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तबरेज़ मॉब लिन्चिंग मामले का क़त्ल, पुलिस ने हत्या की धारा हटाई

तबरेज़ अंसारी का नाम तो आपको याद होगा, 22 साल का लड़का जिसे झारखंड के सरायकेला-खरसावां इलाक़े में बाइक चोरी के शक में भीड़ ने पीटा था। भीड़ के द्वारा पीटे जाने की घटना 18 जून की थी और 22 जून को अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। अब तबरेज़ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई है और यह हैरान कर देने वाली है। रिपोर्ट कहती है कि तबरेज़ की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थी न कि भीड़ के द्वारा की गई पिटाई से। इसके अलावा पुलिस ने इस मामले में 11 अभियुक्तों पर से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 यानी हत्या की धारा को भी हटा दिया है।

भीड़ ने सात घंटे तक खंभे से बांधकर तबरेज़ अंसारी को पीटा था और उससे ‘जय श्री राम’ और ‘जय हनुमान’ के नारे भी लगवाए थे। अंसारी की पत्नी शाहिस्ता परवीन की ओर से इस मामले में हत्या का मुक़दमा दर्ज कराया गया था जबकि पिछले महीने पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 304 (ग़ैर इरादतन हत्या) के तहत मुक़दमा दर्ज किया था। 
पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि तबरेज़ अंसारी की हत्या सोच-समझकर या जानबूझकर नहीं की गई थी।

सरायकेला-खरसावां के एसपी कार्तिक एस. ने अंग्रेजी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में कहा, ‘हमने आईपीसी की धारा 304 के तहत चार्जशीट दो कारणों से दाख़िल की थी। पहला कारण यह कि तबरेज़ की मौत घटनास्थल पर नहीं हुई थी और ग्रामीणों का अंसारी की हत्या करने का कोई इरादा नहीं था। दूसरा कारण यह कि तबरेज़ की मेडिकल रिपोर्ट में हत्या की पुष्टि नहीं हुई थी।’ 

एसपी ने अख़बार से कहा, ‘फ़ाइनल पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक़, अंसारी की मौत दिल का दौरा पड़ने से और सिर से ख़ून बहने के कारण हुई लेकिन सिर की यह चोट जानलेवा नहीं थी।’

जबकि तबरेज़ का पोस्टमार्टम करने वाले एक डॉक्टर ने 25 जून को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया था कि तबरेज़ की मौत का कारण सिर में चोट लगने के बाद लगातार ख़ून बहना हो सकता है। सदर अस्पताल के उप-अधीक्षक डॉ. बरियाल मारी ने अख़बार से कहा था कि सिर के दायें हिस्से के आगे वाले भाग में चोट थी और इस बात की संभावना है कि इस वजह से सिर से लगातार ख़ून बहा हो और यह मौत का एक संभावित कारण हो सकता है। हालाँकि उस समय अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने पोस्टमार्टम को लेकर अपनी अंतिम राय नहीं बताई थी क्योंकि बोर्ड फ़ॉरेंसिक नतीजे आने का इंतजार कर रहा था। 

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अख़बार के मुताबिक़, पुलिस ने कहा, ‘अभियोजन विभाग ने इस चार्जशीट को देखा है और पहले हमने यह सोचा था कि हम आईपीसी की धारा 302 और 304 को साथ-साथ चला सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। साथ ही मेडिकल रिपोर्ट भी इस बात को पूरी स्पष्टता के साथ नहीं कहती कि तबरेज़ की मौत सिर से ख़ून बहने के कारण ही हुई है। अदालत में इससे मुश्किल पैदा हो सकती है।’ 

बता दें कि मॉब लिन्चिंग के लिए बदनाम हो चुके झारखंड में पिछले कुछ समय में गो मांस ले जाने के शक में या फिर अन्य कारणों से मुसलमानों पर हमले या उन्हें पीट-पीटकर मार डाले जाने की कई घटनाएं सामने आई हैं।

सवालों के घेरे में है पुलिस

तबरेज़ अंसारी की मौत की जाँच के मामले में पुलिस का रवैया शुरू से ही सवालों के घेरे में रहा है। क्योंकि पुलिस ने हिरासत में तबरेज़ का मोटरसाइकिल चोरी करने का कबूलनामा तो दर्ज कर लिया था लेकिन भीड़ के द्वारा उसे पीटे जाने को लेकर एक भी लाइन एफ़आईआर में नहीं लिखी थी। तब इसे लेकर बहुत हैरानी हुई थी कि आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है क्योंकि तबरेज़ को भीड़ द्वारा बेरहमी से पीटे जाने का वीडियो तो सोशल मीडिया पर वायरल है। 

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तब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने ख़बर दी थी कि पुलिस की ओर से दर्ज की गई एफ़आईआर में भीड़ द्वारा हमले की बात को नहीं दर्ज किया गया है। अंसारी के ख़िलाफ़ घातकीडीह के कमल महतो की ओर से बाइक चोरी को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई थी। 
तबरेज़ को जमकर पीटने के बाद ग्रामीणों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया था। अंसारी के चाचा मक़सूद आलम ने कहा था कि उन्होंने तबरेज़ से पुलिस स्टेशन के लॉक-अप में बात की थी। इस दौरान वह बेहद कमज़ोर हालत में था और बात भी नहीं कर पा रहा था।

तबरेज़ के चाचा ने कहा था कि वह इस बात पर विश्वास नहीं कर सकते कि तबरेज़़ ने पुलिस से उसे पीटे जाने के बारे में कुछ नहीं कहा होगा। उन्होंने कहा था कि पुलिस जानबूझकर इस बात को दबा रही है और सवाल पूछा था कि क्या पुलिस और डॉक्टर भी तबरेज़ की पिटाई नहीं देख सके? 

तब इस बात को लेकर भी हैरानी हुई थी कि एफ़आईआर में दर्ज एक बयान में तबरेज़ की ओर से कहा गया है कि वह और उसके दो साथी नुमैर और इरफ़ान ऊँची दीवारें फाँदकर एक घर की छत पर चढ़ गए और उन्होंने मोटरसाइकिल चुरा ली। जबकि उस मोटरसाइकिल का कोई रजिस्ट्रेशन नंबर ही गाँव में नहीं था। 

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इस ख़बर के सामने आने के बाद तबरेज़ को इंसाफ़ मिलने की उम्मीद पूरी तरह ख़त्म हो गई है। यह कुछ उसी तरह है जैसे हाल ही में अलवर की एक अदालत ने गो तस्करी के शक में भीड़ के द्वारा पीट-पीटकर मार डाले गए हरियाणा के नूँह के निवासी पहलू ख़ान की हत्या के सभी 6 अभियुक्तों को बरी कर दिया था। ऐसे हालात में कोई आम इंसान इंसाफ़ के लिए कहां जाएगा, क्योंकि पुलिस का रवैया जगज़ाहिर है और अदालतों से लोग बरी हो रहे हैं। 

इसी तरह कुछ 2013 में यूपी के मुज़फ़्फ़रनगर में हुए दंगों के मामले में देखने को मिला था। 2017 के बाद से मुज़फ़्फ़रनगर की अदालतों ने दंगों से जुड़े 41 मामलों में फ़ैसले सुनाए हैं और इनमें से 40 मामलों में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया है और हत्या के सिर्फ़ एक मामले में सजा सुनाई गई है। बरी होने के सभी 40 मामले मुसलमानों पर हुए हमले से जुड़े हैं। 

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