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'मोदी के डाक टिकट के बराबर आर्थिक ज्ञान का असर तो दिखना ही था'

रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कटौती ऐसे समय की है, जब आर्थिक मोर्चे पर देश की हालत ख़राब है। सरकार के दावे जो भी हों, सच यह है कि रोज़गार के मौके नहीं बन रहे हैं, असंगठित क्षेत्र का हाल बुरा है, विकास की दर धीमी है। ऐसे में यह उम्मीद की जा सकती है कि ब्याज दरो में कटौती से अर्थव्यवस्था को थोड़ा बल मिलेगा। पर व्यावहारिक तौर पर ऐसा करना बहुत मुश्किल है। आर्थिक स्थिति पर सरकार का बचाव करने वाले शख़्स काबिल वकील तो हैं ही आजकल ब्लॉग लिखने के भी अनुभवी हो गए हैं। इसलिए, इस मोर्चे पर काम कम, बातें ज़्यादा हो रही हैं। यह विडंबना ही है कि देश के दूसरे सबसे बड़े राजनीतिक दल के पास कोई राजनीतिक अर्थशास्त्री नहीं है। 
पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पिछले लोकसभा चुनाव से पहले कहा था कि नरेंद्र मोदी का आर्थिक ज्ञान डाक टिकट के पीछे लिखने भर का है। दूसरी ओर, नोटबंदी जैसे फ़ैसले के बाद यह स्पष्ट हो चला है कि अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से प्रधानमंत्री ही चला रहे हैं। वित्त मंत्री के रूप में क़ानून के जानकार अरुण जेटली अपनी चाहे जितनी सेवा दे पाएँ हो लेकिन ज़्यादातर समय वह बीमार ही रहे। 

विकल्प में मिले चार्टर्ड अकाउंटेंट 

जेटली के विकल्प के रूप में हमारे पास चार्टर्ड अकाउंटेंट मंत्री हैं। मतलब राजनीतिक कम चार्टर्ड अकाउंटेंट ज़्यादा। वह भी ऐसे जो पार्टी के कोषाध्यक्ष थे। अभी भले ही वह कोषाध्यक्ष नहीं हैं लेकिन पार्टी का कोई दूसरा कोषाध्यक्ष भी नहीं है। ऐसे राजनेता को 9 दिन पहले बजट पेश करने का ज़िम्मा मिले तो बजट में क्या होना था? और जो है वह क्यों है? इस पर क्या चर्चा की जाए। कहा जा सकता है कि सरकार अपने ही बनाए जाल में फंस गई है। 

अनुभवी आर्थिक जानकार न होने के कारण योजनाबद्ध ढंग से काम नहीं हो रहा है। तात्कालिक लाभ वाले उपायों का सरकार ना तो लाभ समझा पा रही है ना ही उससे हुए नुक़सान को स्वीकार करने से बच पा रही है। ऐसे में वह आर्थिक तौर पर बहुत ही निरीह दिखाई दे रही है।

योजना बनाकर नहीं उठाया क़दम 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि नोटबंदी एक अच्छा क़दम था। सरकार उसका सही लाभ नहीं उठा पाई। सरकार उससे हुए नुक़सान को स्वीकार तो कर रही है पर लाभ को जोर-शोर से नहीं बता रही है। जनता कहीं नाराज़ होकर समर्थन करना ना छोड़ दे इसलिए 5 लाख तक की आय पर छूट जैसे महँगे उपाय कर रही है। 

कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह क़दम भी योजना बना कर नहीं उठाया गया और आंकड़े हैं ही नहीं तो यह भी नहीं पता है कि यह छूट कितने का असर डालेगी। लाभ अगर होगा भी तो चुनावी ही होगा। इसके लिए आवश्यक आर्थिक व्यवस्था अभी की ही जानी है और इस बारे में सोचा भी नहीं गया है।       

सरकार के पास नहीं हैं पैसे 

यह सर्वविदित है कि सरकार के पास पैसे नहीं हैं। अगर जनता समझती है कि नोटबंदी और जीएसटी कालाधन रोकने के लिए लागू किए गए हैं तो वह सरकार से अपेक्षा भी नहीं करेगी। अगर कोई व्यक्ति इस लाइन पर काम कर रहा है तो उसे सरकार से कोई शिकायत नहीं होगी। चुनाव में समर्थन के लिए ऐसे लोगों के लिए कुछ ख़ास करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोगों के लिए आयुष्मान योजना जैसी बीमा योजना कम पैसे में ज़्यादा असरकारक होती। इस मामले में शुरू में लग रहा था कि सरकार अपनी योजना के अनुसार चल रही है। फिर केंद्रीय वित्त मंत्री का बीमार हो जाना, सरकार का सवर्ण आरक्षण जैसा उपाय करना और फिर विपक्ष के विरोधी उपायों के जवाब में आर्थिक घोषणा करना अटपटा है और यह पुरानी योजना के क्रम में नहीं लगता है। 

केंद्र सरकार अर्थव्यवस्था की ख़राब हालत का सच स्वीकार करे या नहीं लेकिन हालात चीख-चीख कर सच बता रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इसे देखने-समझने के लिए बहुत पारखी नज़र की ज़रूरत है।

