मनमोहन सिंह सरकार के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री गुजरात और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, "जिस प्रकार रुपये की तुलना में डॉलर मजबूत हो रहा है और रुपया कमजोर हो रहा है उससे अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में भारत की स्थित कमजोर हुई है और रुपये की इस गिरावट के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।” उन्होंने तब यह भी कहा था कि ‘जब किसी देश की करेंसी का मूल्य गिरता है तो साथ में देश और प्रधानमंत्री की इज्जत भी गिरती है’। निश्चित ही विनिमय दर किसी भी अर्थव्यवस्था की आंतरिक और बाह्य स्थिरता का प्रमुख संकेतक होती है। हाल के वर्षों में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा है।

मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तब 1 डॉलर का मूल्य 44 रुपये था और जब वे प्रधान मंत्री पद से हटे तब 1 डॉलर का मूल्य 68 रुपये था अर्थात मनमोहन सिंह के कार्यकाल में डॉलर के सापेक्ष रुपये के मूल्य में 14 रुपए की गिरावट हुई। हर वर्ष 1 रुपया 40 पैसे की गिरावट दर्ज की गई।
अब यदि मोदी के कार्यकाल में देखें तो अभी तक यह गिरावट 2 रुपये 28 पैसा प्रति वर्ष हो चुकी है और जिस प्रकार रुपये का मूल्य लगातार गिर रहा है। मोदी के 12 साल पूरे करते करते यह गिरावट औसतन 2 रुपए 50 पैसे प्रति वर्ष की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार की दलील

आर्थिक सर्वेक्षण 3025-26 के बाद भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन ने रुपये की गिरावट को उभरते बाज़ारों की मुद्राओं की सामूहिक कमजोरी का हिस्सा बताया। उनके कथन में आंशिक सच्चाई है। असल सवाल यह है कि जब वैश्विक दबाव सभी उभरती अर्थ व्यवस्थाओं पर है तो भारतीय मुद्रा रुपया ही अपेक्षाकृत अधिक दबाव में क्यों है? यदि इस सवाल का हल तलाश कर लिया जाए तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना निश्चित है कि रुपये की असाधारण गिरावट का कारण सिर्फ अन्तरराष्ट्रीय नहीं है, इसका बड़ा कारण घरेलू आर्थिक फैसले हैं। रुपये के मूल्य में हो रही लगातार असाधारण गिरावट हमारी अर्थव्यव्स्था की गहरी और संरचनात्मक कमजोरियों का आईना है, इसे न तो वैश्विक परिस्थितियों के बहाने ढका जा सकता है और न ही बुनियादी कारकों के मज़बूत होने के दावों से।

रुपये के मूल्य में गिरावट सिर्फ विनिमय दर का मामला नहीं है। यह विदेश कर्ज के बोझ, आर्थिक स्थिरता और विकास को प्रभावित करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार कम हुआ

फरवरी 2026 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.494 बिलियन डॉलर था जो अप्रैल 2026 में घटकर 703.31 बिलियन डॉलर रह गया है। दो महीने के छोटे समय में यह गिरावट बहुत कुछ संकेत देती है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निकासी तेजी से बढ़ रही है, इससे रुपये पर सीधा असर पड़ा है। रुपये की गिरावट का लाभ निर्यात बढ़ाने में हो सकता था, मगर भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की सीमित क्षमता और गुणवत्ता में कमजोरी निर्यात वृद्धि में अवरोध बनी हुई है। निर्यात का अहम क्षेत्र सेवाएँ रही हैं जो अभी भी बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन पीएम मोदी को व्हाइट कॉलर जाब्स पसंद नही हैं। वे हॉवर्ड की तुलना में ‘हार्ड वर्क’ पसंद करते हैं, इसके लिए पूरे दम-खम से मेक इन इंडिया लॉन्च किया गया। जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़ाकर 25 फीसदी करने का संकल्प भी व्यक्त किया गया, मगर पीएम भारत की जीडीपी में मैनुफेक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी अभी भी मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 17 फीसदी से आगे नहीं ले जा सके हैं।

अन्य सेक्टर पर्यटन है जो रुपये के मूल्य ह्रास से विदेशी पर्यटकों के लिए सस्ता हो जाता है व डिजिटाज्ड बुकिंग आदि से आकर्षित कर सकता है किन्तु अनेक दुर्भाग्यपूर्ण कारणों से यह सेक्टर भी प्रगति नहीं कर पा रहा है।

रुपये में गिरावट से नुक़सान

जहां तक नुक़सान की बात है तो रुपये की गिरावट विदेशी कर्ज के बोझ, चालूखाते का घाटा, महंगाई और बेरोजगारी को बढ़ाकर अर्थिक विकास स्थिरता, निवेश और रोजगार के लिए नुकसानदायक होगी।

मान लीजिए 2014 में हमने 1 डॉलर कर्ज लिया या 1 डॉलर मूल्य की कोई वस्तु या सेवा खरीदी तब इसके लिए 68 रूपये भुगतान करना था। आज अगर 1 डॉलर कर्ज लें या 1 डॉलर मूल्य की कोई वस्तु या सेवा खरीदें तो इसके लिए 95.33 रुपये का भुगतान करना होगा। अर्थात डॉलर में कर्ज अभी भी 1 डॉलर ही है मगर उसकी कीमत हमें रुपये में अब डेढ़ गुना अधिक चुकानी पड़ रही है। इस बीच डॉलर के मूल्य में हुए स्फीतिक असर को छोड़ दिया गया है, उसे गणना में सम्मिलित करने पर वास्तविक भुगतान और अधिक हो जाता है।

भारत का 80 प्रतिशत से अधिक व्यापार डॉलर में होता है और उसका एक तिहाई सिर्फ क्रूड ऑयल पेट्रोलियम के आयात पर खर्च होता है। ईरान से क्रूड ऑयल गैस का भुगतान रुपये में हो रहा था जिसे हमने बंद कर दिया है। आयात महंगा होने से और रुपये की कमजोरी के कारण भारत को दोहरा नुकसान हो रहा है जिसका असर सामान्य नागरिक की जिन्दगी पर सीधा और नकारात्मक पड़ना निश्चित है। कमर्शियल एलपीजी के रेट एक माह में डेढ़ गुना हो चुके हैं और पेट्रोल डीजल फर्टिलाइजर्स के रेट किसी भी समय बढ़ाने पड़ सकते हैं। इसका सीधा प्रभाव ट्रांसपोर्ट लागतों पर और सभी वस्तुओं की क़ीमत पर पड़ेगा और साथ ही कृषि की उत्पादन लागत पर भी जो पहले ही दबाव में है। मुद्रा की विनिमय दर देश के चालू खाते के संतुलन या असंतुलन, उत्पादकता, निर्यात और आयात से निर्धारित होती है। अत: इसके घरेलू पहलुओं पर घ्यान दिया जाना आवश्यक है।
देश के आजाद होने से 67 वर्ष में अर्थात 2014 तक औषतन हर वर्ष 86 पैसे की गिरावट डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में दर्ज हुई थी। पीएम मोदी के 11 साल 10 माह में हर वर्ष 2 रुपये 28 पैसे की हर वर्ष औसत गिरावट हो चुकी है।

बकौल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, ‘रुपये की कीमत और भारतीय प्रधानमंत्रियों की इज्जत में नकारात्मक और सीधा सम्बन्ध रहा हो सकता है’। मगर प्रधानमंत्री मोदी की चुनावी सफलताओं को देखें तो रुपये के मूल्य और मोदी की मजबूती के बीच विपरीत नकारात्मक सह-संबंध दिखाई देता है।