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कश्मीर के मुफ़्ती और अब्दुल्ला परिवारों में भारी खलबली क्यों? 

कश्मीर में क्या होने वाला है? कुछ अतिरिक्त केंद्रीय बलों को भेजा गया है। बहुत सारे क़यास लगाए जा रहें हैं। अगर पिछले दिनों के घटनाक्रम की पड़ताल की जाए तो लग रहा है कि कुछ तो होने वाला है। अगर महबूबा मुफ़्ती की मानें तो केंद्र सरकार अनुच्छेद 35 'ए' हटाने जा रही है और उन्होंने उन हाथों को 'जला कर भस्म करने' की धमकी भी दे डाली है। कमोवेश यही हाल अब्दुल्ला बाप-बेटे का है।
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लेकिन अब हालात बदल चुके है। बीजेपी सरकार आर या पार की लड़ाई में उतरने को तैयार है। एक संवैधानिक व्यवस्था जो 35 'ए'  के रूप में 65 सालों से थी, उस व्यवस्था को बदलने का समय क्या आ गया है ? यह वह  अनुच्छेद है जो अपनी बेटी को राज्य के बाहर शादी करने के बाद सम्पत्ति से बेदख़ल कर देती है! 

असंतोष की वजह

इस पूरे मामले को ऐसे समझने की कोशिश करें कि विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए लोग दिल्ली और पंजाब में बस गए और भारत के प्रधानमंत्री ( इंद्र कुमार गुजराल) और उप प्रधानमंत्री (लाल कृष्ण आडवाणी) तक बने। वहीं जो लोग विभाजन के बाद कश्मीर पहुँचे ,उनको ये 35 'ए'  प्रदेश का नागरिक ही नहीं मानता। दुर्भाग्य से जो कुछ सफ़ाई कर्मी जम्मू कश्मीर पचास के दशक में वहाँ गए, वे भी वहाँ के नागरिक नहीं बन पाये। वे लोग सफ़ाई कर्मचारी पद के लिए ही योग्य रहेंगे क्योंकि इस पद के लिए कश्मीर का नागरिक होना आवश्यक नहीं है। यह शायद भारत की संवैधानिक व्यवस्था का सबसे घृणित पक्ष है, जिस पर किसी दलित पार्टी या नेता ने कोई  सवाल नहीं उठाया।

अब्दुल्ला ने नेहरू का किया ब्लैकमेल?

फ़ारूख अब्दुल्ला जो अपने को प्रगतिशील समझते हैं, विदेशी पढ़ाई की है, इनके पिता शेख़ अब्दुल्ला ने नेहरू को एक तरह से 'ब्लैकमेल' करके 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से, अनुच्छेद 370 की ग़लत व्याख्या कर 35 'ए' लाने में सफल रहे थे।

शायद अंतराष्ट्रीय हालात कुछ ऐसे रहें होंगे कि कोरिया की लड़ाई के समय नेहरू उस परम शीत युद्ध के काल में कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाना नहीं चाहते थे और शेख़ अब्दुल्ला ने अपनी मनमानी करवा ली। पर अब ना वह वक़्त है ना वे लोग। और ना ही उपनिवेशवाद से आज़ादी और उनकी सीमाओं का रेखांकन आज अन्तरराष्ट्रीय कूटनीति में कोई मुद्दा रह गया है। आज पैसा, व्यापार और पूँजी ही सब कुछ निर्धारित कर रहा है।

बदली हुई दुनिया

पचास और साठ के दशक में आज़ादी, उपनिवेशवाद विरोध ख़ास कर अफ़्रीका और एशियाई देशों की विदेश नीति का एक हिस्सा हुआ करती थी। अब सारे मसले तय हो चुके। दुनिया ने उदारवादी पूँजीवाद को स्वीकार लिया है। अब आर्थिक मसले ही सर्वोपरि हैं और वे ही नीति निर्धारण कर रहे हैं। यहाँ मुफ़्ती और अब्दुल्ला परिवार पचास के दशक में ही अटके पड़े हैं। 

अनुच्छेद 35 'ए'  जैसे प्रावधानों को कश्मीर में बनाए रख कर सालों साल वहाँ उद्योग-धन्धे और व्यापार को बंद रख कर, वहाँ की जनता को हमेशा के लिए ग़रीब बनाए रखा गया, ताकि युवाओं को भारत के ख़िलाफ़ भड़काने में आसानी हो। 
कश्मीर में एक स्विट्ज़रलैंड बनने की क्षमता थी, जिसे वहाँ के राजनीतिज्ञों ने रोक रखा है। अगर वहाँ आप किसी को आने नहीं देंगे, किसी को सुई भर ज़मीन नहीं लेने देंगे, तो वहाँ निवेश क्या आसमान से टपकेगा?
भारत में रियासतों और रजवाड़ों के दिन ख़त्म हो चुके हैं। इन मुफ़्ती और अब्दुल्ला परिवार ने अभी भी कश्मीर को अपनी रियासत ही समझ रखा हैं। उनको अपनी सोच बदलनी होगी। अगर सरकार अब 35 'ए' को हटाने का प्रयास करती है तो उसे भारत की विशाल जनता का समर्थन मिलेगा। इस बात को केंद्र सरकार अच्छी तरह से समझती है और देश के अन्य राजनीतिक दलों को अपनी स्थिति इस विषय पर स्पष्ट करनी होगी। 

अंत में मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा। वहाँ यह मुक़दमा पहले से ही है। कुछ लोग यह तर्क दे सकते है कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो सरकार क्यों जल्दबाज़ी दिखाए? तो क्या सब कुछ सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ा जाए? अगर राष्ट्रपति 1954 में एक आदेश के ज़रिये  इस लागू कर सकते हैं तो 2019 में एक और आदेश से हटा भी सकते हैं। 

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