IMF की अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ और आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा
21 अप्रैल 2026। मुंबई स्थित भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मुख्यालय में एक ऐसी मुलाक़ात हुई, जिसने देश के नीतिगत गलियारों में हलचल पैदा कर दी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री और वर्तमान प्रथम उप प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा से भेंट की। गोपीनाथ ने सोशल मीडिया पर इस मुलाक़ात को शिष्ट और 'राजनयिक' बताया, लेकिन उनके शब्दों—"ईरान संघर्ष ने केंद्रीय बैंकरों के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर दी हैं"—के पीछे एक गहरा आर्थिक अर्थ छिपा है। यह मुलाक़ात महज़ शिष्टाचार नहीं, बल्कि उस 'अलार्म' की तरह है जिसे भारतीय नीति-निर्माता पिछले एक दशक से अनसुना कर रहे हैं।
वह वायरल सवाल: जब गीता ने दिखाया आईना
जनवरी 2026 के दावोस (WEF) सम्मेलन में जब केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव भारत को 2028 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का दावा कर रहे थे, तब गीता गोपीनाथ ने जो सवाल पूछे, उन्होंने विकास की चमक-धमक वाली कहानी की कलई खोल दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत की वृद्धि 'पूंजी-गहन' (Capital Intensive) है, न कि 'श्रम-गहन' (Labor Intensive)। सरल शब्दों में, पैसा तो बढ़ रहा है, लेकिन हाथ खाली हैं। उन्होंने '3-J' की चुनौती पेश की: जमीन (Land reforms), जेहन (Labour/Human Capital) और जस्टिस (Judicial reforms)। जब तक भूमि अधिग्रहण सरल नहीं होगा, श्रम सुधारों से रोजगार नहीं बढ़ेगा और न्यायपालिका अनुबंधों को लागू करने में तेजी नहीं लाएगी, तब तक 'विकसित भारत' का स्वप्न अधूरा ही रहेगा।
प्रति व्यक्ति आय: पड़ोसियों से पिछड़ता भारत
किसी भी देश की असली संपन्नता उसकी जीडीपी के कुल आकार से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की औसत आय (Per Capita Income) से मापी जाती है। यहाँ आंकड़े विचलित करने वाले हैं। 2014 में भारत की प्रति व्यक्ति आय $1,540 थी, जो 2026 में लगभग $2,800 के स्तर पर है। एक दशक में मात्र $1,300 की बढ़त! तुलनात्मक रूप से देखें तो 1990 में भारत बांग्लादेश से 50% आगे था, लेकिन 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि बांग्लादेश ($3,100) नॉमिनल टर्म्स में हमसे आगे निकल चुका है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश हमसे कहीं बेहतर स्थिति में हैं। यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था की तस्वीर है जो अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने में हांफ रही है।
कर्ज का बोझ और व्यापार घाटे की खाई
पिछले 10 वर्षों में भारत का विदेशी ऋण (External Debt) $457 अरब से बढ़कर $736 अरब के पार पहुंच गया है। हालाँकि जीडीपी के अनुपात में यह नियंत्रण में दिखता है, लेकिन निरपेक्ष रूप से 61% की वृद्धि चिंताजनक है। इससे भी बड़ी समस्या व्यापार घाटे (Trade Deficit) की है। 2014-15 में जो घाटा ₹8 लाख करोड़ था, वह 2024-25 में बढ़कर ₹24 लाख करोड़ हो गया है।
हम निर्यात तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन हमारी आयात पर निर्भरता उससे तीन गुना तेजी से बढ़ रही है। यह 'आत्मनिर्भर भारत' के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
नौकरियों का अकाल: 1900 लोगों के लिए 63,000 पद!
