जीडीपी वृद्धि दर 7.8% के आँकड़े पर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के बाद अब देश के पहले मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणब सेन ने भी इसकी मेथडोलॉजी और डेटा को लेकर बड़े सवाल उठाए हैं। सेन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ एक इंटरव्यू में कहा कि सरकार द्वारा जारी किए गए नए जीडीपी आंकड़ों में इस्तेमाल की गई पद्धति पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसके पीछे मौजूद डेटा और मेथडोलॉजी को सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में इन आंकड़ों पर पूरी तरह भरोसा करना मुश्किल है। सेन ने पूछा कि जीडीपी निकालने के लिए अपनाई गई डबल डिफ्लेशन पद्धति के लिए ज़रूरी उत्पादों की क़ीमतों और राष्ट्रीय आय का विस्तृत डेटा कहाँ है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में प्रणब सेन ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता नई जीडीपी सीरीज की कार्यप्रणाली यानी मेथडोलॉजी और उसमें इस्तेमाल किए गए डेटा को लेकर है। उन्होंने यह भी साफ़ किया कि वह पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की सभी आलोचनाओं से सहमत नहीं हैं।

7.8% जीडीपी वृद्धि पर क्या बोले?

सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जारी किया है। इस पर प्रणब सेन ने कहा कि फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह आंकड़ा पूरी तरह सही है या नहीं, क्योंकि शुरुआती जीडीपी अनुमान हमेशा सीमित आंकड़ों के आधार पर तैयार किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में शुरुआती जीडीपी आँकड़ों में बाद में बड़े पैमाने पर संशोधन किए गए हैं। इसलिए वर्तमान आंकड़ों को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत है।
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हालांकि उन्होंने कहा कि 10 प्रतिशत Nominal जीडीपी वृद्धि का अनुमान उन्हें काफी हद तक सही लगता है। उनकी मुख्य चिंता वास्तविक जीडीपी निकालने के लिए इस्तेमाल किए गए प्राइस डिफ्लेटर को लेकर है।

प्राइस डिफ्लेटर एक ऐसा सूचकांक है जो बताता है कि अर्थव्यवस्था में कीमतें कितनी बढ़ीं या घटीं। मिसाल के तौर पर मान लीजिए पिछले साल आपने 100 किलो चावल पैदा किया और उसकी कीमत 50 रुपये प्रति किलो थी। इस साल भी 100 किलो चावल पैदा किया, लेकिन कीमत 55 रुपये प्रति किलो हो गई। ऐसे में नॉमिनल जीडीपी बढ़ गया क्योंकि कीमत बढ़ी। लेकिन रियल जीडीपी वही रहा क्योंकि चावल की मात्रा नहीं बढ़ी यानी चावल 100 किलो ही रहा। यहाँ प्राइस डिफ्लेटर बताएगा कि वृद्धि सिर्फ महंगाई यानी कीमत बढ़ने की वजह से हुई है, असली उत्पादन नहीं बढ़ा।

नई जीडीपी सीरीज की मेथडोलॉजी पर सवाल

प्रणब सेन ने कहा कि नई जीडीपी सीरीज में कई ऐसे बदलाव किए गए हैं जो सिद्धांत रूप से सही और आधुनिक हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार के पास उन्हें लागू करने के लिए पर्याप्त डेटा मौजूद है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बार डबल डिफ्लेशन पद्धति अपनाई है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी मानी जाती है। 

सेन ने कहा कि डबल डिफ्लेशन पद्धति में केवल अंतिम उत्पाद की कीमतें नहीं, बल्कि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले हर इनपुट की कीमतों का भी विस्तृत डेटा चाहिए। उन्होंने कहा कि 'मुझे ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि सरकार के पास इतना बड़ा डेटा उपलब्ध है।'

डबल डिफ्लेशन रियल GDP निकालने का एक तरीका है जिसमें दो बार कीमतों का असर हटाया जाता है। मिसाल के तौर पर मान लीजिए कि एक फैक्ट्री स्टील बनाती है। स्टील बेचने की कीमत बढ़ गई, लेकिन लोहा और कोयला सस्ता हो गया। अगर सिर्फ एक डिफ्लेटर इस्तेमाल करें तो सही तस्वीर नहीं आएगी। रियल जीडीपी निकालने के लिए स्टील बेचने में बढ़ी क़ीमतों को तो हटाना ही पड़ेगा, लोहा व कोयला सस्ता होने से कम हुई क़ीमतों को भी एडजस्ट करना पड़ेगा।

पीपीआई का डेटा जारी क्यों नहीं किया?

