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पेट्रोल-डीजल से क्या मुनाफ़ा कमा रही है सरकार?

पेट्रोल डीजल की क़ीमतें बढ़ोतरी को लेकर हंगामा हो रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कोरोना संकट की स्थिति में भी सरकार अपने नागरिकों से भारी मुनाफ़ा कमा रही है। सरकार पर यह आरोप आख़िर क्यों लग रहे हैं? और क्या है वास्तविक स्थिति?

फ़िलहाल, दिल्ली में पेट्रोल और डीजल क़रीब 80-80 रुपये प्रति लीटर है। देश के हर राज्य में क़ीमतें इसके आसपास ही हैं। यही पेट्रोल और डीजल 2014 में क्रमश: क़रीब 47 और 44 रुपये प्रति लीटर था। ऐसे में तर्क दिया जा सकता है कि पिछले छह साल में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से कच्चे तेल को ख़रीदना इतना महँगा हो गया होगा कि इनकी क़ीमतें इस स्तर तक पहुँच गई होंगी। यदि आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप पूरी तरह ग़लत हैं। दरअसल, कच्चे तेल की क़ीमतें 2014 में आज से ढाई गुना ज़्यादा महँगी थीं, फिर भी पेट्रोल और डीजल आज की अपेक्षा 2014 में काफ़ी ज़्यादा सस्ते थे। कच्चे तेल का दाम मई 2014 में औसत रूप से 106.85 डॉलर प्रति बैरल था, जबकि अब यह काफ़ी नीचे आ गया है।

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28 अप्रैल को तो कच्चे तेल का दाम 16.19 डॉलर प्रति बैरल हो गया। पूरे अप्रैल महीने में कच्चे तेल का दाम 16.9 डॉलर प्रति बैरल रहा। मई 2014 से तुलना करने पर कच्चे तेल के दाम क़रीब 85 फ़ीसदी कम हो गए। इस साल मई महीने में इसका दाम 30.6 डॉलर प्रति बैरल रहा। अब यह क़रीब 41 डॉलर प्रति बैरल है। यानी 2014 में कच्चा तेल अभी की तुलना में ढाई गुना ज़्यादा महँगा था। 

फिर सवाल है कि कच्चे तेल की क़ीमतें घटीं तो क्या आम लोगों के लिए पेट्रोल और डीजल के दाम कम किए गए? नहीं। बल्कि हाल में तो क़ीमतें और बढ़ाई गई हैं।

7 जून से लगातार दाम बढ़ाए जाते रहे। 7 जून से लेकर 26 जून तक दिल्ली में पेट्रोल के दाम 9.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल के दाम 11.01 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिए गए। अब इस बढ़ोतरी के पीछे सरकार यह तर्क दे सकती है कि पिछले दो महीने में कच्चे तेल की क़ीमतें दोगुनी यानी क़रीब 16 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई है। तो सवाल है कि क्या इसी तर्क से जब कच्चे तेल के दाम कम हो रहे थे तो पेट्रोल-डीजल की क़ीमतें कम की गई थीं। 2014 से आँकड़ों को देखने से तो ऐसा नहीं लगता है। हालाँकि जब तब क़ीमतों में मामूली कमी की गई, लेकिन वापस उसे पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ा दिया गया। तभी तो मई 2014 में कच्चा तेल औसत रूप से 106.85 डॉलर प्रति बैरल था तो पेट्रोल और डीजल 2014 में क्रमश: क़रीब 47 और 44 रुपये प्रति लीटर थे। लेकिन जब अब कच्चा तेल क़रीब 41 डॉलर प्रति बैरल है तो भी पेट्रोल डीजल 80 रुपये प्रति लीटर है। 

ऐसा क्यों हो रहा है?

दरअसल, यह इसलिए हो रहा है कि भारत में तेल वितरण करने वाली सरकारी कंपनियाँ तो पेट्रोल और डीजल की क़ीमतें बढ़ाती ही हैं, सरकार भी मुनाफ़ा कमाने के लिए एक्साइज ड्यूटी लगाती है। सरकार की कमाई का यह बड़ा ज़रिया है। एक अप्रैल को पेट्रोल पर जहाँ 22.98 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी के रूप में सरकार टैक्स वसूल रही थी वह अब 32.98 रुपये प्रति लीटर वसूल रही है। एक अप्रैल तक डीजल पर जहाँ 18.83 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी थी वहीं अब यह 31.83 रुपये प्रति लीटर है। 

यानी कोरोना संकट के बीच सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर 10 और 13 रुपये की एक्साइज ड्यूटी और बढ़ा दी है। मतलब साफ़ है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का दाम कम होने के बावजूद सरकार इसका फ़ायदा लोगों को नहीं होने देना चाहती है। 

पेट्रोल और डीलज के दाम कैसे बढ़ गए, यह समझना है तो अब इसकी तुलना करें कि पेट्रोल और डीजल पर फ़िलहाल एक्साइज ड्यूटी 32.98 और 31.83 प्रति लीटर है जो 2014 में सिर्फ़ 10.39 और 4.50 प्रति लीटर थी।

एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने का ही नतीजा है कि सरकार की कर से होने वाली आय काफ़ी ज़्यादा बढ़ गई है। लाइव मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा वसूला गया सकल कर राजस्व सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 9.98% से बढ़कर 2017-18 में 11.22% हो गया। इस वृद्धि का एक प्रमुख कारण पेट्रोल और डीजल (मुख्य रूप से एक्साइज ड्यूटी) पर केंद्र सरकार के करों में वृद्धि था। 2013-14 में ईंधन पर लगाए गए करों के माध्यम से 46,386 करोड़ रुपये की कमाई की गई थी जबकि 2017-18 तक यह बढ़कर 2,23,922 करोड़ हो गयी।

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हालाँकि पेट्रोल डीजल में हाल की बढ़ोतरी को कोरोना वायरस संकट के कारण हुई सरकार की ख़राब आर्थिक हालत से जोड़कर देखा जा सकता है, लेकिन इससे पहले भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी। नोटबंदी और माल एवं सेवा कर यानी जीएसटी को ग़लत तरीक़े से लागू किए जाने के बाद से व्यापार व पूरी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। 

कोरोना संकट से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी की स्थिति में पहुँच गई थी। इससे सरकार को कर कम मिलने लगा था और ऐसी स्थिति में सरकार को पेट्रोल और डीजल में कमाई का ज़रिया नज़र आया। और यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम होने के बावजूद लोगों को इसका फ़ायदा नहीं दिया गया। फ़ायदा तो छोड़िए एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर आम लोगों पर बोझ बढ़ा दिया गया। ऐसे में यदि आम लोग और तमाम विपक्ष पेट्रोल डीजल की क़ीमतों को लेकर हंगामा करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

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