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प्रतीकात्मक तसवीर।

शोपियाँ चार्जशीट: कैसे कैप्टन ने आतंकी बता 3 मज़दूर मार दिए

क्या आप यक़ीन कर सकते हैं कि सेना का कोई अफ़सर तीन निर्दोष नागरिकों को आतंकवादी बता कर उन्हें मुठभेड़ में मार दे? भारतीय सेना की प्रतिष्ठा बहुत ऊँची है। लेकिन अफ़सोस कि एक अफ़सर के ऊपर ऐसे गंभीर आरोप लगे हैं। यह वाक़या जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ इलाक़े का है।

18 जुलाई 2020 को जिस विवादास्पद मुठभेड़ में तीन युवकों को मार डाला गया था उसकी पूरी कहानी अब साफ़ हो गई है। पुलिस ने चार्जशीट में कहा है कि सेना के एक अफ़सर ने दो नागरिकों के साथ मुठभेड़ की साज़िश रची थी। उसके अनुसार, एक कैप्टन ने कार की व्यवस्था की, आतंकी साबित करने के लिए अवैध हथियार सहित दूसरी अवैध सामग्रियों का इंतज़ाम किया और तीनों युवकों के शव ऐसे रखे जैसे वे आतंकी साबित किए जा सकें। पुलिस ने सेना के जवानों सहित कई गवाहों और मोबाइल कॉल डिटेल से इस बात को साबित करने की कोशिश की है। चार्जशीट के मुताबिक़ इनाम पाने के लिए तीन मज़दूरों को आतंकवादी साबित करने की कोशिश की गई।

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18 जुलाई को शोपियाँ में तीन युवकों के मुठभेड़ में मारे जाने का वाक़या हुआ। तब सेना के जवान ने दावा किया था कि मारे गये तीनों आतंकवादी थे। स्थानीय लोग तीनों की पहचान नहीं कर पाए थे। बाद में राजौरी के परिवारों ने तीनों मृतक युवकों की पहचान 17 वर्षीय इबरार, 25 वर्षीय इम्तियाज़ और 20 वर्षीय अबरार अहमद के रूप में की। उन्होंने दावा किया था कि वे शोपियाँ में मज़दूरी करने गए थे और उनका आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं था। कहा गया कि इम्तियाज 2018 से चौगाम में काम कर रहा था और इसी साल जुलाई में काम करने के लिए अपने दो चचेरे भाइयों को साथ लाया था। इस मामले में शोर मचने पर जम्मू-कश्मीर पुलिस और सेना दोनों ने जाँच शुरू की थी।

अब जम्मू कश्मीर पुलिस ने इसी मामले में अदालत में चार्जशीट पेश की है। इसमें सेना के अधिकारी कैप्टन भूपेंद्र सिंह पर साज़िश रचने का आरोप लगाया गया है। भूपेंद्र सिंह को मेजर बशीर ख़ान के रूप में भी जाना जाता है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार भूपेंद्र सिंह के अलावा दो नागरिक- शोपियाँ के चौगाम का तबिश नज़ीर और पुलवामा के निकास का रहने वाला बिलाल अहमद लोन भी आरोपी हैं। इन दोनों आरोपियों को 28 सितंबर को गिरफ़्तार किया गया है। आरोप पत्र में कहा गया है कि सेना के अधिकारी को "अफस्पा और सेना अधिनियम की प्रक्रियाओं के कारण अभी भी गिरफ्तार किया जाना बाक़ी है।'

आरोप पत्र में कहा गया है कि गिरफ्तार आरोपियों तबीश नजीर और बिलाल अहमद लोन से पूछताछ के दौरान उन्होंने घटना के दिन की पूरी कहानी का खुलासा किया।