बेरोजगारी आज देश की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुकी है। रेलवे के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है—63,000 चतुर्थ श्रेणी पदों के लिए 1.9 करोड़ युवाओं का आवेदन करना यह बताता है कि डिग्री हाथ में लिए युवा कितने हताश हैं। 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026' की रिपोर्ट के अनुसार, 15-25 वर्ष के 40% स्नातक बेरोजगार हैं। विडंबना देखिए, एक तरफ निजी क्षेत्र में छंटनी है, तो दूसरी तरफ सार्वजनिक उपक्रमों (CPSEs) में नौकरियों की संख्या 2013-14 के 13.5 लाख से घटकर मात्र 7.8 लाख रह गई है। विदेश मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों में 32% पद खाली पड़े हैं, जो हमारी कूटनीतिक क्षमता को भी प्रभावित कर रहे हैं।
बैंक विलय और 'महिला बैंक' की विदाई
सरकार ने बैंकों की कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर 27 सार्वजनिक बैंकों को घटाकर 12 कर दिया। इस प्रक्रिया में 'भारतीय महिला बैंक' जैसे विशिष्ट संस्थानों का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया, जो महिला सशक्तिकरण के दावों के विपरीत था। विलय के बाद न केवल एनपीए (NPA) की समस्या जटिल हुई, बल्कि बैंकिंग क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी सिकुड़ गए।
शिक्षा और स्वास्थ्य: भविष्य के साथ समझौता?
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, शिक्षा पर खर्च जीडीपी के 2.9% से घटकर 2.7% रह गया है। स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी ऐसा ही है। जहाँ चीन और अमेरिका अपनी जीडीपी का बड़ा हिस्सा मानव संसाधन पर खर्च कर रहे हैं, भारत वहां कटौती कर रहा है। इसके साथ ही, अमीर भारतीयों (HNIs) का देश छोड़कर जाना और लाखों लोगों द्वारा नागरिकता त्यागना यह संकेत देता है कि देश का 'ब्रेन' और 'ड्रेन' दोनों बाहर की ओर प्रवाहित हो रहे हैं।
डेटा की विश्वसनीयता और 'C' ग्रेड का कलंक
सबसे गंभीर प्रहार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का भारत के आँकड़ों पर से भरोसा उठना है। IMF ने भारत के राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (GDP डेटा) को 'C' ग्रेड दिया है, जिसका अर्थ है कि डेटा में ऐसी कमियां हैं जो सही आर्थिक निगरानी में बाधा डालती हैं। जब तक सरकार डेटा की पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं करेगी, तब तक विदेशी निवेश (FDI) में वह छलांग नहीं लग पाएगी जिसकी तुलना चीन से की जा सके।
क्या अब भी सुधरेंगे हम?
गीता गोपीनाथ की आरबीआई गवर्नर से मुलाकात महज़ चर्चा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। रुपया प्रबंधन, ब्याज दरों का जोखिम और बुनियादी सुधारों की सुस्ती—ये वो मोर्चे हैं जहाँ सरकार विफल रही है। प्रधानमंत्री ने 'सुधार यात्रा' की बात तो की, लेकिन धरातल पर वह यात्रा 'इवेंट मैनेजमेंट' की भेंट चढ़ गई।
लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को आज गीता गोपीनाथ की उन कड़वी सलाहों की जरूरत है जिन्हें 'राष्ट्रवाद' के शोर में दबा दिया गया था। यदि अब भी जमीन, जेहन और जस्टिस के बुनियादी सुधारों पर काम नहीं हुआ, तो 'तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था' का टैग सिर्फ एक सांख्यिकीय भ्रम बनकर रह जाएगा, जिसमें जनता की थाली खाली और हाथ बेरोजगार रहेंगे। और खाड़ी का संकट थोड़ा भी खिंचा तो सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी। गीता गोपीनाथ की सलाह कड़वी थी और होगी भी, सच की दवा नीम सी कड़वी ही होती है। यस सर कहने वाले अपने युद्ध मंत्री के (लेट्स डू इट सर) जैसे मीठे ठकुरसुहाती बोल पर तो प्रेसिडेंट ट्रंप भी केवल पछता ही रहे हैं। नो कहने वाले सलाहकार जहां भी नहीं होते हैं, बड़े बड़े साम्राज्य इतिहास में दफ़न हो जाते हैं। गीता का ज्ञान गोपीनाथ के लिए न सही, देश के लिए जरूरी है। वरना आंकड़ों की पीड़ा अपने आप भेद खोल देगी।