट्रैवल कनसेशन के तहत केंद्रीय कर्मचारियों को नकद वाउचर दिए जाएंगे और त्योहार के पहले नकद एडवांस दिया जाएगा।

क्या है एलटीसी नकद वाउचर स्कीम?

एलटीसी नकद वाउचर स्कीम के तहत केंद्रीय कर्मचारी छुट्टियों के बदले उस अवधि के पैसे ले सकेंगे। इसके अलावा वे टिकट के मूल्य की तीन गुणी रकम का कोई सामान खरीद सकेंगे, जिस पर कम से कम 12 प्रतिशत का जीएसटी लगता हो। 
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस स्कीम का एलान करते हुए यह भी कहा कि इस पैसे से खाने-पीने की चीजें नहीं खरीदी जा सकती हैं, यह खरीद जीएसटी रजिस्टर्ड दुकानों से ही की जा सकती है और इसका भुगतान डिजिटल तरीके से ही किया जा सकता है। 
सरकार ने ये पैसे कर्मचारियों को देने का एलान इसलिए किया है कि कोरोना की वजह से लॉकडाउन लगा दिया गया और उस दौरान यात्रा मुमकिन नहीं थी। यह स्कीम 31 मार्च 2021 तक ही है। 
वित्त मंत्री ने कहा कि इस स्कीम पर सरकार को 5,675 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। सरकार ने बैंक जैसे सरकारी उपक्रमों को भी यह स्कीम लागू करने की छूट दी है। 

त्योहार के पहले एडवांस

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि त्योहार के मौके पर कर्मचारियों को विशेष एडवांस दिया जा सकता है। पहले इस तरह का एडवांस दिया जाता था, लेकिन सातवें वेतन आयोग में इसे बंद कर दिया गया था। यह स्कीम भी 31 मार्च 2021 तक ही है। 

इस स्कीम के तहत सरकार हर केंद्रीय कर्मचारी को बग़ैर ब्याज 10 हज़ार रुपए तक का एडवांस दे सकती है। इसे 10 आसान किस्तों में चुकाना होगा। इस पर सरकार को 4 हज़ार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। 
सरकार का मानना है कि इन दोनों स्कीमों से लोग सामान खरीदने के लिए उत्साहित होंगे। इससे खपत व मांग निकलेंगी, जिससे उद्योग को बल मिलेगा।
इसके पहले जब सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज का एलान किया था तो उसकी यह कह कर आलोचना हुई थी कि इससे मांग व खपत नहीं पैदा होंगी। बग़ैर मांग-खपत के अर्थव्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। 
लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसी अर्थव्यवस्था जो कुछ दिन पहले ही शून्य से 24 प्रतिशत नीचे चली गई हो, उसके लिए इतनी छोटी रकम का क्या महत्व है। इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था में कुछेक हज़ार करोड़ रुपए डालने से कितनी मांग निकलेगी और वह उद्योग को कितना आगे बढ़ाएगी, सवाल यह है। 

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