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फाइल फोटो

झारखंड सीएम सोरेन क्या अयोग्य होंगे? चुनाव आयोग की पड़ताल शुरू

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन क्या मुश्किल में फँस सकते हैं? विपक्षी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जो माइनिंग लीज को लेकर शिकायत की थी उसको लेकर अब चुनाव आयोग ने पड़ताल शुरू कर दी है। 

सोरेन के ख़िलाफ़ शिकायत की गई है कि मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने खनन लीज पर ली है और जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत दायरे में आता है। इसमें किसी सदन के सदस्य की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान भी है। इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने राज्यपाल से शिकायत की थी। चूँकि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत जाँच चुनाव आयोग के दायरे में आता है इसलिए इस मामले को राज्यपाल ने चुनाव आयोग को भेज दिया था।

 

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अब चुनाव आयुक्त ने सरकार से विस्तृत ब्योरा मांगा है। इस सिलसिले में चुनाव आयुक्त ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र भेजा है। सोमवार को मुख्य सचिव को मिले पत्र में उन कागजात को सत्यापित कर भेजने का निर्देश दिया है। राज्य के मुख्य सचिव को भेजे एक पत्र में चुनाव आयोग ने खनन लाइसेंस से संबंधित दस्तावेजों के प्रमाणीकरण के अलावा लीज के नियमों और शर्तों के विवरण की मांग की है। 

सोरेन के ख़िलाफ़ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में भ्रष्टाचार प्रावधानों के तहत जाँच की जानी है। आरोप सही पाए जाने पर विधायक के रूप में सोरेन अयोग्य क़रार दिए जा सकते हैं। 

चुनाव आयोग संविधान के प्रावधानों के तहत इस मुद्दे को भी देखेगा जो लाभ के पद पर रहने के लिए अयोग्यता की बात करता है।

रघुवर दास द्वारा शिकायत किए जाने के बाद यह विवाद तब और राजनीतिक रूप से गंभीर मुद्दा बन गया जब राजभवन ने इस मामले को चुनाव आयोग को भेज दिया था। इसके बाद ही चुनाव आयोग ने पड़ताल शुरू की है।

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सरकार का जवाब मिलने के बाद चुनाव आयोग द्वारा यह फ़ैसला किया जायेगा कि मुख्यमंत्री द्वारा लिये गये लीज का मामला ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ के दायरे में आता है या नहीं।

वैसे, हेमंत सोरेन दूसरे मामले में भी घिरे हैं। 34वें नेशनल गेम में कथित भ्रष्टाचार मामले में भी जाँच के निर्देश दिए गए हैं। हाईकोर्ट ने इसमें हुए घोटाले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया है। इसमें हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन के अलावा राज्य के कई बड़े ब्यूरोक्रेट्स जाँच के दायरे में आयेंगे। इस मामले ने भी सरकार को असहज किया है। तो सवाल है कि क्या सोरेन सरकार पर इस सबका दबाव पड़ेगा? क्या इस तरह के मामलों के दबाव में सरकार पर कोई मुश्किल आएगी? और सोरेन इन मुश्किलों से कैसे पार पाएँगे?

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