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ऑटो इंडस्ट्री में निराशा, स्कूटर्स की बिक्री घटी, फिर घिरेगी मोदी सरकार

घटती नौकरियों और ग्रामीण इलाक़ों तथा छोटे शहरों में बढ़ती आर्थिक दिक़्क़तों ने ऑटो इंडस्ट्री पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। इस वजह से 13 सालों में पहली बार स्कूटर्स की बिक्री घटी है। इसके अलावा कारें और स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) की बिक्री की गति भी पिछले 5 साल में सबसे कम रही है। बेरोज़गारी और नोटबंदी, जीएसटी के बाद बिगड़े आर्थिक हालात के कारण लगातार विपक्ष की आलोचना झेल रही मोदी सरकार को ऑटो इंडस्ट्री में निराशा के माहौल को लेकर एक बार फिर चौतरफ़ा हमले झेलने पड़ सकते हैं। 
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टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़, 2018-19 में 67 लाख स्कूटर्स बिके थे और यह उससे पिछले साल बिके स्कूटर्स के मुक़ाबले 0.27 फ़ीसदी कम है। इससे पहले 2005-06 में दोपहिया वाहनों की बिक्री 1.5 फ़ीसदी गिरी थी। देश भर में बिकने वाले कुल दोपहिया वाहनों में लगभग एक तिहाई संख्या स्कूटर्स की होती है। 

ख़बर के मुताबिक़, मोटसाइकिलों की बिक्री की बात करें तो इसमें 8 फ़ीसदी की बढ़ोतरी के साथ प्रदर्शन अच्छा रहा है लेकिन हालात यहाँ भी ख़राब ही दिख रहे हैं। इस साल जनवरी के बाद से ही मोटरसाइकिलों की बिक्री को लेकर काफ़ी संघर्ष करना पड़ रहा है। 

मेट्रो और छोटे शहरों में बने निराशा के इस माहौल के कारण हीरो मोटो, होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (एचएमएसआई) और टीवीएस जैसी बड़ी कंपनियों ने वाहन बनाने कम कर दिए हैं और इसी तरह डीलरों की डिलीवरी भी घटा दी है।

दोपहिया वाहन बनाने वाली एक बड़ी कंपनी के अधिकारी ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि मोटरसाइकिलों की बिक्री की कुल 50 फ़ीसदी बिक्री ग्रामीण इलाक़ों में होती है लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में चल रही मंदी के कारण उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है। 

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़, इंडस्ट्री विश्लेषक और कंसल्टेंसी फ़र्म एवेंटम अडवाइजर्स के एमडी वीजी रामाकृष्णन ने कहा, ‘नौकरियों पर पड़ रहे असर को अभी तक बहुत कम करके आँका गया है। जीएसटी के बाद, कई असंगठित सेक्टर बंद हो गए हैं और बहुत सारी कंपनियाँ भी कम हो गईं हैं। आईटी सेक्टर में आई मंदी और टेलीकॉम सेक्टर में छिड़ी होड़ से न केवल रोज़गार में कमी आई, बल्कि इससे नौकरी कर रहे लोगों के मन में भी अनिश्चितता की भावना पैदा हो गई। ऐसे में लोग पैसा होने के बावजूद नई चीजें न ख़रीदकर उन्हें टालने की कोशिश कर रहे हैं।' 