इसने कहा कि दोनों जून के बाद से 62 आरआर के कप्तान भूपेंद्र सिंह उर्फ ​​मेजर बशीर ख़ान के संपर्क में थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 'हत्या के दिन यानी 18 जुलाई को दोनों आरोपी लोन की कार में आर्मी कैंप रेजिनगरी पहुँचे। वहाँ से वे कैप्टन भूपेंद्र सिंह, जो एक अन्य सफेद रंग की निजी कार में थे, के साथ आए।'

चार्जशीट के मुताबिक़, तीनों आरोपी चौगाम शोपियाँ गए, जहाँ राजौरी का युवक किराए के कमरे में रहता था। उनके आवास का स्थान 62 आरआर शिविर से 100 मीटर से कम और सह-अभियुक्त ताबिश नज़ीर के आवास से लगभग 20 मीटर की दूरी पर था।

आरोप पत्र में कहा गया है कि उन्होंने 'तीन व्यक्तियों का अपहरण किया और उन्हें कार से अमशीपोरा में ले लगे। फिर कुछ दूर घटना स्थल तक पैदल ले जाया गया।

पीड़ितों को जिस कार में ले जाया गया उसको सेना के अधिकारी ने मुठभेड़ से एक दिन पहले ही अपने पास लिया था। एजाज अहमद लोन नाम के एक शख्स ने कोर्ट के सामने कहा है कि उसकी कार को सेना के कर्मचारी गए थे और अगले दिन कार ख़राब हालत में पाई गयी।

द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में सेना के चार जवानों के बयान भी रिकॉर्ड किए गए हैं जिसमें कहा गया है कि 'कैंप से अकेले कैप्टन सिंह दो नागरिकों के साथ गए थे।' 

आरोप पत्र में मोबाइल कॉल डिटेल से भी आरोपियों के बीच संबंध को पुष्ट करने की कोशिश की गई है। तबिश नज़ीर और बिलाल अहमद लोन के बीच 29 फ़रवरी से 11 अगस्त के बीच 188 बार कॉल किया गया। आरोपी कैप्टन भूपेंद्र सिंह और बिलाल अहमद लोन में 23 जून से 16 जुलाई के बीच 91 कॉल किया गया। कैप्टन सिंह ने तबिश नज़ीर को 14, 15, 16 और 17 जुलाई को 13 कॉल किए।

चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि तीनों आरोपियों ने इसलिए मुठभेड़ को अंजाम दिया, सबूतों को ख़त्म किया और जानबूझकर ग़लत जानकारी दी ताकि सही सूचना देने के लिए मिलने वाले इनाम के 20 लाख रुपये पाये जा सकें।
बता दें कि उस मुठभेड़ को लेकर सेना की ओर से आख़िरी बयान 24 दिसंबर को जारी किया गया था, जिसमें श्रीनगर में पीआरओ डिफेंस ने कहा था कि सबूतों को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया पूरी हो गई है।

सेना ने कार्रवाई के आदेश दिए थे 

सितंबर महीने में ही रिपोर्ट में कहा गया था कि तीनों युवकों को मार गिराने को लेकर की गई सेना की जाँच में पता चला था कि जवान द्वारा सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम यानी अफ़स्पा के तहत मिली शक्तियों का दुरुपयोग किया गया। इसके अलावा उसने सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत और सेना प्रमुख की ओर से बनाए गए नियमों का भी उल्लंघन किया। 

रक्षा विभाग के प्रवक्ता ने कहा था, ‘सेना के अधिकारियों द्वारा ऑपरेशन अमशीपोरा को लेकर करवाई गई जाँच पूरी हो गई है। जाँच में प्रथम दृष्टया कुछ सबूत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि इस ऑपरेशन के दौरान अफ़स्पा 1990 के तहत मिली ताक़तों का दुरुपयोग किया गया।’ प्रवक्ता ने कहा कि इसके साथ ही पहली नज़र में जो इसके लिए दोषी पाए गए हैं, उनके ख़िलाफ़ सेना के एक्ट के मुताबिक़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के आदेश दिए गए हैं।

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