सऊदी अरब ने हवाई हमले के बाद अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद कर दी है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बाद भारत पहले से ही मुश्किल में है और रुपया दबाव में है। भारत के कुल कच्चे तेल आयात में पिछले साल सऊदी अरब का हिस्सा क़रीब 13% रहा था।
मिडिल ईस्ट में युद्ध बढ़ने के बीच सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। 1200 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन हर दिन करीब 40-50 लाख बैरल तेल ले जा रही थी। इस पाइपलाइन पर हमले के बाद ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया था और अभी भी यह 100 डॉलर के आसपास बना हुआ है। भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 90% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें एक बड़ा हिस्सा सऊदी से आने वाला कच्चे तेल का भी है। तो अब लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहने वाला क्रूड भारत के आयात बिल, रुपये, महंगाई पर बड़ा दबाव डाल सकता है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर तेजी से दिखाई देने लगा है। सऊदी अरब ने अपने अहम ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को हवाई हमले के बाद एहतियातन बंद कर दिया है। इस हमले से तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की क़ीमतों में तेज उछाल आया है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल निर्यातक है। ऐसे में उसकी एक प्रमुख तेल पाइपलाइन का बंद होना वैश्विक बाजार के लिए बड़ी ख़बर है। इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। भारत के लिए चिंता इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि कच्चे तेल की कीमत पहले ही काफी ऊपर जा चुकी है और रुपये पर भी दबाव बना हुआ है।
1200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बंद
सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक़ 10 सितंबर को ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के रियाद और मदीना क्षेत्रों में कई हमले हुए। इसके बाद पाइपलाइन को एहतियात के तौर पर बंद कर दिया गया। मंत्रालय के मुताबिक आपातकालीन और तकनीकी टीमों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर पाइपलाइन की सुरक्षा और नुकसान का आकलन शुरू किया।
यह पाइपलाइन क़रीब 1200 किलोमीटर लंबी है और अरब प्रायद्वीप के एक छोर से दूसरे छोर तक तेल पहुँचाती है। हाल के महीनों में इसके ज़रिए रोज़ाना क़रीब 40 से 50 लाख बैरल तेल भेजा जा रहा था। विश्लेषकों और शिप-ट्रैकिंग कंपनियों के अनुमानों के मुताबिक़, यह मात्रा दुनिया की कुल तेल सप्लाई के करीब 4 से 5 फीसदी के बराबर है। हालाँकि सऊदी सरकार ने यह साफ़ नहीं किया है कि पाइपलाइन के बंद होने से उसके कुल तेल निर्यात पर कितना तत्काल असर पड़ा है।हमले के लिए तत्काल किसी संगठन या देश को आधिकारिक तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। हालांकि, सऊदी अरब और इराक ने कहा है कि ड्रोन हमला इराक की तरफ से हुआ था। इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया सक्रिय हैं। हमले के बाद इराक ने शनिवार को एक सैन्य कमांडर को उसके पद से हटा दिया।
सैटेलाइट तस्वीरों में मदीना के दक्षिण में पाइपलाइन के एक हिस्से के पास काला धुआं उठता दिखाई दिया। सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि हमले से नुकसान हुआ है और कुछ लोग घायल हुए हैं। नुकसान का विस्तृत आकलन किया जा रहा है।
होर्मुज के रास्ते में पहले से संकट
सऊदी अरब के लिए ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन इसलिए भी अहम है क्योंकि यह उसे स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज से गुजरने वाले समुद्री रास्ते का विकल्प देती है। ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के कारण पिछले छह महीनों से होर्मुज जलडमरूमध्य में टैंकरों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। सामान्य स्थिति में दुनिया के तेल कारोबार का क़रीब पांचवां हिस्सा इस समुद्री रास्ते से गुजरता है।
ऐसे समय में सऊदी अरब की पाइपलाइन तेल को समुद्री मार्ग के दबाव से बचाते हुए दूसरे रास्ते से निर्यात तक पहुंचाने में मदद करती है। लेकिन अब पाइपलाइन पर हमला होने से तेल बाजार के सामने एक साथ कई सप्लाई रूट को लेकर चिंता पैदा हो गई है।बाब-अल-मंदेब पर भी बढ़ा खतरा
तेल बाजार की दूसरी बड़ी चिंता यमन और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को लेकर है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने यमन के लाल सागर तट के पास मोचा बंदरगाह पर कब्जा कर लिया है। इससे वे बाब-अल-मंदेब के और करीब आ गए हैं।
यह जलडमरूमध्य लाल सागर और आगे यूरोप की ओर जाने वाले महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग का हिस्सा है। यहां किसी बड़े व्यवधान का असर सिर्फ तेल पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है। सऊदी समर्थित यमनी बल हूतियों की आगे बढ़त को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इससे 2022 में बनी संघर्षविराम की स्थिति फिर बिगड़ने की आशंका पैदा हो गई है। मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है और यह लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल बनी हुई है। इससे पहले संघर्ष के एक दौर में ब्रेंट क्रूड 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका था।
अब डर है कि अगर होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे बड़े समुद्री रास्तों पर व्यवधान बढ़ा तो तेल की कीमतें एक बार फिर 120 डॉलर से ऊपर जा सकती हैं। कुछ अनुमानों में बेहद गंभीर स्थिति में तेल के 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका भी जताई गई है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता- तेल आयात बिल
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी ज़रूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है।
अप्रैल से जुलाई के बीच भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 56 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 63.4 अरब डॉलर हो गया था। पिछले साल इसी अवधि में यह करीब 40.5 अरब डॉलर था। अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो भारत को तेल खरीदने के लिए हर महीने और ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इससे देश का व्यापार और चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
सऊदी अरब भारत के लिए क्यों अहम है?
भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया के देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है। पिछले साल भारत के कुल कच्चे तेल आयात में सऊदी अरब की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी रही थी। हालांकि मौजूदा स्थिति में भारत को रूस से मिलने वाला तेल एक अहम विकल्प दे रहा है।
अगस्त में रूस से भारत को करीब 21 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल मिला, जो भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 45 फीसदी था। इस महीने यह हिस्सा कुछ कम होने का अनुमान है, लेकिन फिर भी रूस भारत की तेल जरूरतों का करीब 40 फीसदी पूरा कर सकता है।इस वजह से भारत की स्थिति उन देशों से कुछ बेहतर है जो खाड़ी क्षेत्र से आने वाले समुद्री तेल पर ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत तेल की बढ़ती कीमतों से सुरक्षित है।
चीन की बढ़ती तेल खरीद से भारत के लिए चुनौती
भारत के सामने एक और चुनौती चीन की बढ़ती तेल खरीद है। रूसी तेल भारत के लिए बड़ा विकल्प बना हुआ है, लेकिन चीन भी अब रूस और दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदने के लिए तेजी से बाजार में उतर रहा है। एनालिटिक्स फर्म Kpler के मुताबिक, चीनी रिफाइनरियां अब अपनी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाना शुरू कर रही हैं। अगर भारत और चीन दोनों एक ही समय में ज्यादा तेल खरीदने की कोशिश करते हैं तो उपलब्ध कच्चे तेल की कीमत और बढ़ सकती है।
सरकार के सामने मुश्किल
महंगा कच्चा तेल भारत सरकार के सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा करता है- पेट्रोल और डीजल की कीमतों का क्या किया जाए? अगर अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने के बावजूद घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखी जाती हैं तो सरकारी तेल कंपनियों पर लागत का बोझ बढ़ सकता है। दूसरी तरफ अगर पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए जाते हैं तो इसका असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है। माना जा रहा है कि रिफाइनिंग कंपनियों का नुकसान पहले ही काफी बढ़ चुका है। इसलिए सरकार के सामने दोनों ही रास्ते आसान नहीं हैं।
महंगे तेल का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। तेल और प्राकृतिक गैस की कीमत बढ़ने से खाद बनाने की लागत भी बढ़ सकती है। इससे सरकार पर फर्टिलाइजर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा।
इस वित्त वर्ष के लिए सरकार ने खाद सब्सिडी के लिए करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है। अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक, अगर ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो यह खर्च लगभग दोगुना हो सकता है। यानी महंगा कच्चा तेल सरकार के खजाने से लेकर किसानों तक कई स्तरों पर असर डाल सकता है।
क्या भारत में तेल की कमी होगी?
फिलहाल भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या तत्काल तेल की कमी नहीं बल्कि महंगा तेल है। रूस से मिलने वाली बड़ी मात्रा भारत को खाड़ी क्षेत्र की सप्लाई में व्यवधान से कुछ सुरक्षा देती है। इसके अलावा भारत के पास अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की क्षमता भी है। लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है और होर्मुज तथा बाब-अल-मंदेब जैसे समुद्री रास्तों पर लगातार संकट बना रहता है तो वैश्विक तेल बाजार में उपलब्ध सप्लाई कम और कीमतें ज्यादा रह सकती हैं। ऐसी स्थिति में भारत का आयात बिल बढ़ेगा, रुपये पर दबाव बढ़ेगा और महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
ऐसे में सऊदी अरब की पाइपलाइन पर हमला सिर्फ एक देश की तेल अवसंरचना पर हुआ हमला नहीं है। इसने उस समय वैश्विक ऊर्जा बाजार की कमजोरी को और सामने ला दिया है, जब होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे दो अहम समुद्री रास्ते पहले से ही युद्ध के दबाव में हैं। भारत के लिए फिलहाल रूस से मिलने वाला तेल एक राहत है, लेकिन अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है तो महंगा आयात, कमजोर रुपया, बढ़ती महंगाई और बढ़ता सरकारी खर्च- ये चारों मिलकर अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।