बेरोज़गारी दर 45 साल में सबसे ज़्यादा 

बता दें कि रोज़गार को लेकर मोदी सरकार लगातार सवालों के घेरे में है। कुछ ही समय पहले एक अंग्रेजी अख़बार बिज़नेस स्टैंडर्ड ने बेरोज़गारी को लेकर एक रिपोर्ट छापी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबसे ज़्यादा हो गई है। रिपोर्ट के सामने आने के बाद ख़ासा हंगामा हो गया था। चुनाव के मौक़े पर किरकिरी होते देख नीति आयोग ने सरकार की ओर से सफ़ाई देते हुए कहा था कि यह फ़ाइनल नहीं ड्राफ़्ट रिपोर्ट है।
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लेकिन केंद्र सरकार के दावों की हवा केंद्रीय सांख्यिकी आयोग ने ही निकाल दी थी। आयोग के पूर्व प्रमुख पीसी मोहनन ने कहा था कि एक बार जब आयोग किसी रिपोर्ट को मंजूरी दे देता है तो यह फ़ाइनल होती है। मोहनन ने इस साल 28 जनवरी को अचानक अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। उन्होंने कहा था कि सरकार नौकरियों को लेकर एनएसएसओ (नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनइजेशन) की रिपोर्ट को जारी नहीं कर रही थी। 
2014 में अपनी चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर साल दो करोड़ नये रोज़गार देने का वादा किया था लेकिन हुआ इसके बिलकुल उलटा। उनके शासन के पिछले पाँच सालों में नये रोज़गार तो पैदा हुए नहीं, बेरोज़गारी दर ज़रूर 45 सालों में सबसे ज़्यादा हो गई।

अक्टूबर 2018 में ‘ऑल इंडिया मैन्युफ़ैक्चरर्स ऑर्गनाइज़ेशन' (आइमो) ने एक सर्वेक्षण किया था। 'आइमो' के मुताबिक़, उसने सर्वेक्षण के दौरान पूरे देश में दुकानदारों, अति लघु, लघु और मँझोले उद्योगों के 34 हज़ार प्रतिनिधियों से बातचीत की थी। इसमें कई कारोबारी संगठनों और व्यावसायी शामिल थे। 

नोटबंदी, जीएसटी ने तोड़ी कमर

इस सर्वेक्षण में दावा किया गया था कि नोटबंदी, जीएसटी और ई-कॉमर्स ने दुकानदारों, व्यापारियों और ग़रीब तबक़े की कमर तोड़ दी है। सर्वेक्षण के मुताबिक़, दुकानों व व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ी कम्पनियों में काम करने वाले या अपना ख़ुद का छोटा-मोटा काम करने वाले क़रीब 43 प्रतिशत लोग नोटबंदी, जीएसटी और ई-कॉमर्स के कारण बेरोज़गार हो गए हैं।

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यही नहीं, अति लघु, लघु और मँझोले उद्योगों पर भी नोटबंदी और जीएसटी की दोहरी मार ने इन क्षेत्रों में बेरोज़गारी का भारी संकट खड़ा कर दिया है। सर्वेक्षण का दावा है कि अति लघु उद्योगों में 32 प्रतिशत, लघु उद्योगों में 35 प्रतिशत और मँझोले उद्योगों में 24 प्रतिशत लोग बेरोज़गार हो गए।
'आइमो' के सर्वेक्षण का एक निष्कर्ष यह भी था कि 'मेक इन इंडिया,' 'डिजिटल इंडिया,' 'स्किल इंडिया' और 'स्टार्ट अप इंडिया' जैसी योजनाएँ दुकानदारों, व्यापारियों और छोटे उद्योगों के काम नहीं आई थीं।

इसके अलावा सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के प्रोजेक्ट - ट्रैकिंग डेटाबेस के हालिया आँकड़ों के मुताबिक़, देश में घरेलू निवेश 14 साल के सबसे निचले स्तर पर है।

ऐसे में जब रोज़गार को लेकर हालात इतने ख़राब हों और इसका असर ऑटो इंडस्ट्री पर भी पड़ रहा हो तो विपक्ष की ओर से लाज़िमी तौर पर सरकार से तीख़े सवाल पूछे जाने चाहिए। मोदी सरकार इसलिए भी आलोचनाओं के घेरे में है क्योंकि वह हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का वादा कर सत्ता में आई थी लेकिन आँकड़े बताते हैं कि हालात भयावह हैं। ऐसे में सरकार को ऑटो सेक्टर को मंदी के माहौल से निकालने के प्रयास करने चाहिए। राजनीतिक दलों को लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व, न्याय योजना को मुद्दा बनाने के बजाय रोज़गार को लेकर ठोस वादे करने चाहिए और यह भी कोशिश करनी चाहिए कि सत्ता में आने पर उनके वादे सिर्फ़ जुमले साबित न हों। 

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