नहीं आए लोग, खाली रह गए फ़्लैट्स

दिल्ली में रहने वाले पुराने लोगों को याद है कि मयूर विहार फेज एक और दो के डीडीए फ़्लैट से लेकर पटपड़गंज या इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन और मयूर विहार के ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी के फ़्लैट से लेकर रोहिणी, पीतमपुरा और दूसरे तमाम मोहल्ले कितनी तेज़ी से बसे। इमारतें बन गईं, तैयार हुईं और लोग रहने लगे। पर अब कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज की बात करें या द्वारका के खाली रह गए फ़्लैट्स की, या फिर एनसीआर में बन रहे और बन कर खड़े प्राइवेट बिल्डर के फ़्लैट्स की, जहाँ 5 साल में भी रहने वाले नहीं आए। जो आधे-अधूरे थे, 5 साल में भी पूरे नहीं हुए जबकि पहले कहीं मोहल्ले को बसने में 5 साल लगे हों, ऐसा याद नहीं आता। 

दबाव में हैं उद्योग-धंधे 

2014 में सरकार बदलने के बाद की सख़्ती, ईमानदारी, नियमों का पालन, काले धन पर रोक या फिर नोटबंदी और जीएसटी - कारण जो मानिए, तथ्य यह है कि उद्योग-धंधे दबाव में हैं। कारोबारियों के लिए नियमों का अनुपालन मुश्किल और ख़र्चीला हो गया है। इसका असर मुनाफ़े पर हुआ है और मुनाफ़ा कम होने का सीधा संबंध रोजगार की उपलब्धता से है। इस कारण नौकरियां कम हुई हैं और नई संभावनाएं नहीं बनी हैं। 

नियमों का अनुपालन मुश्किल होने से लोग इस झंझट में नहीं पड़ रहे हैं। स्टैंड अप, स्टार्ट अप आदि जैसी तमाम सुविधाओं के बावजूद नया काम मुश्किल है और उसमें कार्यशील पूँजी सबसे बड़ा हिस्सा है। कर्ज नहीं मिलता और अलग-अलग कारणों से अक्सर यह अनुमान से ज़्यादा हो जाता है। 
वर्तमान स्थितियों में पैसे टीडीएस से लेकर जीएसटी मद में फंसने या पहले ही ख़र्च हो जाने की संभावना ज़्यादा है जबकि पैसे के कई बार प्रयोग होने से हो सकने वाले मुनाफ़े की संभावना कम हो गई है। इसलिए कोई भी यह जोख़िम लेने की स्थिति में नहीं है।

रोज़गार के नहीं हैं मौक़े

यही हाल विदेशी निवेश का है। जो निवेश आए, उनमें ज़्यादा कर्मचारियों की ज़रूरत नहीं है।आजकल वैसे भी बड़े कारखानों में काम मशीनों से होता है और नौकरियाँ कम होती हैं। पुराने कारखानों में भी मज़दूर कम हो रहे हैं। इसलिए, सरकार को ही ज़्यादा नौकरी देने वाले काम करने चाहिए थे। इसके लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए था और विदेशी निवेश आकर्षित करने के साथ अगर यह भी कहा गया होता कि हमारे यहाँ, श्रम और कौशल सस्ते में उपलब्ध हैं तो संभवतः ऐसे उद्योग आते। पर सरकार का जोर सिर्फ़ निवेश आकर्षित करने पर ही रहा। 

माना जा रहा था कि निवेश के साथ रोज़गार भी मिलेंगे पर वह उस अनुपात में नहीं हुआ क्योंकि निवेशकों के लिए वह आकर्षक नहीं था। ज़्यादा नौकरियाँ अनुसंधान और विकास में होती हैं। लेकिन सरकार उसे प्रोत्साहन नहीं देती है। अगर इसे सरकारी प्रोत्साहन मिल रहा होता तो इनमें भी रोज़गार की अच्छी संभावना बनती।

नौकरी को लेकर गोलमोल बात 

इकनॉमिक टाइम्स ने अक्टूबर 2017 में ख़बर दी थी कि 600 विदेशी फ़र्में भारत में 85 अरब डॉलर का निवेश करेंगी और इससे अगले 5 साल में 7 लाख नौकरियाँ बनेंगी। 5 साल में यह वैसे ही ज़्यादा नहीं है। पर इंवेस्ट इंडिया के प्रबंध निदेशक दीपक बागला ने तब कहा था कि हम अगले दो वर्षों में 100 अरब डॉलर के निवेश के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। इसमें नौकरी की संभावना की बात कहीं नहीं थी।   

उपज का मिले सही दाम

जहाँ तक खेती-किसानी के संकट का सवाल है तो सबको पता है कि किसानों को पैदावार की उपयुक्त क़ीमत नहीं मिलने से परेशानी होती है। सरकार उनकी पैदावार कथित रूप से उचित कीमत देकर ख़रीद ले, यह अस्थायी उपाय है लेकिन चल यही रहा है। आख़िर सरकार फसल का कितना मूल्य दे और उसका क्या करे या यह राशि कहाँ से लाए। 

होना तो यह चाहिए कि कृषि पैदावार को रखने और उसके परिरक्षण के साथ उनके पूरे साल उपयोग की व्यवस्था करने वाले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। किसानों के लिए कोल्ड स्टोरेज की ज़रूरत है पर अगर अलग-अलग फसलों का उपयोग करने वाले उद्योग हों तो वे साल भर उपयोग करने वाले उत्पाद तैयार कर सकेंगे। ऐसे में वे साल भर की बिक्री से मुनाफ़ा कमाएँगे तो किसानों को भी भुगतान कर सकेंगे। 

एफ़डीआई में ऐसी कितनी फ़ैक्ट्री आईं, इसपर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत थी। हम ऐसे कारखाने लगवा रहे हैं जो भारतीय बाजार में कारें बनाकर बेच रहे हैं। भारत, कारों का बड़ा बाजार है, अगर उनकी असेंबलिंग भी यहाँ हो तो बिक्री सस्ती पड़ती है लेकिन उसमें रोज़गार के मौक़े कम बनते हैं। 

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