प्रणब सेन ने कहा कि सरकार ने इस बार प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स यानी PPI का उपयोग किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि इनपुट कीमतों के लिए भी पीपीआई का इस्तेमाल किया गया है तो उसका डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि भारत में दो दशकों तक पीपीआई तैयार नहीं हो पाया क्योंकि कंपनियां अपनी उत्पादन कीमतें साझा करने के लिए तैयार नहीं थीं। उनका कहना था कि पीपीआई तैयार करना आसान नहीं होता क्योंकि एक ही उत्पाद अलग-अलग ग्राहकों को अलग कीमत पर बेचा जाता है। उन्होंने पूछा, 'अगर सरकार ने यह डेटा जुटाया है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?'

'पहले समानांतर आंकड़े जारी करने चाहिए थे'

अंग्रेज़ी अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार इंटरव्यू में प्रणब सेन ने कहा कि जब किसी नई सांख्यिकीय प्रणाली को लागू किया जाता है तो अच्छी अंतरराष्ट्रीय परंपरा यह होती है कि कुछ समय तक पुरानी और नई दोनों प्रणालियों के आंकड़े साथ-साथ जारी किए जाएं। इससे विशेषज्ञ दोनों की तुलना कर सकते हैं और समझ सकते हैं कि नया तरीका कितना विश्वसनीय है। सेन ने कहा कि सरकार ने अचानक पुरानी प्रणाली छोड़कर नई प्रणाली लागू कर दी और लोगों से केवल भरोसा करने को कहा। उनके मुताबिक, 'भरोसा तुलना और पारदर्शिता से बनता है, केवल दावे से नहीं।'

गर्ग की आलोचना से पूरी तरह सहमत नहीं

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने पहली तिमाही के पुराने जीडीपी आंकड़ों में भारी संशोधन पर सवाल उठाए थे। इस पर प्रणब सेन ने कहा कि आधार वर्ष बदलने पर पुराने आंकड़ों में संशोधन होना सामान्य बात है। उन्होंने कहा कि इस बार संशोधन बड़ा जरूर है, लेकिन संभव है कि पहले जीडीपी का अनुमान कुछ अधिक लगाया गया हो और अब उसे ठीक किया गया हो। इसलिए इस मुद्दे पर वे गर्ग की आलोचना से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

नई जीडीपी सीरीज में विनिर्माण क्षेत्र की 9.2 प्रतिशत वास्तविक वृद्धि दिखाई गई है, जबकि इस दौरान संबंधित डिफ्लेटर -1.5 प्रतिशत रहा। इस पर प्रणब सेन ने कहा कि डबल डिफ्लेशन पद्धति अपनाने पर ऐसा संभव है। उन्होंने कहा कि यदि पुरानी सिंगल डिफ्लेशन प्रणाली होती तो ऐसा परिणाम नहीं आता।

जीडीपी डिफ्लेटर और WPI में बड़ा अंतर

विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि जब थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई लगभग दो अंकों में था, तब जीडीपी डिफ्लेटर केवल 2.5 प्रतिशत कैसे रहा। इस पर प्रणब सेन ने कहा कि यह अंतर उन्हें भी संदेहास्पद लगता है। हालाँकि उन्होंने माना कि नई पद्धति अपनाने के कारण कुछ अंतर स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन इतनी बड़ी भिन्नता को समझाने के लिए सरकार को विस्तृत जानकारी देनी चाहिए।
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सरकार से क्या मांग की?

प्रणब सेन ने कहा कि सरकार को नई जीडीपी सीरीज की पूरी कार्यप्रणाली सार्वजनिक करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह बताया जाना चाहिए कि प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स यानी पीपीआई का डेटा कैसे जुटाया गया। डबल डिफ्लेशन में इनपुट कीमतों का डेटा कहां से आया। सप्लाई एंड यूज टेबल का उपयोग कैसे किया गया। शोधकर्ताओं के लिए पर्याप्त स्तर तक डेटा उपलब्ध कराया जाए ताकि वे स्वतंत्र रूप से गणना की जांच कर सकें।

पारदर्शिता पर दिया जोर

प्रणब सेन ने कहा कि ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में सरकारें राष्ट्रीय आय से जुड़े विस्तृत आँकड़े जारी करती हैं, जिससे स्वतंत्र शोधकर्ता जीडीपी की गणना को दोबारा जांच सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत में भी इसी तरह की पारदर्शिता जरूरी है। उनके अनुसार, यदि सरकार डेटा और कार्यप्रणाली सार्वजनिक करेगी तो जीडीपी के आंकड़ों पर लोगों का भरोसा और मजबूत होगा।